Friday, May 24, 2019 12:27 AM

इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बंदूक के बल पर दो हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उनका धर्मांतरण कराकर उनका निकाह करा दिया गया। इस मामले को लेकर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर कहा 'मैंने पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त से इस पर एक रिपोर्ट भेजने को कहा है।' इस पर पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने इसे अपने देश का आंतरिक मामला बताते हुए स्वराज के ट्वीट पर आपत्ति की। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सिंध और पंजाब सरकारों से दोनों नाबालिग लड़कियों को सुरक्षित निकालने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भी आदेश दे दिया है। खान के मानवाधिकार मंत्रालय को मामले की जांच के आदेश भी दिए हैं। फवाद चौधरी ने ट्वीट में कहा, यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है। हमें उम्मीद है कि भारत सरकार भी भारतीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए इसी तत्परता से काम करेगी। सुषमा ने पलटवार करते हुए लिखा, मिस्टर फवाद चौधरी, हमने तो अपने उच्चायुक्त से मामले में रिपोर्ट भेजने के लिए कहा है। इस पर आपके बौखलाने का कोई कारण नहीं है। आपकी यह चिड़चिड़ाहट आपके अपराध बोध को दिखाता है। पाक में हिन्दू समुदाय ने घटना के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रदर्शन कर मामले में दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। पाकिस्तान हिन्दू सेवा वेलफेयर ट्रस्ट के अध्यक्ष संजय धनजा ने पीएम इमरान खान से पाकिस्तान में सभी अल्पसंख्यक वास्तव में सुरिक्षत हैं, यह साबित करने की मांग की। उन्होंने इमरान खान को देश के अल्पसंख्यकों से हाल ही में किए गए वादे की याद दिलाई। रिपोट्र्स के अनुसार पाकिस्तान के सिंध प्रांत के घोट की जिले के धारकी कस्बे में होली के एक दिन पहले 15 और 13 साल की दो हिन्दू बहनों को अगवा किया गया। उनको जबरन इस्लाम धर्म में शामिल कर मुस्लिम से निकाह कराकर पंजाब के रहीम यार खान ले जाया गया। लड़कियों के पिता और भाइयों का वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद यह मामला सामने आया। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार दोनों बहनों ने अपनी सुरक्षा के लिए बहावलपुर की कोर्ट में याचिका भी लगाई है। शनिवार को पाकिस्तान में मानवाधिकार संगठनों द्वारा किए प्रदर्शन में लड़कियों के पिता भी मौजूद थे।

पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों को अगवा करने का सिलसिला पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के साथ ही शुरू हो गया था और यह आज तक चल रहा है। वहां के सभी प्रमुख राजनीतिक दल इसे एक बड़ी समस्या मानते हैं लेकिन कट्टर इस्लामिक संगठनों के सामने कोई कदम नहीं उठा पाते। एक अनुमान के मुताबिक वहां हर साल एक हजार गैर मुस्लिम लड़कियों को अगवा कर उनका जबरन धर्मांतरण व फिर शादी की जाती है। पाक मानवाधिकार आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अमरनाथ मोतुवल ने कुछ दिन पहले कहा था कि सिर्फ सिंध में हर महीने 20 से 25 हिन्दू लड़कियों की वहां जबरन धर्मांतरण कर शादी करा दी जाती है। ज्यादातर मामलों की कोई रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। जनवरी, 2019 में अनुषा कुमारी का अपहरण किया गया और फिर किसी मुस्लिम युवक से जबरन निकाह करा दिया गया। 2017 में दो हिन्दू लड़कियों रवीता मेघवार और आरती कुमारी और सिख युवती प्रिया कौर का मामला पाक की मीडिया ने काफी उठाया था लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। इन सभी को अगवा किया गया और फिर इनका निकाह मुस्लिम युवकों से कराया गया। पाकिस्तान की मूवमेंट फॉर पीस एंड सॉलिडैरिटी नाम की एक एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हर साल अल्पसंख्यक वर्ग की एक हजार लड़कियों का अपहरण व जबरन निकाह किया जा रहा है। पाकिस्तान के मीडिया का भी कहना है कि उमरकोट स्थित सरहंदी और मीरपुरखास की बारचुंदी शरीफ नाम के धार्मिक स्थल से ही दूसरे धर्म की लड़कियों को जबरन मुस्लिम बनाने का काम होता है। धर्म बदलने के बाद दहशतजदा ये लड़कियां लोक-लाज के डर से अपने घर भी नहीं लौटती और फिर अपहरण करने वालों के पक्ष में ही अपना बयान दे देती हैं। इस वजह से पीडि़तों को पुलिस से कोई मदद नहीं मिलती। सबसे ज्यादा ये घटनाएं सिंध में होती हैं, जहां 2016 में इसके खिलाफ एक कानून बनाने की कोशिश भी हुई थी। सिंध विधानसभा में इस कानून के पारित होने के बावजूद वहां के गवर्नर ने उसे मंजूरी नहीं दी। बाद में जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों ने इसके खिलाफ लामबंदी की और इसे स्थगित कर दिया गया।

अगर भारत के इतिहास पर न•ार दौड़ाये तो पायेंगे कि जब मुहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आठवीं शताब्दी में हमला किया था तभी से हिन्दुओं का कत्ल और हिन्दू औरतों की इज्जत से खिलवाड़ का यह सिलसिला शुरू हो गया था जो विभाजन तथा उसके बाद भी पाकिस्तान क्या बांग्लादेश में भी आज तक जारी है। अफगानिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदायों की यही स्थिति है।

इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक हिन्दुओं व सिखों की दयनीय स्थिति का पहला कारण मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा है। मदरसों में जब बच्चे को उसकी बाल्य अवस्था में ही यह समझाया जाएगा कि इस्लाम न मानने वाले काफिर हैं और काफिरों को मारने से स्वर्ग में हूरें मिलेंगी तब फिर कैसे इस्लाम में अंध विश्वास रखने वाले दूसरे धर्म के लोगों को बर्दाश्त कर सकेंगे।

इस्लामिक देशों में साम्प्रदायिक अत्याचार की घटनाओं की सुनवाई नहीं होती। जिस कारण कट्टरपंथी अपने को कानून से ऊपर मानकर चलते हैं और अल्पसंख्यक समुदाय वाले केवल गुहार लगाते ही रह जाते हैं। विभाजन के समय हिन्दू और सिख अपनी जो जायदाद पाकिस्तान छोड़कर आये या दोनों के धार्मिक स्थलों पर आज अधिकतर कब्जे हो चुके हैं या शत्रु सम्पत्ति घोषित की जा चुकी है।

इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों का सरकारी नौकरी में विशेषतया उच्च स्थानों पर हिस्सा न के बराबर है उन्हें दर्जा चार की नौकरियां ही दी जाती हैं। तथ्य बताते हैं कि इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हमेशा दबाव बनाकर रखा जाता है ताकि देर-सवेर दबाव में आकर वह अपना धर्म छोड़कर इस्लाम की चादर ओढ़ लें या देश छोड़कर चले जाएं।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि जिन देशों में मुसलमान अल्पमत में है वहां वह इस्लाम के नाम पर जेहाद लड़ते दिखाई दे रहे हैं। अपने देशों में अल्पमत को रहने नहीं देना चाहते और आप जहां अल्पमत में है वहां बहुमत पर दबाव बनाकर रखना चाहते हैं। इस्लाम में विश्वास रखने वालों की यह दो मुंह वाली नीति ही आज विश्व में बढ़ते तनाव व टकराव का कारण है। अगर इस्लाम में विश्वास रखने वाले अन्य धर्मों में विश्वास करने वालों की भावनाओं का सम्मान करना सीख जाएं तो शायद इस्लाम के नाम पर विश्व स्तर पर जो खून-खराबा हो रहा है वह रुक जाए। यह तभी संभव है जब मुसलमानों का बुद्धिजीवी वर्ग आगे आकर दो मुंह वाली नीति का विरोध करेगा। इस्लाम में आज तक तो कट्टरपंथियों की जीत हुई है, उदारवादियों की झोली में हार ही पड़ी है। जब तक उदारवादियों की जीत नहीं होती, तब तक अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादतियां ही होती रहेंगी, यह ही कटु सत्य है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।


 

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