चीन की पैंतरेबाजी

लद्दाख और सिक्किम क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले कुछ दिनों से चल रही तनातनी के कारण स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि चीन ने हजारों की संख्या में फौजियों की तैनाती कर दी तथा वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना को एक तरह से युद्ध के लिए तैयार होने की बात भी कह दी। चीन के तेवरों को देखकर भारत ने भी अपने सैनिकों की सीमा पर संख्या बढ़ा दी और हर स्थिति का सामना करने की घोषणा भी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कर दी। भारत-चीन के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर कहा है कि अमेरिका उनके सीमा विवाद में मध्यस्तथा करने के लिए तैयार है, लेकिन भारत ने इस पेशकश को खारिज कर दिया है। इसी बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजिआन ने पत्रकारों से कहा, हम दोनों नेताओं के बीच बनी महत्वपूर्ण सहमति और दोनों देशों के बीच हुए समझौते का सख्ती से पालन करते रहे हैं। झाओ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो अनौपचारिक बैठकों के बाद उनके उन निर्देशों का जिक्र कर रहे थे जिनमें उन्होंने दोनों देशों की सेनाओं को परस्पर विश्वास पैदा करने के वास्ते और कदम उठाने के लिए कहा था। भारत में चीन के राजदूत सुन वेइडोग ने कहा कि चीन और भारत को अपने मतभेदों का असर कभी भी समग्र द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं पडऩे देना चाहिए और आपसी विश्वास को बढ़ाया जाना चाहिए। कॉन्फेडरेशन ऑफ यंग लीडर्स द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन सत्र में उन्होंने कहा, हमें मूल निर्णय का पालन करना चाहिए कि चीन और भारत एक-दूसरे के लिए अवसर हैं, खतरा नहीं।

हमें एक-दूसरे के विकास को सही तरीके से देखने और रणनीतिक पारस्परिक विश्वास को बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, चीन और भारत को अच्छे पड़ोसी होना चाहिए और अच्छे सहयोगियों को एक साथ मिलकर आगे बढऩा चाहिए। उधर, इस मसले पर भारत ने कहा कि वह सीमा प्रबंधन पर हमेशा बहुत जिम्मेदाराना रुख अपनाता है। साथ ही उसने कहा कि भारत अपनी संप्रभुत्ता तथा सीमा की रक्षा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसके बाद चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, चीन-भारत सीमा पर हालात स्थिर और नियंत्रण योग्य हैं। तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की खबरों की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा, हम बातचीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने में सक्षम हैं। यह पूछे जाने पर कि बातचीत कहां हो रही है, झाओ ने कहा कि दोनों देशों ने सीमा संबंधित तंत्र स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा, इसमें सीमा बलों और राजनयिक मिशनों के बीच बातचीत शामिल है। बता दें कि चीन के साथ करीब 3,500 किलोमीटर लंबी एलएसी है। हाल के दिनों में लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में भारत और चीन की सेनाओं ने अपनी उपस्थिति काफी हद तक बढ़ाई है। उधर नेपाल की संसद में देश के नक्शे में बदलाव के लिए जो संवैधानिक संशोधन किया जाना था उसे सदन के एजेंडे से ही बाहर कर दिया। उल्लेखनीय है कि हाल ही में नेपाल ने एक नया नक्शा जारी कर भारत के क्षेत्र को अपने क्षेत्र के तौर पर दर्शाया था।

गौरतलब है कि भारतीय सेना के शीर्ष कमांडरों ने भारत की प्रमुख सुरक्षा चुनौतियों पर बुधवार को विचार-विमर्श शुरू किया है। थल सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नवरणे तीन दिवसीय सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे हैं। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अनुसार पाकिस्तान और चीन के साथ सीमाओं सहित भारत की सुरक्षा चुनौतियों के सभी पहलुओं पर कमांडरों द्वारा लंबी चर्चा की जाएगी। समझा जा रहा है कि कमांडर जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर भी विचार करेंगे। कमांडरों का सम्मेलन पहले 13-18 अप्रैल को होने वाला था, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। सम्मेलन का दूसरा चरण जून के अंतिम सप्ताह में होगा।

चीन जो गिरगिट की तरह रंग बदलता है उस पर अतीत में पं. जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने भरोसा किया था जिसका खामियाजा भारत को 1962 के चीनी आक्रमण के रूप में भुगतना पड़ा और नेहरू इस सदमे से कभी उभर न सके और 1964 में स्वर्ग सिधार गए। तब से लेकर अब तक भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति तथा सैन्य दृष्टि से भी भारी बदलाव आ चुका है। वर्तमान में कोरोना विषाणु के कारण भारत सहित सारा विश्व महामारी से लड़ता दिखाई दे रहा है। चीन कोरोना महामारी पर एक सीमा तक काबू पाने में सफल हो गया है इसलिए थोड़ी बेहतर स्थिति में है। उत्पन्न हुई स्थिति का लाभ लेकर वह भारत पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है। चीन के उपरोक्त रवैये का दूसरा बड़ा कारण वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चीन में कम•ाोर होती छवि और कोरोना के कारण चीन जिस तरह विश्व में खलनायक के रूप में देखा जा रहा है, उपरोक्त सब बातों से चीनी लोगों का ध्यान हटाने के लिए चीनी राष्ट्रपति अपने को देश का सबसे बड़ा हितैषी बताने के लिए भी भारत से टकराव बना रहे हैं। तीसरा बड़ा कारण भारत की बढ़ती सैन्य क्षमता है। भारत ने पिछले कुछ सालों में अपनी सीमाएं मजबूत की हैं, उनका प्रबंधन बेहतर किया है, सीमा पर अपना इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत किया है, इससे भारतीय सेना का मनोबल बढ़ा है। भारतीय सेना की मौजूदगी उन क्षेत्रों में भी बढ़ी है, जिसकी चीनी सेना कभी उम्मीद भी नहीं कर सकती थी।

एलएसी पर भारतीय सेना की पेट्रोलिंग प्रभावी तरीके से हो रही है और चीन की हरकतों पर भारत डटकर खड़ा हुआ है। भारत-चीन सीमा का सीमांकन स्पष्ट नहीं है, कई बार सीमा पर छिटपुट विवाद होते रहे हैं, जिसे स्थानीय स्तर पर सुलझा लिया जाता था। चीन, पाकिस्तान, नेपाल द्वारा जिस तरह भारत की सीमाओं पर दबाव बनाने के लिए विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसको देखते हुए भारत को जहां अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी होगी वहीं विश्व को विशेषतया अपने पड़ोसी देशों को स्पष्ट संदेश भी देना होगा कि भारत अब किसी तरह का दबाव बर्दाश्त करने को तैयार नहीं और अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। चीन की पैंतरेबाजी को लेकर तीनों सेनाओं के प्रमुखों को भी समस्या का स्थाई हल क्या हो सकता है उस बारे भारत सरकार को अपनी स्पष्ट राय देनी चाहिए। भारत सरकार को भी देशहित को सम्मुख रखकर उपरोक्त मामले में ठोस नीति अपनाने व कदम उठाने की आवश्यकता है। चीन की शह पाकिस्तान व नेपाल को भी है लेकिन चीन स्वयं भी भारत के बढ़ते कदम और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती छवि व साख के कारण भयभीत है। आर्थिक क्षेत्र में भारत चीन का विकल्प न बन जाए इस बात से भी वह घबराहट में है। घबराहट में चीन युद्ध तक जा सकता है, इसलिए भारत को उत्पन्न हुई स्थिति को गंभीरता से लेकर चिंतन करने व हल ढूंढने की आवश्यकता है। भारत को चीन को हलके में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए। चीन कब कौन सा पैंतरा बदले इस बारे कुछ नहीं कहा जा सकता। भारत को तो हमेशा सतर्क रहकर सीमा की सुरक्षा को सुनिश्चित करना होगा, आज यही भारत की प्राथमिकता है और भविष्य में भी होनी चाहिए।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।