महात्मा ज्योतिबा फुले: एक प्रासंगिक चिंतन

भारत का इतिहास अनेकों महापुरूषों उनके प्रेरणादायी व्यक्तितव कृतित्व से भरपूर है तथा सामान्य मानवी के जीवन, सामाजिक व्यवस्था आर्थिक विकास को लेकर उनके विचार व दूरदर्शी सोच वर्तमान व भावी पीढिय़ों के लिए मार्गदर्शिका का एक अनूठा स्त्रोत है। इसी श्रृंखला मे ं जब आज राष्ट्र 19 वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक, दलित उत्थान व महिला शिक्षा एवं समानता के अग्रदूत महात्मा ज्योतिबा फुले की 194 वीं जंयती के अवसर पर सामाजिक व कृषि संबंधित आर्थिक सुधारों से राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर प्रकाश डालना अत्यन्त प्रासंगिक है। महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपना संपूर्ण जीवन दलित उत्थान व महिला शिक्षा को समर्पित किया। एक मान्यता के अनुसार, समाज के ऐसे वर्ग जिन्हें अस्पृश्य (अछूत) की श्रेणी में माना जाता था, उनके लिए ÓदलितÓ शब्द का प्रयोग भी प्रथम बार महात्मा ज्योतिबा फुले के द्वारा ही किया गया था। महाराष्ट्र के सतारा में वर्ष 1827 में माली सामाज के परिवार में जन्में इस महान विचारक ज्योतिराव गोविन्दराव फुले को दलित उत्थान, महिला शिक्षा, समाज सुधार के प्रणेता के रूप में जाना जाता है, लेकिन तत्कालीन परिपेक्ष्य में कृषक समाज की दुर्दशा, नितांत गरीब व साधनहीन किसानों के आर्थिक उद्धार हेतु सुझाए गए कृषि सुधार के उपाय अनुकरणीय हैं। फुले ने किसानों की सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का विशेष विश्लेषण किया तथा जीवन प्रयंत उनकी समस्याओं के सामाधान को खोजने में प्रयत्नशील रहे। यह उनकी कृषक वर्ग को लेकर गंभीरता का ही परिणाम था कि वर्ष 1883 में किसानो ं की आर्थिक दुर्दशा का ऐतिहासिक सर्वेक्षण करके व इसके कारणों को अत्यन्त गहराई व मनोयोग से विश्लेषित करके ''शेतकरयाचा असूडज्ज्(किसान का कोड़ा/ञ्जद्धद्ग ष्ह्वद्यह्लद्ब1ड्डह्लशह्म्ज्ह्य 2द्धद्बश्च-ष्शह्म्स्र) महाग्रंथ की रचना की व कृषको ं की सर्वांगीण उन्नति के बहुमूल्य सुझाव दिए। इस ग्रंथ में ज्योतिराव फुले ने कृषि पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव, कृषि उत्पादन प्रणाली के पिछडेपन तथा विद्यमान सामाजिक व्यवस्था व नौकरशाही द्वारा किसानों के शोषण जैसे किसान की दरिद्रता के तीन प्रमुख कारण बताए। एक प्रगतिशील किसान की भूमिका मे ं महात्मा फुले ने कृषि सुधारों की आवश्यकता पर बल देकर अनेक सुझाव दिए, खेतों में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ताल-तलैया व बांध का निर्माण करने, पशु पालन को बढ़ावा देने व परिणाम-स्वरूप खाद्य उत्पादन बढ़ाने, पशुधन वध प्रतिबंधित करने, पशुधन नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाने, किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करवाने, किसानों के कृषि संबंधि ज्ञान वृद्धि के लिए ेकृषि मेलों के आयोजन करने व विदेशी अनुभव से अन्नोत्पादन की नई-नई तकनीकों से परिचित कराने से सबंधित बहुमूल्य सुझाव दिए। कृषि सुधार संबंधी इन सुझावों में भूमि व भूमि पुत्र के विकास तथा सम्पूर्ण समाज व राष्ट्र के निर्माण को लेकर महात्मा फुले की आधुनिक सोच परिलक्षित होती है।  कृषकों के उत्थान के लिए जहां सरकार के उतरदायित्वोों का विस्तार से उल्लेख किया वहीं किसानों को उनके कर्तव्यों के पालन की प्रेरणा दी तथा व्यक्तिगत दुर्गुणों तथा कुरीतियों को त्यागने व सदाचरण को अपनाने का आह्वान किया। देश जब राजनैतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक गुलामी के दौर से गुजर रहा था ऐसे समय में महात्मा फुले की पत्नी सावित्री बाई फुुले ने शिक्षा के महत्व को जाना, समझा तथा वंचित वर्ग की खेतीहर मजदूर महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य, सशक्तिकरण तथा जीविकोपार्जन मेें उनकी बेहतर भूमिका हेतु संगठित और सकंल्पित किया। 2 मार्च1888 को महात्मा फुुले के मित्र, हरिराव जी चिपलूणकर ने इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरीया के पुत्र डयूक ऑफ  कॅनाट का पूना में अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया। तब कार्यक्रम में आमंत्रित महात्मा फुले पारंपारिक वेश-भूषा में साधारण रूप से शामिल हुए, लेकिन इस कार्यक्रम मेंं धारा-प्रवाह अंग्रेजी में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण किसानों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण, मानवतावादी दृष्टिकोण प्रदर्शित करने के साथ अंग्रेजों की शासन व्यवस्था को चुनौती देने वाला था। उन्होंने कहा ''समारोह में पधारे लोगों के मूल्यवान कपड़ोंं और चमकीले हीरों की ओर देखकर तुम्हें पता चलेगा कि भारत बहुत सुखी और सन्तोषी देश है, लेकिन वास्तविकता कुछ औैर ही है। यदि  राजपुत्र को सच्चा भारत देखना हो और महारानी को सच्ची खबर बतानी हो, तो उन्हें आस-पास के कुछ गावों में जा कर अशिक्षित जनता की दयनीय स्थिति और दरिद्रता प्रत्यक्ष रूप से देखनी चाहिए। देश भारत में कृषि आदिकाल से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम, चौधरी देवीलाल, शरद जोशी जैसे अनेक महापुरुषों व राजनेताओं ने कृषि सुधारों व किसान कल्याण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा महात्मा फुले के कृषि सुधार चिंतन को समाहित किया। भारतीय संविधान के निर्माता एवं भारत में दलित उत्थान के प्रखर प्रवक्ता डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर भी महात्मा फुले के विचारों का अत्यन्त प्रभाव रहा तथा अपने गुरू के रूप में उन्होंने महात्मा फुले को स्वीकार किया।  
    महात्मा फुले के कृषि सुधारों व कृषक कल्याण संबंधित विचारों की प्रेरणा के अनुरूप ही वर्ष 2014 के पश्चात प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड,प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि, जल प्रबंधन, सोयल हेल्थ कार्ड, प्रधान मंत्री सिंचाई योजना, नीम कोटड यूरिया के साथ-साथ उच्च गुणवता के बीजों की उपलब्धता तथा स्टोरेज व मार्केटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, एफपीओ को बढ़ावा देने तथा किसानों की आय को दूगना करने की दिशा मेंं प्रभावशाली योजनाएं व ऐतिहासिक कृषि सुधार कानून लागू किए गए हैं। ये सभी सुधार कृषि व किसान कल्याण के क्षेत्र में अर्थोपार्जन हेतु एक मील का पत्थर साबित होंगे। समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, कर्मकाण्डों, जाति प्रथा, अस्पृश्यता, बाल विवाह आदि का विरोध करके सामाजिक समानता, दलित उत्थान, महिला शिक्षा, विधवा विवाह आदि को प्रोत्साहित करने वाले महापुरूष महात्मा फुले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आज जन्म जयंती के अवसर पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर समग्रता से चिंतन करके उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

-अर्जुन राम मेघवाल

  (लेखक बीकानेर से संासद एवं केंद्रीय संसदीय कार्य और भारी उद्योग एवं लोक उद्यम राज्य मंत्री, भारत सरकार हैं)