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प्रकृति व पर्यावरण बचाने से ही जीवन बचेगा

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प्रकृति व पर्यावरण बचाने से ही जीवन बचेगा

प्रकृति मां की गोद सबके लिए जीवनदायिनी है। धरती, पानी, जंगल, हवा, जीव-जंतु व इनसे बना प्राकृतिक परिवेश मनुष्य के जन्म, जीवन, विकास और आनंद में अहम भूमिका निभाता है। पेड़ों की हरियाली, पंछियों का कलरव, पहाड़, घाटियां, कल-कल बहता नदियों व झरनों का पानी हमें सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। लेकिन आज प्रकृति और इसके संतुलन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के खतरे हमारे सामने हैं। विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संकट, आपदाएं और बीमारियां इसका संकेत हैं। लेकिन मानव विकास के पीछे पड़ा है। ऐसा विकास जो प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन व शोषण पर आधारित है। देश व दुनिया में विकास बिगड़ा हुआ सांड बनकर सब पेड़ों और प्रकृति को उजाडऩे पर तुला हुआ है। मनुष्य इस स्थिति को देख भी रहा है, लेकिन नासमझी व स्वार्थ के कारण विकास पर मंत्रमुग्ध हो रहा है और अपने कुकृत्यों पर तालियां बजा रहा है। आज हमें ऐसे विकास की जरूरत है, जो पर्यावरण व प्रकृति के अनुकूल हो और उसके साथ तालमेल करके आगे बढ़े।
अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने के लिए खेती का ऐसा स्वरूप विकतिस किया जा रहा है, जिसमें थोड़े समय में ज्यादा फसलें ली जा सकें। फसल विविधिकरण की बातों के बावजूद व्यावहारिक रूप से ऐसी फसलें अधिक उगाई जाती हैं, जिनकी सिंचाई में पानी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। हरियाणा व पंजाब के कितने ही ऐसे इलाके हैं, जिनमें साठी धान लगाई जाती है। खेती व उद्योगों में बेतहाशा इस्तेमाल से जल स्तर लगातार रसातल की ओर जा रहा है। आज जो व्यक्ति चालीस साल से ऊपर के हैं, उन्होंने पानी से लबालब रहने वाले क्षेत्रों को पानी के अकाल से जूझते भली-भांति महसूस किया है। जिन स्थानों पर पानी बहुतायत में मिलता था, वहां पर अब सबमर्सीबल भी फेल हो रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों को डार्क जोन घोषित कर दिया गया है। उपजाऊ धरती बंजर बनने की तरफ बढ़ रही है। उद्योग-धंधों ने तो धड़ल्ले से कोहराम मचा रखा है। फैक्ट्रियों का गंदा पानी नालों के रास्ते नहरों व नदियों में मिलकर सारे पानी को जहर मिलाने पर तुला हुआ है। जल प्रदूषण के कारण प्राकृतिक जीवन के लिए विख्यात रहे गांवों में कैंसर व हैपीटाइटस के मरीजों के कारण मौतें आम बात हो गई हैं।
शुद्ध पानी की आपूर्ति से सरकार का जन स्वास्थ्य विभाग निजीकरण की नीति के तहत जल्द से जल्द पिंड छुड़ाने के मूड में है। हरियाणा में गांवों के जलापूर्ति केन्द्रों को पंचायतों को सौंपने की योजना पर तेजी से अमल किया जा रहा है। ट्यूबवैल के संचालन व रखरखाव के लिए एकमुश्त राशि पंचायत को दे दी जाती है। यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ट्यूबवैल खराब होने पर महीनों तक गंदे पानी की सप्लाई होती रहती है। पंचायतों के पास पैसे नहीं होते। जन स्वास्थ्य विभाग पंचायतों की जिम्मेदारी कह कर पल्ला झाड़ लेता है। शुद्ध पानी की आपूर्ति के प्रति जवाबदेह व्यवस्था का अभाव देखने को मिल रहा है। गांवों में कुएं खत्म हो चुके हैं। तालाब दूषित हो चुके हैं। अधिकतर गांवों के तालाबों में गांव की निकासी का गंदा पानी छोड़ा जाता है, जिससे उनकी पवित्रता खत्म हो चुकी है। बिना इस्तेमाल किए पानी को व्यर्थ बहाए जाने से समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है।
आए दिन बड़े-बड़े विज्ञापनों के साथ शुरू की जा रही कथित विकास परियोजनाएं जंगलों को लील रही हैं। जंगल का क्षेत्र भी सिमटता जा रहा है। जंगलों में रहने वाले जीव-जंतुओं पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। भोजन व आवास का संकट गहराने के कारण बंदर बंदों की बस्तियों में कोहराम मचा रहे हैं। नील गाय सहित कुछ जंगली जानवर खेतों में फसलों को उजाड़ते हैं। किसान उन्हें दुश्मन मान कर बंदूक उठाए खड़े हैं। मूल कारण तो यह है कि मनुष्य ने पहले उनके जंगलों को उजाड़ा, फिर वे हमारी बस्तियों व खेतों में आए। खेती में रसायनिक खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल और आवास के रूप में जंगलों का कटाव होने से वन्य प्राणियों की जान पर बन आई है। वन्य प्राणियों की कितनी ही प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं और कितनी लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं।
जमीन का सबसे बड़ा दुश्मन बना है- पोलिथीन व प्लास्टिक का कचरा। पोलिथीन का गैर-जरूरी इस्तेमाल हो रहा है। उससे भी दुखद और विडंबनाजनक यह है कि इस्तेमाल के बाद उसका प्रबंधन सही नहीं होता है। पोलिथीन व प्लास्टिक के कचरे को गलनशील कचरे में मिलाकर जमीन पर डाल दिया जाता है। इस तरह से मनुष्य ने पोलिथीन की परतें धरती पर बिछा दी हैं। इनसे धरती में जलभरण के रास्ते रुक गए हैं। हम धरती से पानी ले तो रहे हैं, लेकिन धरती में पानी जाने के रास्ते बंद कर दिए गए हैं। चारों ओर खुले में फैला पोलिथीन राक्षस की तरह से हंस रहा है और उसके आगे नागरिकों के साथ-साथ नगरपालिकाओं, पंचायतों व सरकारों ने बेबसी व उदासीनता धारण कर ली है। जरूरत के अनुसार पोलिथीन का इस्तेमाल हम भले ही कर लें, लेकिन उसके पुनर्चक्रीकरण की व्यवस्था करना भी हमारी जिम्मेदारी है। अमेरिका में भारत की तुलना में पोलिथीन का प्रति व्यक्ति इस्तेमाल कहीं अधिक है, लेकिन वहां पर हमें पोलिथीन खुले में फेंका हुआ नहीं दिखाई देगा। हमारे यहां हम असली पहाड़ों को खत्म करने पर तुले हैं, लेकिन कचरे के पहाड़ बना डाले हैं। उन पहाड़ों पर हर तरह का कचरा शामिल है। खुले में फैंक दिया गया यह कचरा दुर्गंध, किटाणु व बिमारियां पैदा कर रहा है। हमारे यहां पोलिथीन का गैर-जरूरी इस्तेमाल भी देखने में आता है। ये सारी स्थितियां प्राकृतिक असंतुलन का कारण बन रही हैं। पेड़ लगाने के नाम पर ढोंग और दिखावे का बोलबाला है। एक पौधा रोप कर कई-कई व्यक्ति कईं-कईं बार फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डाल कर पर्यावरण प्रेमी बन जाते हैं। कई बार लगाए गए पौधों की देखभाल नहीं हो पाती है और वे सूख जाते हैं। इसलिए पौधारोपण के साथ-साथ पौधापोषण की योजना पर गंभीरता से जुटने की जरूरत है। जंगलों को संरक्षित करने की जरूरत है। विकास के जो तौर-तरीके हमने अपना लिए हैं, उन पर पुनर्विचार की जरूरत है। विकास योजनाओं को आगे बढ़ाते हुए प्रकृति व पर्यावरण का ध्यान रखा जाना अत्यंत जरूरी है।

-अरुण कुमार कैहरबा
(लेखक पर्यावरण चिंतक एवं स्तंभकार हैं)
इन्द्री (करनाल) मो.नं.-9466220145 
(लेखक के निजी विचार हैं)

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