केरल बाढ़ के गंभीर सबक 

भारत में लिखित संविधान से पहले नदियों को मां का अधिकार देने वाला अलिखित संस्कार-व्यवहार दिया गया था। दुर्भाग्य से लिखित संविधान में वैसी व्यवस्था नदियों के लिए नहीं की गई। जबकि नदियां बाढ़-सुखाड़ से किसी भी राष्ट्र को नष्ट कर सकती हैं। यह प्रकृति और नदियों का क्रोध कहलाता है। इस क्रोध से बचने के लिए भारत के लोगों ने नदियों को अपनी मां कहा और उनके साथ जीवित इंसान की तरह ही व्यवहार किया। नदियों को जोडऩा-मोडऩा और उन्हें खोदना समाज में जघन्य अपराध कहा जाता था। अब हालत यह है कि सभी नदियों को खोदना-जोडऩा अथवा रोकना विकास के लिए जरूरी माना जाता है। चूंकि भारतीय संस्कृति और नदियों की दृष्टि अब बची नहीं है, इसलिए आजादी के बाद नदियों के क्रोध की गति तेज होती जा रही है। आजादी के बाद ओडिशा, बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में छोटी-छोटी बाढ़ आती थी। लोग बाढ़ के साथ कुछ कष्ट उठाने के बाद भी आनंदित रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे बाढ़ का आतंक बढऩे लगा। अब बाढ़ प्रलयंकारी बनती जा रही है। केरल की बाढ़ तो प्रलय ही है।

पिछले पांच सालों से देखना शुरू करें तो 2013 में उत्तराखंड और 2014 में जम्मू-कश्मीर में भीषण बाढ़ आई। इसके साथ ही दूसरे राज्यों में भी बाढ़ और सुखाड़, दोनों की मार भी देखी गई। 2015 में महाराष्ट्र का मराठवाड़ा एवं बीदर और मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड सुखाड़ झेल रहा था, लेकिन मध्य प्रदेश के सतना जिले में आई बाढ़ ने बस, कार और लोगों को एक साथ डुबा दिया था। अभी केरल में हुई अनियमित वर्षा ने तो इस सदी की भीषणतम बाढ़ दिखा दी। भारत सरकार और केरल सरकार, दोनों ही परेशान हैं। वहां बाढ़ प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वास्तविक नुकसान का आकलन अभी शेष है।

भारत को बाढ़ और सुखाड़ के आतंक से मुक्ति पाने हेतु नदियों के साथ-साथ प्रकृति को मानव अधिकार की तरह ही अधिकार देने होंगे। नदियों का बहता हुआ जल सौ साल में जहां-जहां तक पहुंचता है, वह जमीन नदी की ही होती है। इस जमीन का उपयोग नदी के लिए ही करना चाहिए। इस जमीन की तीन श्रेणियां होती हैं। पहली, नदी प्रवाह क्षेत्र यानी जहां नदी बहती है। दूसरी, नदी का सक्रिय बाढ़ क्षेत्र और तीसरी, नदी का उच्चतम बाढ़ क्षेत्र। उच्चतम बाढ़ क्षेत्र निष्क्रिय बाढ़ क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में सौ साल में एक-दो बार ही बाढ़ आती है। सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में आमतौर पर 25 साल में पांच बार बाढ़ आती है। इन तीनों तरह की जमीन को नदी के लिए संरक्षित और सुरक्षित रखना राज, समाज और वैज्ञानिकों का साझा दायित्व है।

समस्या यह है कि आजकल नदियों को केवल अन्न् और विद्युत उत्पादन का साधन मान लिया गया है। विकास की भाषा में बांधों को बाढ़ रोकने वाला साधन बताया जाता है। निश्चित तौर पर बांध कभी-कभी बाढ़ रोकने में मदद कर सकते हैं, लेकिन अतिवृष्टि या बादलों के फटने पर बांध बड़ी बाढ़ का संकट भी पैदा करते हैं। केरल की बाढ़ तो बांधों के कारण ही आई। भारी बारिश के बाद सभी बांधों के गेट एक साथ खोलने पड़े।

नदियों को अपनी आजादी से बहने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार में लगातार कटौती की जा रही है। नतीजा यह है कि उनका प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है। सरकारें नदियों की प्रकृति प्रदत्त आजादी छीनने का हक नहीं रखतीं, फिर भी नदियों से यह हक छीना जा रहा है। कहीं-कहीं तो पूरी तरह छीन लिया गया है। यदि हम नदियों की आजादी को मानवीय आजादी के साथ जोड़कर उन्हें आजाद नहीं करेंगे, तो बाढ़ के प्रकोप से बचना मुश्किल हो जाएगा।

केरल की बाढ़ हमारे तथाकथित विकास ने पैदा की। मानवीय सेहत की तरह ही नदी की सेहत भी ठीक रहनी चाहिए। आम लोगों और सरकारों ने नदियों की सेहत को नष्ट करने का काम किया है। नगर निगमों, नगर पालिकाओं, पंचायतों आदि ने नदियों को प्रदूषणकारी नालों से जोड़कर अपना गंदा जल उनमें बेरोकटोक डालने का काम किया है। इससे मानवीय शिराओं और धमनियों की तरह धरती की शिरा और धमनी रूपी नदियां प्रदूषित हो गई हैं। नदियों का प्रदूषण अब मानवीय सेहत को भी बिगाड़ रहा है। 44 नदियों वाले प्रदेश केरल में एक भी नदी का पानी पीने योग्य नहीं बचा है। उनमें औद्योगिक एवं रासायनिक प्रदूषण बहुत ही अधिक बढ़ गया है। जिस तरह दूध से भरी मटकी में एक बूंद छाछ पूरी मटकी के दूध को दही में बदल देता है, उसी प्रकार औद्योगिक और रासायनिक प्रदूषण भी बड़े से बड़े जल भंडार को प्रदूषित कर देता है। इस पर आश्चर्य नहीं कि केरल की बाढ़ के बाद पीने के पानी का संकट गहरा गया है।

बेलगाम खनन के कारण भी केरल की नदियों पर संकट आया। खनन से बने खड्डे नदियों की सेहत खराब करते हैं। नदियों में आने वाली प्लास्टिक ऊपर से आई गाद के साथ उनके तल में जमी जाती है और उनका प्रवाह स्तर ऊपर उठता जाता है। सबसे अधिक शिक्षित प्रदेश केरल आज यदि बाढ़ की भयानक चपेट में है तो इसका अर्थ है कि हमारे वर्तमान और साझे भविष्य को समझने की शिक्षा हमें नहीं दी जा रही है। हम सुख-सुविधाओं के लालच में प्रकृति की जितनी अनदेखी कर रहे हैं, हमें उतने ही ज्यादा बाढ़-सुखाड़ झेलने पड़ रहे हैं। सुख-सुविधाओं से सुसज्जित कांच, सीमेंट और कांक्रीट के हमारे भवनों ने जलवायु परिवर्तन का संकट बढ़ाया है। इसी संकट के कारण जहां बेमौसम बारिश बढ़ी है, वहीं जल प्रबंधन के नाम पर केवल कोरी बातें ही अधिक हो रही हैं।

यह एक तथ्य है कि केरल में 8 से 18 अगस्त के बीच हुई अनियमित वर्षा ने कहर ढाया। हमें मुंबई, चेन्न्ई, हैदराबाद, सतना, पटना आदि की बाढ़ से सीख लेनी चाहिए थी, लेकिन हमारी सरकारें ऐसा करने से इनकार कर रही हैं। भारत की भू-संरचना पर जो निर्माण किया जा रहा है, उससे खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। धरती कुरूप बनती जा रही है। नदियों में आने वाली बाढ़ जिन क्षेत्रों से मिट्टी लेकर आती है, उन क्षेत्रों के बेमिट्टी होने से वहां सुखाड़ आने का खतरा बढ़ता है। हमने जलवायु परिवर्तन के क्रम को समझकर अपने विकास का क्रम सुनिश्चित नहीं किया है। यदि हमारा विकास का क्रम जलवायु परिवर्तन के साथ बदले और वर्षा के क्रम के साथ जुड़ जाए तो हम बाढ़-सुखाड़ से बच सकते हैं।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।