Monday, May 20, 2019 04:42 PM

कै. अमरेन्द्र सिंह की चेतावनी

पंजाब में लोकसभा चुनावों को लेकर जो उदासीनता दिखाई दे रही थी वह अकाली-भाजपा गठबंधन द्वारा घोषित उम्मीदवारों और नामांकन पत्र भरने के सिलसिले से समाप्त हो गई है। अब राजनीतिक दलों की आंतरिक गुटबाजी और कलह ही उनके लिए एक चुनौती बनकर खड़ी है। उपरोक्त स्थिति को देखते व समझते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरेन्द्र सिंह ने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों और कांग्रेस के विधायकों को लोकसभा चुनावों को लेकर चेतावनी दी है। मिशन-13 को पूरा करने के लिए कै. अमरेन्द्र सिंह ने जो लिखित चेतावनी दी है वह इस प्रकार है - हाईकमान के दिशा-निर्देशों के अनुसार जो मंत्री लोकसभा चुनाव में अपने विधानसभा हलकों में कांग्रेस उम्मीदवारों को बढ़त नहीं दिला सकेगा उनकी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी जाएगी। इसी तरह से कांग्रेस हाईकमान ने अपने विधायकों को भी अनुशासन के घेरे में ले लिया है। पार्टी ने चुनावों के बाद बोर्डों व कार्पोरेशनों में की जाने वाली नियुक्तियों को लेकर भी अपने नियम कड़े कर दिए हैं। लोकसभा चुनाव में नेताओं की परफॉर्मेंस को देखने के बाद ही चेयरमैनियां अलॉट की जाएंगी। मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने कहा कि बोर्डों तथा कार्पोरेशनों में योग्यता को लेकर मापदंड अब बदल दिए गए हैं। कांग्रेसी नेताओं को आगे आने का अवसर तभी मिलेगा जब चुनाव में उनकी कारगुजारी अच्छी रहेगी। पार्टी ने अब परफॉर्मेंस को आधार बनाकर भविष्य में पदोन्नतियां देने का निर्णय लिया है। इस संबंध में वरिष्ठता को आधार नहीं बनाया जाएगा बल्कि कांग्रेस के प्रति निष्ठा व चुनाव में किए जाने वाले काम को आधार बनाया जाएगा। राहुल गांधी उन नेताओं को प्रोत्साहित करेंगे जो जमीनी स्तर पर चुनावों में काम करेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष चाहते हैं कि पार्टी तथा जनता के बीच दूरी को खत्म किया जाए। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जनता से अपनी दूरी कम करनी चाहिए। हाईकमान के निर्देशों में यह भी कहा गया है कि कांग्रेस विधायकों को अब अपने-अपने हलकों में कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में डट कर कार्य करना होगा। कांग्रेस नेतृत्व किसी भी तरह की ढील सहन नहीं करेगा। कांग्रेस का मानना है कि अब चूंकि चुनावी प्रक्रिया अंतिम चरण में प्रवेश करने जा रही है तथा एक-एक सीट की महत्ता राहुल गांधी के लिए है, इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने सख्ती कर दी है। 

उपरोक्त चेतावनी से स्पष्ट है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व पंजाब से एक बड़ी सफलता की आशा लगाकर बैठा है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस यह भी समझ रही है कि पंजाब में जब 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे तब और आज की स्थिति में बदलाव दिखाई दे रहा है। अकाली दल बादल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल और उनकी पत्नी हरसिमरत बादल तथा भाजपा से सनी दिओल के चुनाव मैदान में उतरने से पंजाब में कांग्रेस के लिए मिशन-13 पूरा करना असम्भव सा बना गया है। कै. अमरेन्द्र सिंह का पंजाब की जनता में पहले से आकर्षण कम हो गया है।  इस बात का अहसास प्रदेश कांग्रेस और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को हो रहा है। इसीलिए उन्होंने मंत्रियों और विधायकों पर दबाव बनाकर स्थिति को संभालने का प्रयास ही किया है।

धरातल का सत्य यह है कि कै. अमरेन्द्र सिंह की व्यक्तिगत छवि तो ठीक है लेकिन कांग्रेस सरकार की साख व छवि दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है और इसका मुख्य कारण जनप्रतिनिधियों पर नौकरशाही का हावी होना ही है। मुख्यमंत्री का अपना स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता इसलिए वह अपने भरोसेमंद नौकरशाहों पर ही निर्भर हैं। जनप्रतिनिधियों की नौकरशाही नहीं सुनती। इसलिए लोकसभा चुनावों में जनप्रतिनिधियों की दिक्कतें बढऩे वाली हैं। जनप्रतिनिधि कितने कम समय में कोई सकारात्मक बदलाव ला सकेंगे, यही एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। अब आने वाला समय ही बताएगा कि जनप्रतिनिधि अपने लक्ष्य प्राप्ति में कितने सफल होते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री कै. अमरेन्द्र सिंह ने हार-जीत का मामला अपने से हटा मंत्रियों व विधायकों के कंधों पर डाल कर एक तुरुप चाल ही चली है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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