राम के राज में कृष्ण की अनदेखी, इस बार की दीवाली भी रहेगी फीकी !

बद्दी (विशेष संवाददाता): राजनीति एक ऐसी चीज है जिसमें उल्टफेर की संभावनाएं तो रहती हैं लेकिन भाग्य का चक्र भी साथ-साथ चलता है। या यूं कहें कि किसी को घर से निकलते ही मंजिल मिल गई, लेकिन कुछ ताउम्र मंजिल की तलाश में भटकते रहे। दूसरी ओर यह भी कटू सत्य है कि सियासत आज में और आज की होती है, लेकिन दूरदर्शिता भी उसका एक अटूट हिस्सा है। हम बात कर रहे हैं जिला सोलन के सबसे बड़े विस क्षेत्र नालागढ़ की, जहां राम के राज में कृष्ण को वनवास मिला हुआ है वो भी 3 साल से। वह 2017 में कांग्रेस नेता लखविंद्र राणा से मात्र 1223 वोटों से चूक गए थे। वो छोटी सी चूक उनके लिए अब नासूर बन चुकी है।

अब हालात ये हैं कि न तो उनको संगठन में जगह मिल पाई है और न ही उनको सत्ता में भागीदारी मिल पाई है। यानि लम्हों (1223) ने खता की और सदियों ने सजा पाई। विधायक पद हारने के दो साल बाद तक कृष्ण लाल ठाकुर जिला प्रधान रहे लेकिन उसके बाद यह पद उनके धुर विरोधी व विद्यार्थी परिषद के नेता आशुतोष वैद्य को मिल गया जिनसे उनका हमेशा 36 का आंकड़ा रहा है। अब आलम यह है कि कृष्ण लाल ठाकुर (के.एल.) की भाजपा में वो प्रासंगिता नहीं बची जो होनी चाहिए थी। इस साल की दीवाली पर भी कृष्ण को तोहफा मिलेगा या नहीं यह अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है। 

बढ़त दिलाना नहीं आया काम 
पार्टी ने लोस चुनाव 2019 में पार्टी ने साफ कहा था कि जो जितनी बढ़त दिलाएगा उसी हिसाब से उसको सत्ता की भागीदारी यानि चाश्नी में मीठा मिलेगा। हालांकि यह चुनाव मोदी के नाम लड़ेे गए लेकिन नालागढ़ में 40 हजार की बढ़त दिलाने में सर्वाधिक योगदान के.एल. ठाकुर का रहा था। लोस चुनाव के बाद उनको आस थी अब उनकी निष्ठा समर्पण व कर्मठता को देखते हुए पाटी न किसी अहम पद से अवश्यक नवाजा जाएगा। उस समय यह तर्क दिया कि जो लोग अभी संगठन के किसी भी पद पर हैं उनको पद नहीं मिलेगा जैसे कि जिलाध्यक्ष या मंडलाध्यक्ष। के.एल. जो उस समय जिला प्रधान थे मन मसोस कर रह गए कि अब उनका यही पद उनके आड़े आय गया या और उन्हें अपने कार्यकाल के खत्म होने का इंतजार करना पड़ा। 

के.एल. के विरुद्ध पार्टी में उनके कद का कोई नेता भी नहीं

वर्तमान में नालागढ़ में के.एल के विरुद्ध पार्टी में उनके कद का कोई नेता भी नजर नहीं आता। उनके विरुद्ध बागी होकर चुनाव लडऩे वाले सैणी परिवार के राजनीति वारिस हरप्रीत सैणी भी अपनी पार्टी में रहकर अभी लंबी गेम खेलने के इंतजार में है। जिला प्रधान आशुतोष वैद्य व उनका परिवार भी सियासी तौर पर संगठन में व्यस्त है और पत्ते खोलने से गुरेज कर रहा है क्योंकि दिल्ली अभी दूर है। पर जो भी हो इस समय में नालागढ़ के लाल यानि कृष्ण का सत्ता का वनवास अभी दो साल और जारी रहने की संभावना है। चर्चा है कि के..एल. की एडजस्टमेंट को लेकर हर नियम लागू है लेकिन जब कोई दूसरे को कुछ बनाना हो तो उस शर्त में रियायत दे दी जाती है। वहीं सत्ता व संगठन में विद्यार्थी परिषद से निकले नेताओं को भविष्य में अधिमान मिलता रहेगा जैसा कि पूर्व में यह छाप स्पष्ट देखने को मिल रही है। 

बिना कोई नाराजगी जाहिर किए अभी भी फील्ड में

पहले से यह चर्चा चली थी कि सोलन जिले के नालागढ़ व अर्की में कोई सरकारी झंडी नहीं है, लेकिन इसी बीच अचानक सीएम के करीबी योगेश भरतिया ने जोगिंद्रा बैंक के निदेशक का चुनाव लड़ा और वह बैंक के चेयरमैन भी बन गए जिससे के.एल. का नालागढ़ का विरोधी गुट बल्लियां उछालने लगा कि अब नालागढ़ की झंडी की बात पूरी हो गई और के.एल. के चेयरमैन बनने की आस खत्म हो गई। अब कुल मिलाकर अर्की ही ऐसा विस रह गया है जहां सरकार की कृपा नहीं हुई है। हालांकि के.एल. ठाकुर अपनी हार से किंचित भी भयभीत न होकर व बिना कोई नाराजगी जाहिर किए एक भी दिन फील्ड से आऊट नहीं हुए और दिन-रात मैदान में डटे हुए हैं। सरकार द्वारा किए जा रहे हर छोटे-बड़े विकास कार्य का वो परेक्ष अपरोक्ष रूप से उद्घाटन भी कर रहे हैं यानि एक प्रकार से सरकार ने नालागढ़ में उनको एकछत्र नेता माना हुआ है, लेकिन तमगा लगना अभी बाकी है। 

सभी एडजस्ट हो गए पर कृष्ण पर नहीं हुई कृपा

सत्ता में आते ही जयराम सरकार में यह बात चली थी कि हारे हुए विधायकों को सत्ता में कोई भागीदारी नहीं मिलेगी तो सब पूर्व विधायक संतुष्ट हो गए थे कि चलो हम सब एक बराबर हैं तो के.एल. ने भी चैन की सांस ली। उसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकले व हारे हुए पूर्व विधायकों व उम्मीदवारों की एकाएक करके विभिन्न बोर्डों व निगमों में ताजपोशी होती गई और के.एल. मुंह देखते रह गए कि उनका कसूर क्या है? इसमें विद्यार्थी परिषद से निकले चेहरे बलदेव तोमर, विजय अग्रिहोत्री, प्रो. राकुमार, सतपाल सिंह सत्ती आदि अहम पदों पर एडजस्ट हो गए लेकिन भाजपा के कृष्ण पर राम (जय) की कृपा नहीं हुई। आशा थी कि जिलाध्यक्ष के पद से हटने के बाद के.एल. की सियासी नाव को पतवार जरूर मिलेगी, लेकिन इस दौरान कई रोड़े उनके आगे अटकते रहे जिसमें से नालागढ़ के कुछ नेता व उनके धुर विरोधी हैं।