Wednesday, November 21, 2018 02:06 AM

बाढग़्रस्त केरल

अगस्त के प्रथम सप्ताह से शुरू हुई वर्षा ने पिछली करीब एक सदी के रिकार्ड को तोड़ दिया है। वर्षा के कारण नदियों में आये उफान को देखते हुए केरल के 39 बांधों में से 33 के फाटक खोलने पड़े जिस कारण केरल के अधिकतर जिले जल-थल में बदल गए। प्रतिदिन 25 से 30 लोगों के मरने के समाचार आ रहे हैं। बाढ़ की वजह से अभी तक अनुमानित नुकसान 20 हजार करोड़ का है। कृषि और व्यापार पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। सड़कें नष्ट हो चुकी हैं, 300 के करीब पुल टूट चुके हैं। केरल का पर्यटन उद्योग बाढ़ की वजह से बुरी हालत में है।

बाढग़्रस्त केरल के लिए अभी कोई अच्छी खबर है तो यही है कि अगले कुछ दिन वर्षा नहीं होने वाली। वर्षा के बंद हो जाने के कारण 14 जिलों से रैड अलर्ट हटा लिया गया है, 11 में अभी जारी है। बाढ़ के कारण 7 लाख से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं और सैकड़ों की मौत हो चुकी है। एक लाख करोड़ के कर्जे में दबे केरल की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से लडख़ड़ा चुकी है। राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से 2000 करोड़ रुपए की सहायता मांगी थी। केंद्र सरकार ने अभी 500 करोड़ रुपए की अंतरिम राहत की घोषणा की है।

केरल को देवताओं के निवास की भूमि के तौर पर भी जाना जाता है। केरल अपनी प्रकृति सुन्दरता के लिए देश व दुनिया में विशेष पहचान रखता है लेकिन प्रकृति के कहर के कारण केरल असहाय व बेबस महसूस कर रहा है। केरल की वर्तमान समस्या कोई रातों रात नहीं आई बल्कि इसका आधार तो उसी दिन से रख दिया गया था जिस दिन वहां की नदियों के घाटों व जंगलों से आदमी ने अपने स्वार्थ हेतु छेड़छाड़ शुरू कर दी थी। पिछले एक दशक में जिस तरह से वहां नदियों व जंगलों के साथ छेड़छाड़ हुई उसी का परिणाम आज केरलवासी भुगत रहे हैं।

प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के कारण संतुलन बिगड़ रहा है और जलवायु में परिवर्तन आ रहा है। जलवायु में आ रहे परिवर्तन के परिणाम कभी देश में और कभी विदेश में देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका की वर्जीनिया टेक के सहायक प्रोफेसर राबर्ट वेरस के मुताबिक अगर समुद्र स्तर में मामूली सी भी बढ़ोतरी होती है तो सुनामी के खतरे में कई गुणा बढ़ोतरी हो जाएगी। प्रो. राबर्ट अनुसार अगर समुद्र स्तर बढ़ता है तो विश्वभर के तटीय शहरों पर भूंकम और सुनामी से बाढ़ आने के कारण भारी तबाही होगी।

केरल में आई बाढ़ का बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन ही है। प्रकृति से खिलवाड़ को लेकर समाज व सरकार की उदासीनता ही अब आत्मघाती साबित होने लगी है। केरल में बारिश के थमने के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं व लोगों के रहने व खाने-पीने का इंतजाम करना एक बड़ी चुनौती सरकार व समाज के सामने है। केंद्र व प्रदेशों की विभिन्न सरकारों ने केरल को धनराशि देने के साथ-साथ खाद्य सामग्री भी भेजने की घोषणा की है, राहत कार्य भी शुरू हो गया है।

केरल की मुसीबत की घड़ी का सकारात्मक पक्ष यह है कि केंद्र से लेकर कई राज्य सरकारों ने तत्काल रूप से राहत कार्य में हाथ बढ़ाकर बद से बदतर होती स्थिति को संभालने में अवश्य सहायता की है। केंद्र सरकार ने दवाओं के साथ-साथ डाक्टरों की टीमें भी भेजी हैं और केरल में 6000 के करीब स्वास्थ्य केंद्र भी लोगों की सहायता के लिए खोले हैं। सरकार के साथ-साथ देश के अन्य भागों से भी केरलवासियों को सहायता देने व सामग्री देने का कार्य शुरू हो चुका है। केरल को इस समय हर प्रकार की और हर स्तर पर सहायता की आवश्यकता है। सहायता के लिए कई हाथ व संगठन आगे आये हैं, यह इस बात को दर्शाती है कि भाषा व क्षेत्र कोई भी हो लेकिन भारत एक है। भारत के किसी भी भाग, क्षेत्र या प्रदेश में आई मुसीबत सभी भारतीयों के लिए एक चुनौती है। चुनौती व मुसीबत की घड़ी में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर शुरू हुए राहत कार्यों में तालमेल बिठाने के लिए भी काम किया जाना चाहिए। तालमेल कमेटी के बनने के साथ ही राहत कार्य में तेजी आएगी। विशेषतय गैर सरकारी संगठनों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।

मुसीबत की घड़ी में अगर सहयोगियों के हाथ बढ़े हैं तो कई ऐसे भी होंगे जो इस घड़ी का लाभ उठा अपने घर भरना चाहेंगे। इन असामाजिक तत्वों पर स्थानीय प्रशासन को नजर रखनी होगी। अपराधी मानसिकता वाले तत्वों पर नजर बनाकर रखना स्थानीय प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। देश व दुनिया में बैठे प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य बनता है कि वह बाढग़्रस्त केरल की सहायता के लिए अपने सामथ्र्य अनुसार मदद करे।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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