कश्मीरी पंडितों की घर वापसी

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राममाधव और जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा पिछले दिनों 1990 में कश्मीर घाटी से जेहादियों और आतंकियों के भय से पलायन कर गये कश्मीरी पंडितों की घर वापसी को लेकर दिए बयान जम्मू-कश्मीर में ही नहीं देश भर में चर्चा का कारण बने हुए हैं। राज्यपाल मलिक ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के लिए घाटी में एक अलग से नगर बसाया जाएगा, जिसमें स्कूल-कालेज और खेल के मैदान होंगे तथा सुरक्षा के लिए पुलिस व सुरक्षा बलों का पहरा रहेगा। राज्यपाल ने यह भी कहा कि जिन लोगों ने पंडितों के घरों पर अवैध रूप से कब्जा किया हुआ है उन्हें खुद उनको वापस कर देना चाहिए इससे आपसी विश्वास व भाईचारा बढ़ेगा।

2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा नेतृत्व और मोदी सरकार ने घाटी में कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक वापसी की बात कही थी लेकिन किसी कारण यह नहीं हो पाया। आज भी करीब 3.50 लाख के करीब कश्मीरी पंडितों को जम्मू सहित अन्य जगहों पर कैंपों में रहना पड़ रहा है। पंडितों के लिए घाटी में एक अलग कालोनी को लेकर भाजपा महासचिव राममाधव द्वारा दिए बयान का कश्मीर घाटी के क्षेत्रीय दलों के नेता यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इससे आपसी दरार स्थाई हो जाएगी। दूसरी तरफ पंडितों का एक वर्ग स्थाई रूप से सुरक्षा बलों के साये को लेकर परेशान है। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेताओं का यह भी कहना है कि केवल सुरक्षा बलों से कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती, आपसी विश्वास का होना भी आवश्यक है। इस पर जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल का कहना है कि घाटी के नेताओं की सुरक्षा जब केंद्रीय सुरक्षा बल कर रहे हैं तो फिर पंडितों की सुरक्षा को लेकर क्यों हायतौबा की जा रही है। जहां तक आपसी विश्वास की बहाली की बात है तो यह घाटी के स्थानीय नेताओं का काम है। स्थानीय लोग पंडितों के अवैध ढंग से कब्जा किये घरों की वापसी करके भी आपसी विश्वास बहाली कर सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर में लोकसभा चुनावों में जहां जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में मतदाताओं ने बड़ी संख्या में मतदान किया था वहीं घाटी क्षेत्र में मतदान बहुत कम हुआ। इस बात को देखते हुए ही राज्यपाल ने कहा है कि घाटी के नेताओं की साख ही क्षेत्र में कमजोर होती जा रही है। इस स्थिति पर इन नेताओं को भी सोचने की आवश्यकता है। घाटी में कश्मीरी पंडित अपने घरों में आज लौटना भी चाहें तो नहीं लौट सकते, क्योंकि अधिकतर घर तो खण्डर बन चुके हैं। जो रहने के काबिल बचे हैं उन पर स्थानीय लोगों का कब्जा है। ऐसे में पंडितों की वापसी के लिए अलग स्थान और नये मकानों की आवश्यकता है। घाटी में पंडितों के लिए एक सुरक्षित स्थान समय की मांग है, इसे पूरा करना प्रदेश और केंद्र सरकार की जिम्मेवारी है।

कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी को लेकर तथा आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को देखते हुए बुद्धिजीवी नरेन्द्र सहगल ने अपनी पुस्तक 'व्यथित जम्मू-कश्मीरÓ में इस प्रकार लिखा है-कश्मीर में भारत, हिन्दू संस्कृति, कश्मीर की प्राचीन गौरवशाली परम्परा और वास्तविक कश्मीरियत के प्रतिनिधि, प्रतीक और रक्षक कश्मीरी पंडित आज अपने ही देश भारत में विभिन्न स्थानों पर शरणार्थी की जिंदगी जी रहे हैं। चार लाख से भी ज्यादा इन कश्मीरी पंडितों को हिन्दू होने की स•ाा मिली है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के शिकार इन पंडितों के अलावा लगभग ऐसे भी लाखों कश्मीरी पंडित हैं जो 1947 के पहले और बाद में बहुसंख्यक मुस्लिम समाज की बेरुखी और मजहबी जुनून का शिकार होकर कश्मीर छोड़ चुके हैं। अपने घरों से बेघर हुए ये सभी हिन्दू अपनी मातृभूमि कश्मीर में लौटने के लिए लालायित हैं परंतु कश्मीर की विस्फोटक परिस्थितियां, अलगाववादियों की हिन्दुत्व विरोधी मानसिकता, आतंकवादियों का खौफ और उनकी पंडितों को न लौटने की हिदायतें इन हिन्दू विस्थापितों की घर वापसी में बाधाएं बन रही हैं। कश्मीर में विस्थापित पंडितों की अनेक संस्थाएं अपनी सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी के लिए कार्यरत हैं। कई प्रकार के सुझाव प्रस्तुत किए जा रहे हैं, परंतु मुख्य सुझाव यही है कि वहां इस प्रकार की परिस्थितियों का निर्माण किया जाए जिनमें आतंकी हिंसा, एकतरफा अनियंत्रित मजहबी जुनून, धार्मिक तानाशाही और क्षेत्रीय भेदभाव का कोई स्थान न हो, तभी पंडितों की घर वापसी सुरक्षित हो सकेगी। इसके लिए मुस्लिम समाज को आगे आकर अपने पंडित भाइयों को सुरक्षा की गारंटी देनी होगी। यह काम बहुत कठिन और खतरे से खाली नहीं है। जुनूनी आतंकवादी तो किसी को भी नहीं छोड़ते। विस्थापित पंडितों की एक संस्था पनुन कश्मीर प्रारंभ से ही घाटी में हिन्दू होमलैंड की मांग कर रही है ताकि सभी कश्मीरी पंडित एक साथ एक सुरक्षित स्थान पर रह सकें। यह होमलैंड केंद्र शासित हो और उसकी सुरक्षा व्यवस्था भारत सरकार करे। अगर बहुसंख्यक मुस्लिम समाज विस्थापित पंडितों को इनके अपने घरों में सुरक्षा नहीं दे सकता तो इन्हें कश्मीर में रहने के लिए अलग से धरती दी जाए। हालांकि कश्मीरी पंडितों का पूरे कश्मीर पर पूरा हक है और अपने घरों में रहना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है, परंतु कट्टरपंथियों, अलगाववादियों और आतंकवादियों ने कश्मीर में ऐसे हालात बना दिए हैं कि वहां हिन्दुओं का अपने घरों, गावों और शहरों में रहना मौत को गले लगाना जैसा हो गया है। विस्थापित पंडितों की इसी मजबूरी में से निकली है होमलैण्ड की मांग। यह होमलैण्ड भी कितना सुरक्षित होगा? इस प्रश्न का उत्तर भी भविष्य की अंधेरी परतों में समाया हुआ है। 'हिन्दू होमलैण्ड' के फार्मूले में विस्थापित कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में वापसी की एक किरण तो जरूर नजर आती है, परंतु यह सुनहरा ख्वाब वास्तविकता में कैसे बदलेगा इस पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं। इस होमलैण्ड की जमीन का फैसला कौन और कैसे करेगा? उस जमीन पर रहने के लिए घरों, व्यापार के लिए उचित जगहों, कृषि, फलों के बगीचों, शिक्षण सस्थानों, आवागमन के साधनों का बंटवारा कैसे होगा? क्या सभी कश्मीरी पंडित एक साथ एक कथित होमलैण्ड में जाकर रहना चाहेंगे? क्या यह होमलैण्ड सदैव भारतीय सेना के साए में रहेगी? इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्म पर बंटने वाला कश्मीर हिन्दू होमलैण्ड में फिर से आतंकवाद नहीं फैलाएगा? आतंकी युवकों को हिन्दू होमलैण्ड में घुसपैठ करने से कौन रोकेगा? चारों ओर से मुस्लिम कश्मीर से घिरे हुए इस हिन्दू कश्मीर की स्थिति बत्तीस दांतों से अकेली जुबान जैसी होगी। लिहाजा कश्मीरी पंडितों को इनके घरों में ही सुरक्षित वापस भेजने की कोई ठोस योजना बननी चाहिए।

कटु सत्य यही है कि कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी एक बड़ा ही पेचीदा मामला है, इसे हल करने के लिए जहां सुरक्षा बलों के साथ-साथ कश्मीरी पंडितों की अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति भी चाहिए और इसके साथ मुस्लिम समाज से बातचीत कर आपसी विश्वास का रास्ता भी खोलना होगा, तभी स्थाई तौर पर कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक ढंग से घर-वापसी हो सकेगी।

इरविन खन्ना,  मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।