सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार से लेकर अयोध्या में जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण तक भारत की यात्रा

10:32 AM Aug 04, 2020 |

मध्य एशिया के इसलामी आक्रांताओं से लगभग 600 साल तथा यूरोपीय गोरे अंग्रेजों से लगभग २०० साल की गुलामी के बाद 1947 में भारत को खंडित होकर स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इतने लंबे कालखंड तक गुलामी से मुक्ति मिलने के बाद भारतीयों के मन में था भारत अब पराधीनता से स्वतंत्र हो चुका है तथा  अपने हजारों वर्षों के वैभवशाली सभ्यता व संस्कृति व परंपराओं से ऊर्जा ग्रहण कर भविष्य के स्वर्णिम रास्ते पर भारत अग्रसर होगा। स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद द्वारा दिखाए गए मार्ग पर अग्रसर होगा। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं। स्वतंत्र भारत में सत्ता में आने वाले नेता भारत के वैभवशाली सभ्यता, संस्कृति व परंपरा को अस्वीकार कर दिया। नए भारतीय शासक उनके गोरे महाप्रभुओं द्वारा स्थापित अवधारणाओं अर्थात ब्रिटिश सरकार के रीति नीति व सांस्कृतिक अवधारणाओं को ही आगे बढ़ाया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अंग्रेजों की तरह भारत को डिस्कवर करने में व्यस्त थे। उन्होंने भारत को कितना डिस्कवर किया उसके बारे  में तो पता नहीं लेकिन डिस्कवरी के लिए उन्होंने जो मेथोडोलाजी व मानक अपनाया वे गोरों का था। नेहरु भारतीय सभ्यता, संस्कृति व परंपरा से अपने आप को भावनात्मक रुप से जोड़ नहीं पा रहे थे। उनके लिए भारत की हजारों सालों की भारतीय सभ्यता व संस्कृति एक मृत प्राय संस्कृति थी जिसका स्वतंत्र भारत में किसी प्रकार  का स्थान नहीं था ।

इसी तरह नेहरु हजारों सालों की भारतीय सभ्यता व संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण कर आगे का रास्ता तय करने के बजाय भारत की इस सभ्यता व संस्कृति से  काट कर आगे बढने का प्रयास किया। इसलिए यह कहा गया है कि भारत विश्व में एक मात्र देश हो जिसने अपनी संस्कृति को आधिकारिक रुप से खारिज कर दिया। जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय सभ्यता-संस्कृति विरोधी दृष्टिकोण का बार-बार परिचय दिया है। यहां दो उदाहरण देना पर्याप्त होगा। अंग्रेजों के शासनकाल में भारत से अनेक लोग वेस्ट इंडीज, सुरीनाम, फिजी आदि  देशों में गये थे। उन्हें गिरमिटिया मजदूरों के नाम से जाना जाता है। भारत के बाहर रहने वाले ये भारतवंशी अपने हिन्दू संस्कृति व मूल्यों से जुड़े रहने के लिए भरसक प्रयास करते रहते हैं। लेकिन फिर भी विदेश में हिन्दू मूल्यों की रक्षा करना कठिन विषय हो जाता है। अब क्योंकि भारत गुलामी से स्वतंत्र हो गया था तथा इन भारतवंशियों में आस जगी कि अब भारत की नई सरकार उनकी संस्कृति लकी रक्षा करने में सहायता करेगी। इस कारण ट्रिनिडाड के लोगों के कहने पर वहां के एक सांसद शंभूनाथ कपिलदेव भारत आए। वह भारत आकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिले और उनकी हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए भारत सरकार से सहायता मांगी। नेहरु  के जवाब सुनकर वह स्तब्ध थे। उन्होंने शंभुनाथ से कहा कि आप कैसे दकिनानुसी बातें कर रहे हैं ।

भारत एक सकुलर देश है और ट्रिनिडाड के लोगों को भारत किसी प्रकार की सहायता नहीं कर सकती। भारत भौतिक विकास के मार्ग पर अग्रसर है और आप लोग इस तरह की बातें कर भारत को पीछे धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। शंभूनाथ काफी दुखी हुए। अब दूसरा उदाहरण यानी सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का उदाहरण को लेते हैं। विदेशी हमलावरों द्वारा बार बार हमले का शीकार होने वाली सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार मामले  में भी जवाहरलाल नेहरु का इसी तरह का दृष्टिकोण था । उनके मंत्रिमंडल में सहयोगी केएम मुंशी ने अपनी पुस्तक पिलग्रिमेज टू फ्रीडम पुस्तक में इस बारे में विस्तार से बताया है। बार बार हमले का शीकार व भग्न सोमनाथ मंदिर की पीडा को सरदार बल्लभ भाई पटेल समझ रहे थे। उन्होंने इस मंदिर का पुनरुद्धार किये जाने की घोषणा की थी। लेकिन इसके पुनरुद्धार का मामला जब उठा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इसका पुरजोर विरोध किया था। यह काम कैसे न हो पाये इसके लिए उनका प्रयास था। श्री मुंशी ने अपने पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि एक कैबिनेट की बैठक के बाद नेहरु ने उन्हें कहा कि आप लोगों द्वारा सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार को लेकर किए जा रहे प्रयास मुझे अच्छे नही लग रहे हैं। यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। इस मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद गये थे।

प्रधानमंत्री नेहरु के विरोध के बावजूद वह इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे । उस कार्यक्रम में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के शामिल होने  की खबरें स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई, लेकिन नेहरु के कहने पर उसे सरकारी दस्ताबेंजों में स्थान नहीं दिया गया। यहां तक कि आकाशवाणी से इस संबंधी समाचार का प्रसारण नहीं हुआ। जवाहर लाल नेहरू ने ऐसा कर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया था। लेकिन अब 1947 से 2020 हो चुकी हैं। अब स्थितियां बदल रही हैं। वर्तमान की सरकार भारत के हजारों सालों की सभ्यता- संस्कृति व परंपरा को लेकर किसी प्रकार की हीनभावना का शीकार नहीं है बल्कि इसको लेकर गर्व है। वर्तमान का भारत अपने इस सभ्यता व संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण कर अग्रसर होने को संकल्पित है। आगामी पांच अगस्त को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर  भूमिपूजन कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपस्थित रहना इसका प्रमाण है । यह घटना कोई साधारण घटना नहीं है बल्कि ये अपने आप में ऐतिहासिक घटना है। इतिहास करवट ले रहा है। सैंकड़ों सालों की गुलामी के बाद 1947  में भारत को जिस मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए था, अब भारत उसी मार्ग पर अग्रसर होगा, यह घटना इस बात को रेखांकित करती है। यह घटना पूरे विश्व को यह संदेश प्रदान करेगा कि अब गोरों द्वारा स्थापित अवधारणाएं नहीं बल्कि भारत के अवधारणाएं व भारतीयता के आधार पर भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा। यह भारत का पुनर्जागरण काल होगा। -डॉ. समन्वय नंद