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नारी शिक्षा के हिमायती थे ईश्वर चंद्र विद्यासागर

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नारी शिक्षा के हिमायती थे ईश्वर चंद्र विद्यासागर

'अपना काम स्वयं करोÓ सिद्धांत के प्रवर्तक ईश्वर चंद्र विद्यासागर नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे, जिन्होंने सदैव लोगों को अपने क्रियाकलापों के माध्यम से स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की सीख दी। नारी शिक्षा के लिए तो उन्होंने व्यापक जनान्दोलन खड़ा किया ही था, उन्हीं के निरन्तर प्रयासों और दृढ़संकल्प की बदौलत ही वर्ष 1856 में ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज सरकार विधवा पुनर्विवाह कानून पारित करने को विवश हुई थी, जिसके बाद भारतीय समाज में विधवाओं को नए सिरे से जीवन की शुरूआत कर सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हुआ था। दरअसल उस समय हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति काफी चिंताजनक थी। इसीलिए उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए लोकमत तैयार किया और उनके अटूट प्रयासों की बदौलत ही 'विधवा पुनर्विवाह कानूनÓ पारित हो सका था। यह कानून पारित होने के तीन महीने बाद ही उन्होंने एक विधवा कमलादेवी का विवाह प्रतिष्ठित घराने के एक युवक के साथ कराया था, जो बंगाल का पहला विधवा विवाह था। उन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह 1856-60 के बीच सम्पन्न कराया। यही नहीं, अपने इकलौते पुत्र नारायण का विवाह भी एक विधवा से कराकर समस्त उन्होंने भारतीय समाज के समक्ष कथनी और करनी के भेद को खत्म करने की अविस्मरणीय मिसाल पेश की थी।
नारी शिक्षा के लिए गंभीर प्रयास करते हुए उन्होंने बैठने स्कूल की स्थापना की और करीब तीन दर्जन स्कूल खुलवाए। इतना ही नहीं, इन स्कूलों के संचालन के लिए पूरे खर्च की जिम्मेदारी भी उन्होंने स्वयं उठाई थी। दरअसल स्कूलों के खर्च के लिए वे विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए बंगाली में लिखी गई किताबों की बिक्री से फंड जुटाते थे। स्थानीय बांग्ला भाषा तथा लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कलकत्ता में मैट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना भी की थी। ब्रिटिश शासनकाल में ऐसे कॉलेज विरले ही होते थे, जिनका संचालन पूर्ण रूप से भारतीयों के ही हाथों में हो और जहां पढ़ाने वाले सभी शिक्षक भी भारतीय ही हों किन्तु ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने कोलकाता में वर्ष 1872 में विद्यासागर कॉलेज की स्थापना कर यह कारनामा भी कर दिखाया था।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर को भारतीय समाज में स्वतंत्रता सेनानी, लेखक, समाज सुधारक, शिक्षाविद्, दार्शनिक इत्यादि अनेक रूपों के स्मरण किया जाता है, जिनकी 29 जुलाई को पुण्यतिथि मनाई जाती है। 29 जुलाई 1891 को यह महान् शख्सियत हमेशा के लिए अटल शून्य में विलीन हो गई। हमेशा समाज की भलाई के लिए सोचने और समाज के लिए कुछ अलग करते रहने के कारण ही उन्हें एक महान् समाज सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी भी माना जाता रहा है।

-श्वेता गोयल 
(लेखिका शिक्षिका हैं)

 

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