दिल में फंसा था लोहे का टुकड़ा, 5 घंटे के ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने बचाई जान

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद में एक स्टील की फैक्ट्री में काम करने वाले 35 वर्षीय सतीश के दिल में एक मेटल का टुकड़ा फंस गया था जो काफी बड़ा था। वो कहते हैं जिसे भगवान बचाना चाहता है उसे किसी न किसी रूप में बचा ही लेता है लेकिन भगवान खुद तो आकर बचाता नहीं है वह किसी न किसी रूप में प्रगट होता है। सतीश वाले मामले में भगवान डॉक्टर के रूप में अवतरित हुआ और उसकी जान बचा ली। 

इस मामले में नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में कार्डियो थोराटिक ऐंड वास्कुलर सर्जरी के हेड व अडिश्नल डायरेक्टर वैभव मिश्रा ने कहा, मैंने अपने 15 साल के करिअर में ऐसा केस न देखा और न सुना लेकिन हमने फैसला किया कि सर्जरी करेंगे क्योंकि मरीज इंतजार नहीं कर सकता था। 5 घंटों तक कई अस्पतालों में चक्कर काटने के बाद वह फोर्टिस पहुंचा था और खून लगातार बहता ही जा रहा था। खैर सतीश बच गया और अब उसे खतरे से बाहर बताया जा रहा है। 

घटना 9 अगस्त की बताई जा रही है। बाकी दिनों की तरह ही सामान्य था, जब सतीश फैक्ट्री में आयरन ड्रिलिंग कर रहे थे। अचानक उसका एक टुकड़ा उनपर छिटका और उनके सीने को भेद गया। ऐसा लगा मानो बंदूक से निकली कोई गोली उनके सीने में जा लगी हो। यह था धातु का करीब 4 सेंटीमीटर लंबा टुकड़ा। कोई कुछ समझ पाता कि आखिर क्या हुआ, उससे पहले ही सतीश जमीन पर बेसुध गिर पड़े और उनके सीने से तेजी से खून बहने लगा। 

स्थानीय अस्पताल में ले जाया गया तो पता चला कि उनके सीने में लोहे का टुकड़ा घुस गया है। लोहे के टुकड़े की वजह से उनके फेफड़े खराब हो गए और टुकड़ा दिल के राइट चैंबर में घुस गया। शुक्र है कि लोहे का टुकड़ा उस मुख्य धमनी में नहीं घुसा था जो हृदय तक खून पहुंचाने का काम करती है, जिसकी वजह से तत्काल मौत हो सकती थी। चूंकि मेटल का टुकड़ा दिल में धंस गया था, हैमरेज नहीं हुआ जो कि जानलेवा हो सकता था। हालांकि इसका मतलब यह नहीं था कि सतीश को तत्काल सर्जरी किए बगैर बचाया जा सकता था। 

सतीश के साथ काम करने वाले तीन लोगों ने बताया कि सिकंदराबाद और गाजियाबाद के तीन अस्पतालों ने उनकी सर्जरी करने से इनकार कर दिया। आखिरकार नोएडा के फोर्टिस हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने जोखिम उठाने का फैसला किया। नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में कार्डियो थोराटिक ऐंड वास्कुलर सर्जरी के हेड व अडिश्नल डायरेक्टर वैभव मिश्रा ने कहा, मैंने अपने 15 साल के करिअर में ऐसा केस न देखा और न सुना लेकिन हमने फैसला किया कि सर्जरी करेंगे क्योंकि मरीज इंतजार नहीं कर सकता था। 5 घंटों तक कई अस्पतालों में चक्कर काटने के बाद वह फोर्टिस पहुंचा था और खून लगातार बहता ही जा रहा था। 

दोपहर करीब 12:30 बजे मरीज को ऑपरेशन थिअटर ले जाया गया और डॉक्टरों की टीम ने उनका सीना चीरकर मेटल के टुकड़े को बाहर निकाला। आमतौर पर सर्जन दिल की धड़कनों को रोककर हार्ट ऐंड लंग मशीनों के जरिए शरीर के बाकी हिस्सों तक खून पहुंचाते हैं। इस केस में ऐसा नहीं किया गया। दिल धड़क रहा था और सीना चीरकर मेटल निकाला गया क्योंकि ऐसा न करने से स्ट्रोक का खतरा हो सकता था।

डॉक्टरों ने कहा कि एक छोटी-सी गलती भी जान ले सकती थी लेकिन हम सफल हुए। इस घटना को एक महीना हो चुका है और 4 बच्चों के पिता सतीश फिट हैं। दोबारा काम पर जाने लगे हैं। सतीश कहते हैं, मेरे साथ काम करने वाले लोगों को मेरे जिंदा बचने पर यकीन ही नहीं होता।

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