भारत की चीन पर आर्थिक स्ट्राइक

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अतिक्रमण को लेकर भारत और चीन की सेनाओं के बीच १५-१६ जून की दरम्यानी रात गलवान इलाके में हिंसक झड़प हो गई थी जिसमें भारतीय सेना के एक अधिकारी समेत १९ जवानों की मौत हुई है। एलएसी के दोनों ओर एशिया के इन दो ताकतवर देशों की सेनाएं खड़ी हैं। पीछे हटने के लिए कमांडर स्तर की बातचीत हो रही है लेकिन हालात अभी सामान्य नहीं हुए हैं। गलवान की घटना को लेकर भारत के लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। चीन को सबक सिखाने के लिए सीमा पर जहां हमारे बहादुर सैनिक तैनात हैं, वहीं देश के अंदर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की शुरुआत हो गई है। सरकार के इशारे पर चीनी कंपनियों के साथ हुए कई करार रद्द कर दिए गए हैं। ग्राहक भी चीनी सामान लेने से परहेज करने लगे हैं। जब से गलवान की हिंसा में २० सैनिक शहीद हुए हैं तब से पूरा देा गमगीन हो गया। ऐसे में हर कोई यही चाहता है कि भारत चीन को सबक सिखाए। न्यूज चैनलों के माध्यम से टीवी पर भी यह दिखाया जा रहा है कि अगर युद्ध होता है तो किसके पास कौन-कौन से हथियार है और युद्ध में किसका पलड़ा भारी रहेगा खून-खराबे से इतर भी भारत के लोग सोचते हैं कि भारत चीन को बंदूक से नहीं बल्कि अर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। 

चीन के साथ तनाव के बीच भारत ने चीन पर डिजिटल वार किया है भारत ने एक झटके में टिक टॉक समेत ५९ ऐप्स को बैन कर दिया है। मोदी सरकार के इस फैसले के बाद से चीन में हडक़ंप मचा हुआ है। इसी बीच चीन को एक और बड़ा झटका देने के लिए एक मांग तेज हो गयी है। अब भारत में नेपाल के चाइनीज पावर र्पोजेक्ट से बिजली न खरीदने की भी मांग तेज हो गयी है। हाल ही में कैट ने अपने राष्ट्रीय अभियान भारतीय सामान-हमारा अभिमान’’ के अंतर्गत कमोडिटी की ४५० से अधिक कैटेगरी की वृहद सूची जारी की। इस सूची में ३००० से अधिक ऐसे उत्पाद हैं, जो चीन में निर्मित होकर भारत में आयात होते हैं जबकि भारत में भी इनका निर्माण होता है। इनके बहिष्कार का आह्वान कैट ने अपने अभियान के र्पथम चरण में किया है- भारतीय ट्रेडर्स ने चीन को कारोबार के मोर्चे पर करारी शिकस्त देने के लिए एक मेगा एक्शन प्लान तैयार किया। इसके जरिए दिसंबर २०२१ तक चीन से इंपोर्ट को १ लाख करोड़ रुपये घटाने की तैयारी है। ट्रेडर्स पहले से ही आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल की दिशा में चीनी उत्पादों के बहिष्कार का कैंपेन चला रहे थे।

देश के हर भाग में आम जनता के बीच चीनी उत्पादों के बहिष्कार का सिलसिला शुरू हो ही गया है, भारत की कंपनियों ने भी चीन से आयात से मुक्ति के कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मोदी सरकार ने तो चीन से आयात की निर्भरता को कम करने की कवायद काफी पहले ही शुरू कर दी है। गलवान की घटना के बाद चीन से होने वाले व्यापार, निवेश और ‘र्पोजेक्ट सर्विसेज’ पर लगाम लगाने की व्यापक तैयारी हो रही है। सरकारी ठेकों और ढांचागत परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को हटाने का सिलसिला शुरू हो गया है। चीन से आने वाले माल पर पहले से ही ‘हाई टैरिफ’ और ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ लगाने का कार्य शुरू हो गया है। सामान्य उपयोग के चीनी सामान के आयात पर भी नकेल कसी जा रही है। चीन के साथ कारोबार को समाप्त करने का जबरदस्त नुकसान चीन को उठाना पड़ेगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि बीते शताब्दी के आखिरी दशक से जो सरकारी नीतियां बनती रहीं उससे देश में चीन का निर्यात बढ़ता रहा। वर्तमान में चीन से भारत द्वारा आयात लगभग ५-२५ लाख करोड़ रुपए अर्थात ७० अरब डॉलर वार्षिक का है। चीन भारत से आज जितने का माल खरीदता है उसके पांच गुना मूल्य का माल वह भारत को बेचता है। २०१८-१९ में भारत ने चीन को १६-७ अरब डॉलर यानी १-२ लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया, जबकि इस अवधि में ७०-३ अरब डॉलर का यानी करीब ५-३२ लाख करोड़ रुपए का आयात किया। यानी भारत को ४-१ लाख करोड़ रुपए  का व्यापार घाटा हुआ। इस तरह से अगर भारत चीन के साथ कारोबार खत्म करता है तो इसका सीधा और बड़ा घाटा चीन को होगा। वह अपना माल खपाने का एक बहुत बड़ा बाजार खो देगा।

गलवान की घटना के बाद हरियाणा सरकार ने दो चीनी कंपनियों को मिले ठेके रद्द कर दिए हैं। मालूम हो कि चीन की कंपनी ‘बीजिंग एसपीसी एनवायरनमेंट र्पोटेक्शन टेक’ को यमुनानगर स्थित दीनबंधु छोटूराम थर्मल पावर प्लांट के लिए ठेका दिया गया था। इसके अलावा ‘शंघाई इलेक्ट्रिक कॉर्प’ का चयन हिसार के राजीव गांधी थर्मल पावर प्लांट के लिए किया गया था। इन कंपनियों को इन दोनों संयंत्रों में ७८० करोड़ रुपए की लागत से र्पदूषण नियंत्रण उपकरण लगाना था। अब राज्य सरकार ने नए सिरे से ठेका देने का फैसला लिया है, लेकिन उसमें सिर्फ भारत में पंजीकृत कंपनियां भाग ले सकेंगी। महाराष्ट्र सरकार और चीनी कंपनियों के साथ हुए समझौता ज्ञापनों का राज्य में पुरजोर विरोध हो रहा है। इस कारण अब उन समझौतों के रद्द होने के आसार बढ़ गए हैं। उल्लेखनीय है कि भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प से ठीक पहले महाराष्ट्र सरकार ने सामूहिक रूप से ५,००० करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की तीन चीनी कंपनियों के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था। भारतीय रेलवे ने भी चीनी कंपनी से अपना एक करार खत्म कर दिया है। २०१६ में डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (भारतीय रेलवे) और चीनी कंपनी के बीच ४७१ करोड़ रुपए का करार हुआ था। इसके तहत कंपनी को कानपुर से पं- दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन तक ४१७ किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक पर ‘सिग्नल सिस्टम’ लगाना था। अब काम में गति कम होने का हवाला देते हुए रेलवे ने इस ठेके को रद्द कर दिया है। इस परियोजना में चार साल में सिर्फ २० फीसदी ही काम हुआ है। 

ये घरेलू पाबंदियां भी चीन के खिलाफ आर्थिक र्पतिबंधों से कम असरदार नहीं होंगी क्योंकि भारत बहुत बड़ा बाजार है और चीन अब तक उसका जी भर फायदा उठाता रहा है- ये देखने में भले ही धीमा लगे लेकिन चीन के लिए ये जोर का झटका होगा। बिलकुल वैसे ही जैसे सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान तिलमिला उठा था। लद्दाख में चीन ने जो किया है वो भी ऐसे दौर में जब उसी के दिये हुए दर्द से भारत और पूरी दुनिया कराह रही है। कोरोना जैसी विभीषिका देकर चीन ने तो पूरी दुनिया को तबाह करने की जंग पहले से ही छेड़ रखी है। अब तो वो धीरे-धीरे अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए नये-नये तौर तरीके अख्तियार कर रहा है और अलग-अलग हथकंडे अपना रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के सामने चौतरफा चुनौतियां हैं- एक तरफ कोरोना वायरस है तो तीन तरफ चीन, पाकिस्तान और नेपाल। एक सच ये भी है कि ये मोदी सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है और पूरे कार्यकाल में अब तक आयी सबसे बड़ी चुनौती भी- सरकार इनका सामना बड़ी सूझ-बूझ से कर रही है।