गांवों वाला भारत

रेडियो पर प्रसारित अपनी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मौजूदा हालात से देश को अतीत के अवलोकन और भविष्य के लिए सीखने का अवसर मिला है। श्रमिकों की दक्षता पर काम हो रहा है और प्रवास आयोग बनाने की बात हो रही है। वैश्विक महामारी के कारण सभी वर्गों के लोग प्रभावित हुए हैं, लेकिन सबसे अधिक मार गरीबों पर पड़ी है। प्रधानमंत्री ने कहा, अगर हमारे गांव, कस्बे, जिले, राज्य आत्मनिर्भर होते, तो हमारे सामने मौजूद अनेक समस्याओं ने वह रूप नहीं धारण किया होता, जिस रूप से हमारे सामने खड़ी हंै। उन्होंने कहा, संकट की सबसे बड़ी चोट हमारे गरीब, मजदूर, श्रमिक वर्ग पर पड़ी है। उनकी तकलीफ, उनका दर्द, उनकी पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। हममें से कौन ऐसा होगा, जो उनकी और उनके परिवार की तकलीफों को अनुभव कर रहा हो। हम सब मिलकर इस तकलीफ को बांटने का प्रयास कर रहे हैं। आज हमारे श्रमिकों की पीड़ा में हम देश के पूर्वी हिस्से की पीड़ा को देख सकते हैं। जिस पूर्वी हिस्से में देश के विकास का इंजन बनने की क्षमता है, जिसके श्रमिकों के बाहुबल में देश को नई ऊंचाई पर ले जाने का सामथ्र्य है, उस पूर्वी हिस्से का विकास बहुत आवश्यक है। पूर्वी भारत के विकास के लिहाज से काफी काम हुआ है और अब प्रवासी मजदूरों को देखते हुए कई नए कदम उठाना जरूरी हो गया है। 

पूर्णबंदी के दौरान विशेष श्रमिक रेलगाडिय़ां चलाकर लाखों-करोड़ों की उनके गांवों में वापिसी कराई जा चुकी है। रह गए लाखों मजदूरों की वापिसी के लिए सरकार लगातार कार्य कर रही है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि घर वापसी के दौरान जो कुछ मजदूरों को झेलना पड़ा वह दिल दहला देने वाला था। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और उसने देश और प्रदेशों की सरकारों को फटकारते हुए मजदूरों को बुनियादी सुविधाएं विशेषतया खाना इत्यादि का इंतजाम करने को कहा। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि एम्स, जेएनयू, बीएचयू समेत अन्य संस्थानों के जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के कोविड-19 कार्यबल की एक रिपोर्ट में कहा गया कि लौट रहे प्रवासी अब देश के हर हिस्से तक संक्रमण लेकर जा रहे हैं। ज्यादातर उन जिलों के ग्रामीण और शहरी उपनगरीय इलाकों में जा रहे हैं जहां मामले कम थे और जन स्वास्थ्य प्रणाली अपेक्षाकृत कमजोर है। इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन (आइपीएचए), इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (आइएपीएसएम) और इंडियन एसोसिएशन ऑफ एपिडेमोलॉजिस्ट (आइएई) के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास भेजा गया है।

उन्होंने बताया कि भारत में 25 मार्च से 30 मई तक देशव्यापी पूर्णबंदी सबसे सख्त रही और इस दौरान कोविड-19 के मामले तेजी से बढ़े। जनता के लिए इस बीमारी के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध होने के कारण ऐसा लगता है कि चिकित्सकों और महामारी विज्ञानियों ने सरकार को शुरुआत में सीमित फील्ड प्रशिक्षण और कौशल के साथ सलाह दी। उन्होंने सुझाव दिया कि जांच के नतीजों समेत सभी आंकड़े अनुसंधान समुदाय के लिए सार्वजनिक किए जाने चाहिएं ताकि इस वैश्विक महामारी पर नियंत्रण पाने का समाधान खोजा जा सके। संक्रमण के फैलने की दर कम करने के लिए सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करने की जरूरत पर जोर देते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि इसके साथ ही बेचैनी और पूर्णबंदी संबंधी मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं से निपटने के लिए सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने के कदमों को भी बढ़ावा देने की जरूरत है।

मजदूरों का शहरों की तरफ पलायन पिछले कई दशकों से केवल और केवल रोजी रोटी के लिए ही हुआ है। कोरोना के कारण वह रोटी-रोजी और सिर से छत भी छिन गई। ऐसी परिस्थितियों में मजदूर के पास गांव वापसी के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया था। इस कारण वह अकेले अपने बलबूते पर अपने गांव की ओर निकल पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी ने मजदूरों की दयनीय स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रवासी मजदूरों की यह स्थिति न होती अगर गांव आत्मनिर्भर होते।  धरातल का कटु सत्य यही है कि गांवों में बसने वाले भारत के गांव आज भी पिछड़े हैं। गांववासी रोजी रोटी के लिए शहरों पर ही निर्भर हैं। यह स्थिति आजादी के पहले से ही चली आ रही है। गांवों की आर्थिक रूप से पिछड़े होने की स्थिति को लेकर महात्मा गांधी ने कहा था -अगर गांव और गांववासियों को मजबूत करना है तो हमें उन उद्योगों और धंधों को मजबूत करना होगा जो गांववासी दशकों से करते आये हैं। मात्र मशीनीकरण से कुछ नहीं होने वाला। गांधी ने कहा था ‘ग्रामोद्योगों की योजना के पीछे मेरी कल्पना तो यह है कि हमें अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताएं गांवों की बनी चीजों से ही पूरी करनी चाहिए, और जहां यह मालूम हो कि अमुक चीजें गांवों में मिलती ही नहीं, वहां हमें यह देखना चाहिए कि उन चीजों को थोड़े परिश्रम और संगठन से बनाकर गांव वाले उनसे कुछ मुनाफा उठा सकते हैं या नहीं।

मुनाफे का अंदाजा लगाने में हमें अपना नहीं, किंतु गांव वालों का ख्याल रखना चाहिए। संभव है कि शुरू में हमें साधारण भाव से कुछ अधिक देना पड़े और चीज हलकी मिले। पर अगर हम उन चीजों के बनाने वालों के काम में रस लें और यह आग्रह रखें कि वे बढिय़ा से बढिय़ा चीजें तैयार करें, और सिर्फ आग्रह ही नहीं रखें बल्कि उन लोगों को पूरी मदद भी दें, तो यह हो नहीं सकता कि गांवों की बनी चीजों में दिन-रात तरक्की न होती जाए। मैं कहूंगा कि अगर गांवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जाएगा। उस हालत में भारत, भारत नहीं रहेगा। दुनिया को उसे जो संदेश देना है, उस संदेश को वह खो देगा। गांवों में फिर से जान तभी आ सकती है, जब वहां की लूट-खसोट रुक जाए। बड़े पैमाने पर माल की पैदावार जरूर ही व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा माल निकालने की धुन के साथ-साथ गांवों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से होने वाली लूट के लिए जिम्मेवार है। इसलिए हमें इस बात की सबसे ज्यादा कोशिश करनी चाहिए कि गांव हर बात में स्वावलम्बी और स्वयंपूर्ण हो जाएं। वे अपनी जरूरतें पूरी करने भर के लिए चीजें तैयार करें। ग्रामोद्योग के इस अंग की अगर अच्छी तरह रक्षा की जाये, तो फिर भले ही देहाती लोग आजकल के उन यंत्रों और औजारों से भी काम ले सकते हैं, जिन्हें वे बना और खरीद सकते हैं।

शर्त सिर्फ यही है कि दूसरों को लूटने के लिए उनका उपयोग नहीं होना चाहिए। सच तो यह है कि हमें गांवों वाला भारत और शहरों वाला भारत, इन दो में से एक को चुनना है। गांव उतने ही पुराने हैं जितना कि यह भारत पुराना है। शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है। जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को गांवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा। आज तो शहरों का बोलबाला है और वे गांवों की सारी दौलत खींच लेते हैं। इससे गांवों का ह्रास और नाश हो रहा है। गांवों का शोषण खुद एक संगठित हिंसा है। अगर हमें स्वराज्य की रचना अहिंसा के पाये पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्थाना देना होगा।’ शहर तो गांवों के मातहत होते हैं या नहीं यह तो आने वाले समय ही बताएगा, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि कोरोना महामारी ने गांवों वाले भारत की कम•ाोरी अवश्य जगजाहिर की है। इस कमजोरी को केवल और केवल ग्राम उद्योगों को मजबूत करके ही पूरा किया जा सकता है। मात्र मशीनीकरण से समस्या सुलझने वाली नहीं, शहरीकरण समस्या को और बढ़ा देगा।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।