डॉन को पकड़ना हुआ मुमकिन, दाऊद को दबोचने के लिए भारत-अमेरिका ने मिलाया हाथ  

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज):मास्टरमाइंड और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के खिलाफ कार्रवाई करनेे के लिए अमेरिका भारत का साथ देने के लिए राजी हो गया है। 2+2 वार्ता के दौरान दोनों देश के बीच दोस्ती की नई इबारत लिखी जा रही है। अब दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ साथ मिलकर लड़ेंगे। अमेरिका ने आतंकवाद और उनके सहयोगियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता जताई। अमेरिका ने कहा है कि वह दाऊद को ढूंढने में भारत की पूरी तरह से मदद करेगा।

वार्ता के दौरान पाकिस्तान से संचालित कई आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की बात हुई। ये फैसला इसलिए भी काफी अहम हो जाता है, क्योंकि दाऊद की कुछ संपत्तियां अमेरिका में भी हैं। अब अगर अमेरिका इनपर भी कार्रवाई करता है, तो ऐसे में ये चोट सीधे दाऊद को लगेगी।

भारत और अमेरिका ने गुरुवार को पाकिस्तान को ताकीद करते हुए कहा कि वह अपनी धरती का इस्तेमाल सीमापार आतंकी हमलों के लिए नहीं होने दे। साथ ही, पाकिस्तान से पूर्व में आतंकी हमलों के लिए दोषी अपराधियों के खिलाफ जल्द कानून कार्रवाई करने की मांग की गई।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो और रक्षामंत्री जिम मैटिस ने यहां टू प्लस टू मंत्रिस्तरीय वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा, मंत्रियों ने क्षेत्र में किसी प्रकार के छद्म आतंकी हमले की भर्त्सना की और इस संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान से यह सुनिश्चत करने को कहा कि उसके नियंत्रण वाले क्षेत्र का इस्तेमाल दूसरे देशों पर आतंकी हमले करने के लिए न हो। 

मंत्रियों ने 2017 में आतंकियों के नाम पर द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने का स्वागत किया, जोकि अलकायदा, आईएसआईएस, लश्करे तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन, हक्कानी नेटवर्क, तहरीक-आई-तालिबान पाकिस्तान, डी-कंपनी और अन्य संबंधित संगठनों समेत आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने में सहयोग को मजबूती मिलती है।

जानकारी के लिए बता दें कि दाऊद इब्राहिम भारत का मोस्टवांटेड अपराधी है। मुंबई बम धमाकों के बाद वह भागकर पाकिस्तान में जा छिपा था। तब से वह वहीं से अपने काले कारोबार का संचालन कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दाऊद के खिलाफ खुफिया जानकारियों को साझा करना भारत के लिए अभी काफी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि इससे डी-कंपनी में मौजूद सूत्रों की जान खतरे में पड़ सकती थी लेकिन अब द्विपक्षीय प्लेटफार्म पर इस तरह की सहमति बनने से सभी जानकारियां अमेरिका को साझा की जा सकेंगी। 

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