भारत-चीन झड़प

पिछले कुछ समय से जिस तरह चीन भारतीय सीमा पर अपने सैनिकों व शस्त्रों की संख्या बढ़ा रहा था। उसको लेकर भारत की जो आशंका थी वह सोमवार को चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प से स्पष्ट हो गई है। दोनों देशों के सैनिकों के बीच पेगांग झील क्षेत्र में हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के एक अधिकारी और दो जवान शहीद हो गए हैं। सेना ने जारी एक वक्तव्य में कहा है कि दोनों सेनाओं के जवानों के अपनी-अपनी जगहों से पीछे हटने की प्रक्रिया के तहत यह झड़प सोमवार रात पेगांग झील क्षेत्र में हुई जिसमें सेना के एक अधिकारी और दो जवान शहीद हो गए। दोनों पक्षों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी गलवान घाटी में बातचीत कर रहे हैं जिससे तनाव को दूर कर स्थिति को सामान्य किया जा सके। सेना ने स्पष्ट रूप से कहा है कि झड़प में दोनों ओर के सैनिक मारे गये हैं। हालांकि यह नहीं बताया गया है कि चीन के कितने सैनिक हताहत हुए हैं। चीन ने ग्लोबल टाइम्स में दावा किया है कि दोनों पक्षों के बीच हुई झड़प में उसके पांच सैनिक मारे गए हैं, जबकि 11 सैनिक घायल हुए हैं। सेना ने यह भी साफ किया है कि झड़प के दौरान फायरिंग नहीं हुई है।

उल्लेखनीय है कि पूर्वी लद्दाख में पिछले एक महीने से भी अधिक समय से दोनों सेनाओं के बीच गंभीर गतिरोध बना हुआ है। इस गतिरोध को दूर करने के लिए पिछले कुछ सप्ताह में दोनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं। गत 6 जून को हुई लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता के बाद दोनों सेनाओं ने अपने सैनिकों को कुछ पीछे हटाने का निर्णय लिया था। पीछे हटने की प्रक्रिया के दौरान ही यह झड़प हुई है। पिछले एक महीने में दोनों सेनाओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट भारी वाहनों, उपकरणों और जवानों का जमावड़ा बढ़ा दिया है। दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व की ओर से निरंतर कहा जा रहा है कि इस मुद्दे का समाधान बातचीत के जरिये निकाला जायेगा। दोनों सेनाओं के अधिकारियों के बीच सोमवार को भी एक बैठक हुई थी। दोनों सेनाओं के बीच हुई झड़प के बाद बातचीत के जरिये गतिरोध को दूर करने के प्रयासों को ठेस लगी है। भारत और चीन सीमा पर पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में दोनों सेनाओं के जवानों के बीच हिंसक झड़प के मद्देनजर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बैठक में चीफ आफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे के साथ स्थिति की समीक्षा की है। सूत्रों के अनुसार राजनाथ सिंह ने सेना के वरिष्ठ नेतृत्व से झड़प के बारे में विस्तार से जानकारी ली और आगे की योजना पर चर्चा की। बैठक में इस घटना के बाद उत्पन्न स्थिति से संबंधित तमाम पहलुओं पर बातचीत की गई। वहीं, बीजिंग ने इसे लेकर अनर्गल आरोपों का दौर भी शुरू कर दिया है। उसने भारतीय सैनिकों पर घुसपैठ का आरोप लगाते हुए कहा है कि भारतीय सैनिक उसके क्षेत्र में अवैध रूप से दाखिल हुए। एएफपी की खबर के मुताबिक, बीजिंग ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा है कि भारतीय सैनिकों ने सीमा पार करके चीनी सैनिकों पर हमला किया।

चीन पर भरोसा करना ही गलती है। चीन ने एक तरफ बातचीत करने का ढोंग किया और दूसरी तरफ जो भारतीय अधिकारी बातचीत के बीच एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था, उसे ही मार दिया। चीन की इस दादागिरी और विस्तारवादी वृत्ति को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में चीन की विस्तारवादी वृत्ति को लेकर जो कहा था वह आज भी सार्थक है। वाजपेयी जी ने 16 नवम्बर 1959 को संसद में बोलते हुए कहा था ‘चीन की आकांक्षा विस्तारवादी है। मुझे खेद है कि हमारे सुरक्षा मंत्री ने अभी कांग्रेस पार्टी की बैठक में कहा कि चीन से हमारे 2000 साल पुराने मित्रता के संबंध थे। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि चीन तो शुरू से विस्तारवादी रहा है। किसकी बात पर विश्वास किया जाए यह समझ में नहीं आता। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि जिस चीन से हमारे 2000 वर्ष के सांस्कृतिक संबंध थे वह चीन मर गया, वह चीन समाप्त हो गया, जिस चीन को हमारे उपदेशक बौद्ध भगवान बुद्ध का संदेश लेकर गए थे, उस चीन को कम्युनिस्टों ने खत्म कर दिया। जहां से ह्वेनसांग और फाह्यान आए थे मित्रता का संदेश लेकर, वह चीन मर गया और उस चीन को चिता-भस्म के ऊपर एक नया चीन खड़ा है, साम्राज्यवादी चीन खड़ा है, विस्तारवादी चीन खड़ा है। पिछले वर्षों में चीन ने अपनी सीमा कितनी बढ़ाई है, इसका हमें विचार करना चाहिए।

जो मंचूरिया 1911 तक चीन पर राज्य करता था, आज कहीं उसका नामोनिशान तक बाकी नहीं है। वह चीन का उत्तर-पूर्वी भाग भर रह गया है। जो कभी तुर्किस्तान था वह सिकियांग बन गया है। इनर मंगोलिया अपना अस्तित्व खो बैठा है। धर्मप्राण तिब्बत भी चीन की सर्वग्रामी क्षुधा का शिकार हो चुका है। चीन का अपना भूभाग केवल 14 लाख वर्गमील है, किंतु मंचूरिया, इनर मंगोलिया, कांसू, चिंघाई, सिकियांग तथा तिब्बत की 22 लाख वर्गमील भूमि पर चीन ने अपना अधिकार जमा लिया है। अब उसकी गिद्ध दृष्टि भारत की 48000 वर्गमील भूमि पर लगी हुई है। एक शरणार्थी लामा ने यह सनसनीपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है कि चीनी यह प्रचार कर रहे हैं कि तिब्बत चीन के हाथ की हथेली है और लद्दाख, भूटान, सिक्किम, नेपाल और आसाम उसकी पांच उंगलियां हैं। स्पष्ट है कि यदि लद्दाख और लौंग्जू में चीन की आक्रमणात्मक कार्रवाइयों का शीघ्र प्रति-उत्तर नहीं दिया गया तो फिर चीन को बढ़ावा मिलेगा और हमारी सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी।’

अटल जी ने 1959 में जो शंका जताई थी, 1962 के चीनी हमले ने उसे सच साबित कर दिया। 1962 के चीनी आक्रमण को भूलकर भारत ने चीन से संबंध सुधारने की पहल करते हुए 1988 में आपसी व्यापार शुरू किया और आज स्थिति यह है कि भारतीय बाजार चीनी उत्पादों से भरे पड़े हैं। आज के समय में कोई भी देश अपनी धरती पर युद्ध नहीं चाहता लेकिन जब अपने स्वाभिमान पर ही चोट हो तो युद्ध से भागा भी नहीं जा सकता। चीन के साथ युद्ध आज नहीं तो कल लडऩा ही पड़ेगा। अतीत में भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने चेतावनी देते हुए कहा था कि भारत का कोई दुश्मन है तो वह चीन ही है। चीन भारत को विकसित होते नहीं देख सकता।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल व पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने चीन संबंधी जो बातें कही थीं वह आज भी सार्थक और सच साबित हो रही हंै। चीन ने पाकिस्तान व नेपाल के माध्यम से भारत पर दबाव डालने की कोशिश की लेकिन जब उसे लगा कि दोनों देश भारत पर दबाव डालने में असफल हो रहे हैं तो फिर उसने स्वयं आगे आकर सीमा पर दबाव बनाना शुरू किया। लद्दाख में हुई सैनिक झड़प उसी का एक उदाहरण है।

भारत-चीन में युद्ध कब शुरू होगा इसका निर्णय तो सरकार व सेना ही लेेगी लेकिन हम भारतीय तो इसी पल से चीनी उत्पाद न खरीदने का संकल्प लेकर तथा चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर अपने स्तर पर आज से ही चीन विरुद्ध जंग शुरू कर सकते हैं। देश की आन, शान और मान के लिए हर भारतीयों को चीन विरुद्ध जंग में भाग लेना होगा। तभी चीन की दादागिरी पर नकेल डाली जा सकेगी। भारत सरकार को देश व दुनिया को चीनी बदनीति बारे बताना होगा। भारतीय जन को विश्वास में लेते हुए चीन विरुद्ध एक ठोस नीति अपनाकर चलना होगा। चीन पर राजनीतिक, आर्थिक व सैनिक तीनों स्तर पर दबाव बनाकर चलने की आवश्यकता है। चीन के आंतरिक हालात खराब हंै। आर्थिक विकास गति धीमी हो रही है और कोरोना महामारी के कारण उस की विश्व में साख व छवि कम•ाोर हो गई है।  उपरोक्त बातों से अपने नागरिकों का ध्यान हटाने के लिए चीन कुछ भी कर सकता है। इसलिए भारत को अति सतर्क रहने की आवश्यकता है। भारत को सैन्य नहीं तो राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर तो अभी से चीन विरुद्ध युद्ध छेडऩा होगा, तभी चीन पर नकेल कसी जा सकेगी।  

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।