भारत-चीन झड़प: अतीत के आईने और भविष्य के मायने

मई के पहले पखवाड़े में भारत-चीन के सैनिकों के बीच सिक्किम में हुई ताजा झड़प के कुछ खास निहितार्थ हैं जिन्हें समझने, समझाने और उसके मुताबिक ही भावी रणनीति अख्तियार करने की जरूरत है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बढ़ते सियासी कद से चीन-पाकिस्तान के पेट में रह रह करके जो दर्द उठ जाता है, इससे उनको जो दिली परेशानी होती है, उसका बस एक ही उपाय है कि हमलोग सैन्य, कूटनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सियासी मोर्चे पर सतत संचेतनशील रहते हुए अपेक्षित सावधानी बरतें क्योंकि जिस तरह से हमारी विविधता में एकता की परिपाटी को खंडित कर भारत को 3० हिस्सों में बांटने का दिवास्वप्न चीन देखता और पाकिस्तान उसे दिखाता आया है, उसका अब एक ही जवाब है, वह है मुंहतोड़ जवाब। खुद से भी और दुनियादारी के मोर्चे पर भी जैसा कि पीएम मोदी ने कर दिखाया है। 

चीन से जुड़े कड़वे अतीत के मद्देनजर और हाल के दशकों में उसके द्वारा बार बार प्रदर्शित  दांव-प्रतिदांव के नजरिये से भारत उस पर पक्का भरोसा कर ही नहीं सकता है क्योंकि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से चीनी नेतृत्व ने जो छल किया और 1962 के घाव दिए, उसका भरना इतना आसान नहीं है, वो भी तब जबकि वैश्विक दुनियादारी में पाकिस्तान व वहां के आतंकियों की वह खुली हिमायत करता है। यदि भारत अपने कड़वे इतिहास और तल्ख अनुभवों की उपेक्षा करके चीन की सहानुभूति हासिल करने वाला कोई भी पैंतरा बदलता है तो वह भविष्य में उस पर ही भारी पड़ सकता है। इसलिए भारतीय प्रशासन व उसका नेतृत्व हमेशा सतर्क व चौकस रहता है।

सामरिक रूप से नाथूला का अपना महत्व है। इसलिए इस अहम टकराव के तीन प्रमुख कारण गिनाए जा सकते हैं। एक, यह कि यह पूरा इलाका बर्फीला है, जहां गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद ही दोनों देशों की सेनाओं द्वारा इलाके के अपने अपने क्षेत्रों में पेट्रोलिंग की जाती है और इसी क्र म में कभी कभार उनका आमना-सामना भी हो जाता है जिसे प्रोटोकाल के तहत निबटाया जाता है। दो, दोनों देशों के बीच सीमा के निशान तक नहीं हैं, जिससे सैनिक अक्सर आमने सामने आते जाते रहते हैं। तीन, चीनी सेना वहां सडक़ बनाने की कोशिश कर रही है जिसका भारतीय प्रतिरोध स्वाभाविक है। बताया जाता है कि चीन अपनी चुंबी घाटी में सडक़ बना चुका है जिसे अब और विस्तार देना चाहता है। 

ताजा झड़प अचानक नहीं बल्कि चीन की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। वाकई जितने लंबे समय के बाद भारत-चीन के सैनिकों के बीच यह झड़प हुई है, इसके मुख्य कारण गिलगित-बाल्टिस्तान पर भारत की हालिया आक्र ामक नीति और कोरोना के मोर्चे पर चीन का अपने ही घर में बुरी तरह से घिर जाना भी है क्योंकि चीन जब भी घरेलू मोर्चे पर घिरता है तब वह अपने देश में राष्ट्रवाद की भावना पैदा कर अपने नागरिकों का ध्यान मूल मुद्दे से हटाने की अथक कोशिश करता आया है। सीधे शब्दों में कहें तो ऐसी घटनाएं एकाएक नहीं हुई बल्कि चीन ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत तनाव पैदा करने की कोशिश की है ताकि भारतीय नेतृत्व उसके दबाव में रहे और पाक के खिलाफ आक्र ामक रुख से बाज आये।

पूर्वी लद्दाख सेक्टर में भी गत 5-6 मई की रात भारत-चीन सैनिकों में झड़प हुई थी। दोनों तरफ से सैनिक गुत्थमगुत्था हुए थे लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तय प्रोटोकाल के तहत इसे स्थानीय स्तर पर सुलझा लिया गया। दरअसल, भारत चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा है जिसका 22० किलोमीटर हिस्सा सिक्किम में आता है, इसलिए सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के सैनिकों के बीच अस्थाई और छिटपुट झड़पें होती रहती हैं लेकिन इस बार की झड़प काफी अरसे बाद हुई है भले ही दोनों सेनाओं के बीच ऐसी तनातनी में सख्त प्रोटोकाल के तहत मामला सुलझा लिया जाता है। दोनों देशों के लिए खास बात यह है कि तनाव के चरम पर पहुंचने तक दोनों सेनाएं गोली नहीं चलाती। यही वजह है कि भारत चीन सीमा पर दोनों सेनाओं में हाथापाई या पत्थरबाजी जैसी घटना की ही खबर आती है। 

भारतीय सेना की इन बातों में दम है कि सीमाएं स्पष्ट नहीं होने के कारण ऐसी छोटी-मोटी झड़पें होती रहती हैं। इस बार दोनों पक्षों के ज्यादा उग्र हो जाने से सैनिकों को चोट आई हैं। हालांकि, बातचीत के बाद दोनों पक्ष शांत हो गए हैं क्योंकि सेनाएं तय प्रोटोकाल के हिसाब से ऐसे मामले आपसी बातचीत से सुलझा लेती हैं। 

दूसरी ओर, कतिपय रक्षा विशेषज्ञ चीन के इस आक्र ामक व्यवहार को कोविड-19 की वजह से उस पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव से भी जोडक़र देखते हैं जो गलत नहीं है। इन दिनों चीन जिस तरह से अपने पड़ोसियों को धमकाने की कोशिश कर रहा है, उसके पीछे की राज की बात यह है कि ऐसे सभी देश वैश्विक मंच पर उसके खिलाफ जांच करने की  पश्चिमी देशों की मांग का समर्थन न करें। चाहे नेपाल से जुड़े माउंट एवरेस्ट पर नवकब्जा स्थापित करने की चाल हो या फिर जापान नियंत्रित सेनकाकू द्वीप में पिछले कुछ दिनों से चीन के जहाजों द्वारा अतिक्र मण करने की बात, सबके पीछे उकसाने या भयभीत करने की उसकी फितरत शामिल है। 

कहना न होगा कि यह सब कुछ तब हो रहा है जब अप्रैल 2०18 में चीन के वुहान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पहली अनौपचारिक बैठक में दोनों नेताओं ने भरोसा और समझ बढ़ाने की बातचीत को मजबूत करने के उद्देश्य से अपनी अपनी सेनाओं के लिए स्ट्रैटेजिक गाइडेंस जारी करने का फैसला किया था। उसके बाद, पिछले साल भी तमिलनाडु में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई थी। इसलिए भारतीय नेतृत्व को और अधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है। क्योंकि विश्व बिरादरी में मुंह में राम, बगल में छुरी रखने का उस्ताद यदि कोई है तो वह चीन ही है।

आपके लिए यह जानना जरूरी है कि सिक्किम के उत्तरी हिस्से में नाथूला तकरीबन 5259 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक दर्रा है जिस पर चीन बहुत पहले से अपना दावा करता आ रहा है। 1962 के युद्ध के बाद भी उसने कई बार इस क्षेत्र को लेकर दावा किया है। लिहाजा, इस तरह की झड़पें यहां पहले भी हुई हैं और भविष्य में भी संभावित हैं। ऐसा इसलिए कि स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमांकन नहीं होने की वजह से गर्मी के महीनों में अक्सर चीन के सैनिक अतिक्र मण की कोशिश करते हैं जिससे टकराव की स्थिति बन जाती है। फिलहाल दोनों पक्षों में बातचीत के बाद हालात सामान्य हो गए हैं लेकिन ये कब तक ऐसे बने रहेंगे, इस बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना बेहद मुश्किल व जोखिम भरा काम है। इसलिए अपेक्षित सावधानी जरूरी है।

- कमलेश पांडेय