जन और प्रतिनिधि में बढ़ता अंतर

लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम लिंकन ने कहा था 'लोगों की, लोगों द्वारा चुनी व लोगों के लिए सरकार।' भारत ने आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही अपनाया। 50 और 60 के दशकों के बाद भारतीय लोकतंत्र में धीरे-धीरे धन और बाहुबल का प्रयोग बढ़ता गया। वर्तमान में अब चुनाव लडऩा साधारण आदमी की पहुंच से ही बाहर है। अतीत में राजनीति में अधिकतर वो लोग ही आते थे जो जन की सेवा तथा विचारों को प्राथमिकता देते थे। आज सेवा से कहीं अधिक सत्ता प्राप्ति ही लक्ष्य हो गया है। इसलिए चुनाव मैदान में उतरने वाले अधिकतर उम्मीदवार करोड़पति ही होते हैं। राजनीतिक दल भी अब अपने साधारण कार्यकर्ता की बजाए धनाढ्य व्यक्ति को ही प्राथमिकता देते हैं।

मोदी सरकार की दूसरी पारी में जिन लोगों को मंत्रिपरिषद् में जगह मिली है उनमें से 51 मंत्री करोड़पति हैं। नैशनल इलैक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डैमोक्रेटिक रिफाम्र्स द्वारा जारी रिपोर्ट अनुसार मोदी मंत्रिमंडल में सबसे अमीर मंत्री शिरोमणि अकाली दल बादल की हरसिमरत कौर बादल हैं। जिनकी 217 करोड़ रुपये सम्पत्ति है। हरसिमरत के बाद महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद पीयूष गोयल की संपत्ति 95 करोड़ रुपये है। गुरुग्राम से निर्वाचित राव इंद्रजीत सिंह तीसरे सबसे धनी मंत्री हैं और उन्होंने अपनी संपत्ति 42 करोड़ रुपये घोषित की है। चौथे नंबर पर भाजपा अध्यक्ष और गांधीनगर से सांसद अमित शाह हैं, जिनकी संपत्ति 40 करोड़ रुपये है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सूची में 46वें नंबर पर हैं, जिनके पास 2 करोड़ रुपये की संपत्ति है। करीब 10 मंत्रियों के पास मोदी से कम संपत्ति है। इनमें बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल, मध्य प्रदेश के मोरनिया से सांसद नरेंद्र सिंह तोमर शामिल हैं, जिन्होंने करीब दो करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की है। मुजफ्फरनगर से सांसद संजीव कुमार बालियान, अरुणाचल पश्चिम से सांसद किरण रिजिजू और उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से सांसद साध्वी निरंजन ज्योति ने अपनी संपत्ति करीब 1 करोड़ रुपये घोषित की है। जो मंत्री करोड़पति नहीं हैं, उनमें बंगाल की रायगंज से सांसद देबाश्री चौधरी (61 लाख), असम के डिब्रूगढ़ से सांसद रामेश्वर तेली (43 लाख), केरल से सांसद वी. मुरलीधरण (27 लाख), राजस्थान के बाड़मेर से सांसद कैलाश चौधरी (24 लाख) और ओडिशा के बालासोर से सांसद प्रताप चंद्र सारंगी (13 लाख रुपये) शामिल हैं।

सांसदों और मतदाता में आर्थिक अंतर बढ़ता जाता है। एक सांसद की औसत संपत्ति एक औसत करदाता की सालाना आय की तुलना में 345.8 गुना अधिक है। इसका मतलब है कि एक औसत करदाता को लोकसभा के सांसद की औसत संपत्ति के बराबर कमाने में 345.8 साल लगेंगे। यह औसत पहले से मामूली बढ़ा है। 2014 में सांसद की औसत सम्पत्ति औसत करदाता से 299.8 गुना अधिक थी। पहले के वर्षों के आय कर के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह आंकड़ा आय कर आकड़ों के आधार पर सकल कुल आय पर आधारित है। सकल कुल आय में वेतन, कारोबारी आय और किराये से होने वाली आय भी शामिल है। अभी वित्त वर्ष 2017 के आंकड़े ही उपलब्ध हैं। सांसदों की संपत्ति के आंकड़े हाल में हुए चुनावों में उनके द्वारा दिए गए हलफनामे पर आधारित हैं। गैर सरकारी संगठनों नैशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स की रिपोर्ट में ये आकंड़े दिए गए हैं। 2014 से 2019 के बीच सांसदों की औसत संपत्ति 7.3 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़ी है। करदाताओं की सकल कुल आय वित्त वर्ष 2014 से वित्त वर्ष 2017 के दौरान 7.2 फीसदी की दर से बढ़ी। इस दौरान उनकी औसत सकल कुल आय 4.9 लाख रुपए से बढ़कर 6 लाख रुपए पहुंची। दूसरी ओर सांसदों की संपत्ति 2014 में औसतन 14.7 करोड़ रुपए थी जो 2019 में बढ़कर 20.9 करोड़ रुपए पहुंच गई। सांसदों की संपत्ति बढऩे की रफ्तार करदाताओं के औसत वेतन से ज्यादा तेजी से बढ़ी। औसत वेतन आय वित्त वर्ष 2014 में 5.7 लाख रुपए थी हो वित्त वर्ष 2017 में 5.9 फीसदी बढ़कर 6.8 लाख रुपए हो गई। इस दौरान औसत कारोबार आय 8 फीसदी बढ़कर 4 लाख रुपए पहुंच गई। वित्त वर्ष 2014 में यह 3.2 लाख रुपए थी। 17वीं लोकसभा में 225 सांसद दोबारा चुनकर आए हैं। दोबारा चुनकर आए सांसदों के आंकड़ों पर नजर डालें तो उनकी संपत्ति बढऩे की रफ्तार करदाताओं से कम रही है। उनकी संपत्ति सालाना 5.1 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी। इससे साफ है कि नए चुनकर आए सांसदों की संपत्ति अधिक है जिसके कारण सांसदों की औसत संपत्ति का आकार बढ़ा है। गैर सरकारी संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक हाल में चुनावों में उन सांसदों की संख्या बढ़ी है जिनकी संपत्ति एक करोड़ रुपए से अधिक है। 2009 में यह 58 फीसदी थी जो 2014 में बढ़कर 82 फीसदी हो गई। 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 88 फीसदी हो गया। संभव है कि 2017 के कर आंकड़े 2019 में बदल गए होंगे लेकिन करदाता आमतौर पर औसत भारतीयों से ज्यादा अमीर होते हैं। सरकार ने जनवरी में एक बयान में कहा कि 2018-19 के दौरान प्रति व्यक्ति औसत आय 1,25,397 रुपए रहने का अनुमान है। शोध में यह बात सामने आई है कि सार्वजनिक मुद्दों पर अमीर लोगों का रुख बहुसंख्यक लोगों से अलग रहता है और सरकार का हिस्सा न होते हुए भी वे नीतियों पर अनुचित असर डालते हैं। 

सांसदों और मतदाता के बीच आर्थिक स्तर पर बढ़ता अंतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। सरकार और समाज दोनों को जन और जन प्रतिनिधि के बीच आर्थिक अंतर को और बढऩे से रोकने के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। धनाढ्य वर्ग अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हावी हो गया तो जन साधारण एक मोहरा बनकर ही रह जाएगा और यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आत्मघाती ही साबित होगी।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।