Wednesday, September 26, 2018 06:07 PM

इमरान का पाकिस्तान 

राष्ट्रपति जनरल जिया और केयरटेकर प्रधानमंत्री मूईन कुरैसी दोनों ने इमरान खान को अतीत में अपने अपने मंत्रिमंडल में लेने के लिए सम्पर्क किया था, लेकिन इमरान खान ने दोनों को इंकार कर दिया। पाकिस्तान बनने के मात्र 5 वर्ष बाद पैदा हुआ इमरान खान इसी सप्ताह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की पूरी संभावना है इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ को पिछले दिनों पाकिस्तान की संसद के चुनाव में 116 सीट मिली थी। नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग को 64 और भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को 43 सीटें मिली थी। अन्य राजनीतिक दलों में अधिकतर इमरान खान को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं। नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग और भुट्टो की पार्टी द्वारा इमरान खान के विरूद्ध हाथ मिलाने के कारण इमरान की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं। पाकिस्तान की राजनीति में झिझकते हुए 90 के दशक में कदम रखने वाले इमरान खान आज पाकिस्तान की राजनीति का केन्द्रबिन्दु बन गए हैं।

पाकिस्तान की राजनीति में आये इमरान खान ने अपनी पुस्तक 'मैं और मेरा पाकिस्तान' इस तरह लिखा है 'पाकिस्तान से बाहर मुझे 21 साल के क्रिकेट कॅरियर के लिये जाना जाता है लेकिन अपने देश में मेरी एक राजनैतिक दल के नेता के रूप में पहचान है। एक ऐसे देश का नेता जिसके राजनेताओं ने उसके विकास की अपार क्षमता को अवरुद्ध कर दिया और उसे बर्बादी के जबरदस्त चक्र में फंसा दिया। एक ऐसे देश का नेता जो अपने पिछले साठ सालों की राजनैतिक विरासत से आजाद होने की कोशिश में जी जान से जुटा है।
 
आजादी से लेकर आज तक पाकिस्तान पर या तो मुशर्रफ जैसे सैनिक तानाशाहो΄ ने शासन किया है या मुल्क को अपनी घरेलू जायदाद समझने वाले भुट्टो और शरी$फ जैसे लोगों ने। इन लोगों ने देश के संस्थापकों के आदर्शों को एकदम दरकिनार कर दिया है। पाकिस्तान को एक इस्लामी कल्याणकारी- राज्य बनाने की कल्पना की गई थी लेकिन अब यहां की राजनीति लूटमार का केन्द्र बनकर रह गई है, चुनौती देने वाले हर व्यक्ति को- जिनमें मुझ जैसे विख्यात अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी शामिल हैं- जब चाहें गिरफ़्तार कर हिंसा से डराया- धमकाया जाता है।

इस्लाम के सामाजिक एकतापरक सिद्धांतों के स्थापित होने पर भी देश आज टुकड़ों मे΄ बंटा हुआ है। उत्तर- पूर्व में फैला कश्मीर का इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित है। उत्तर- पश्चिम के प्रदेश खै़बर पख़्तूनख्वा और 'फाटा' (फेडरल शासन के अंतर्गत शासित जनजातियां) सेना और आतंकवादियों की लड़ाई के मैदान हैं। पश्चिम में ईरान है। अ$फगानिस्तान की सीमाओं से लगा बलोचिस्तान एक अत्यंत विशाल परन्तु ऊसर और कम आबादी वाला ऐसा प्रदेश है जो पाकिस्तान से अलग होने की कोशिश में लगा है। दक्षिण में अरब सागर से लगते सिंध प्रदेश की राजधानी कराची, स्थानीय निवासियों और भारत से आए मुसलमानों (जिन्हें मुहाजिर कहा जाता है) तथा पख्तून व अन्य जातियों के लोगों के बीच हो रहे जबरदस्त संघर्ष को झेल रहा है। उत्तर में पंजाब है जिसकी आबादी देश की कुल आबादी के आधे से ज्य़ादा है। पंजाब देश की राजनीति और समृद्धि पर हावी है और इस कारण बाकी सूबों को पंजाब से शिकायतें है जो मेरी नजर में उचित हैं।

मेरा मानना है कि हमारे देश की समस्याएं 1947 में देश निर्माण के एकदम बाद जिन्ना साहब के स्वर्गवास के साथ ही शुरू हो गईं। मुहम्मद अली जिन्ना के अनुसार हमारा देश धर्मतन्त्र न होकर लोकतन्त्र था। हम मुस्लिम संसार में एक उदाहरण बनकर चमकना चाहते थे। यह हमारे सपने थे। का$फी समय बाद हमें यह समझ आया कि इतिहास के बोझ से मुक्त होकर भी इस नये देश में सपनों को पूरा देखना कठिन है। समय बीतने के साथ हम अपने इन आदर्शों से दूर ही होते गये।

1980 और 1990 के वर्षों में हमारा देश निरंतर पतन की ओर जा रहा था। सरकार जो भी रही --तानाशाही या लोकतान्त्रिक-- देश के हालात बिगड़ते ही गये। खुशी देने वाले समाचार केवल खेल के मैदान से ही मिलते थे। क्रिकेट, हॉकी और फुटबॉल में हमें अन्तर्राष्ट्रीय कामयाबी मिल रही थी। इस अच्छे प्रदर्शन से देश के गिरते आत्म-सम्मान को बचाने में मेरा भी योगदान था। ... कहावत है कि काले बादलों से आने वाले तूफान का पूर्वानुमान हो जाता है। बेनजीर के सत्ता में आने से पहले ही देश को एक चेतावनी मिल गई। उन्होंने सबसे बड़ा विश्वासघात अपने पिता द्वारा स्थापित पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ किया, पार्टी के मूल उद्देश्यों में से, 'न्यायपूर्ण समानतापरक समाज' निर्मित करने के वायदे को उसके विधान से हटा दिया। उन्होंने एक और घिनौना काम किया-- समर्थन जुटाने के लिये पाकिस्तान संसद सदस्यों को मुंह मांगा पैसा देकर खरीदना शुरू कर दिया। एक तरफ बेनजीर सांसदों की बोली लगाती और दूसरी तरफ पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवाज शरीफ बोली लगाते। दोनों ने लोकतन्त्र को एक धन्धा बना दिया। नवाज शरीफ ने तो विधायकों को खरीदकर उन्हें चंगा मंगा नामक एक गांव में बंद कर दिया ताकि भुट्टो की पार्टी ज्यादा पैसे देकर उन्हें खरीद न सके। तब से ही 'चंगा मंगा राजनीति' का फिकरा पाकिस्तानी राजनीति की एक कहावत बन चुका है। बहुत जल्दी ही लोग बेनजीर से निराश होने लगे। एक लोकतान्त्रिक प्रधानमंत्री के स्थान पर उन्होंने शाही मलिका की तरह व्यवहार करना आरम्भ कर दिया। भुट्टो की हत्या के बाद विलियम डेलरिम्पल ने उनके बारे में लिखा, 'वह सोच समझकर और जानबूझकर शाही अंदाज में चलती और बोलतीं थी और 'मैं' की जगह अकसर 'हम' शब्द का प्रयोग करतीं थी।' उनके अनुसार बेनजीर का मिजाज राजसी था।

नवाज शरीफ बारे इमरान खान लिखते है कि पिता का व्यापार चलाने की खातिर नवाज शरीफ न चाहते हुए भी राजनीति में आये थे और बेनजीर की तरह उन्हें भी राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। जिया की पूरी वफादारी और चमचागिरी से वह 1985 में पंजाब के मुख्यमंत्री बन गए। शरीफ की नगर में राजनीति केवल धन जमा करने का एक जरिया था जिसके साथ जनता के प्रति कोई कर्तव्य नहीं जुड़ा था। 1990 में जब वह प्रधानमंत्री बने तब उनके परिवार वाले राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण ले- लेकर अपना घर भरने लगे--बैंकों को पैसा कभी वापिस नहीं मिला। अखबारों ने खबरें छापनी शुरू कीं कि राजनेता बैंकों पर दबाव डालकर करोड़ों डॉलर कर्जा लेते हैं और वह पैसा हमेशा के लिये उन्हीं का हो जाता है। शरीफ के ही समय लिफाफा पत्रकारिता की प्रथा विकसित हुई: लिफाफों में पैसे रखकर पत्रकारों को घूस दी जाती और झूठी खबरें छपवाईं जातीं।

पत्रकार लिफाफों से खरीदे जाते थे और राजनीतिज्ञ सरकारी जमीने देकर। नवाज शरीफ भी आज जरदारी की तरह देश के सबसे धनी लोगों में गिने जाते हैं। तीन साल बाद उन्हें भी भ्रष्टाचार के आरोपों में हटाया गया और बेनजीर फिर प्रधानमंत्री बन बैठी। 1997 में भट्टो को हटाया गया और शरीफ फिर सत्ता में आ गये। एक चक्करदार झूले की तरह भ्रष्टाचार का यह तमाशा सबके लिये चौंकाने वाला था। जब 1990 में बेनजीर की सरकार बर्खास्त की गई थी तब जरदारी को प्रधानमंत्री निवास से सीधे जेल जाना पड़ा था। इसके बाद जब 1993 में फिर बेनजीर की सरकार बनी तब जरदारी जेल से सीधे प्रधानमंत्री निवास में आये और 1996 में फिर वहां से जेल ही गये। उनके सत्ता में आते ही सारे आरोप ही कार्यवाही करती है। जो सत्ता में होता है न्यायपालिका उसी का साथ देती है। 

1990 के दशक में लोगों ने देश के अच्छे भविष्य की आशा करना ही छोड़ दिया। देश की हर संस्था नष्ट कर दी गई थी। प्रधानमंत्री से लेकर निचले स्तर के कर्मचारी तक सब भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे। 1990 के वर्षों में जब पंजाब हाईकोर्ट ने वहां के इन्सपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस अब्बास खां से पूछा कि शहर की पुलिस इतनी भ्रष्ट क्यों है तो उन्होंने बताया कि 25 हजार सिपाही योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि सिफारिश के आधार पर भर्ती किये गये हैं और उनमें से कुछ- एक मशहूर अपराधी भी हैं। इस घपले का दोष उन्होंने नवाज शरीफ की पंजाब सरकार पर डाला। सिंध में भी पी.पी.पी. और मुत्तहिदा कौमी मूवमेन्ट की संयुक्त सरकार ने यही किया, अपनी पार्टी के लोग ही पुलिस में भर्ती करवा दिये जिनमें बहुत से नामी गुंडे भी थे। पुलिस ही कानून का पालन करवाती है लेकिन हमारी पुलिस को बड़ी सूझ- बूझ से और जान बूझकर भ्रष्ट किया गया ताकि चुनाव में पुलिस से गड़़बडिय़ां करवायी जा सकें। 1996 में ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल ने अठावन देशों में पाकिस्तान को दुनिया का दूसरा सबसे भ्रष्ट देश घोषित किया। अर्थतन्त्र का बुरा हाल था। बेकारी के कारण लोग अपराधी बनने लगे थे। गरीबी का स्तर  बढ़ता जा रहा था। 1998 में परमाणु विस्फोट करने के कारण पाकिस्तान पर जो आर्थिक प्रतिबंध लगाये गए उनसे स्थिति और ज्यादा खराब हो गई।'
 
पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तान में लोकतंत्र की असफलता का जो मूल्याकंन किया है वह काफी हद तक ठीक ही है। लेकिन पाकिस्तान को पतन की राह से लोकतांत्रिक राह पर सफलता दिखाने का सपना ले रहे इमरान खान पर ही यह आरोप लग रहा है कि उनकी तथा पार्टी की सफलता का राज पाकिस्तान फौज का समर्थन है तो ऐसे हालात में पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था के सफल होने की संभावना तो कम है लेकिन हमारी शुभकामनाएं तो यही है कि इमरान के नेतृत्व में पड़ोसी पाकिस्तान में लोकतंत्र फले व फूले और वहां के नागरिक आजादी का लाभ उठा सकें।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।  

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