भारत की छवि

2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को सम्मुख रख भारत के सभी राजनीतिक दल सक्रिय हो चुके हैं। सत्ता सुख पाने का लक्ष्य लिए राजनीतिज्ञ आये दिन ऐसे ब्यान दे रहे हैं जिससे एक तरफ लोगों में भ्रम और भ्रांतियां पैदा हो रही हैं, वहीं देश की छवि भी प्रभावित हो रही है। विश्व में भारत की जो एक लोकतांत्रिक व विकाशशील देश की छवि है वह राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई नकारात्मक नीति के कारण प्रभावित हो रही है।


भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने गत दिनों भारत की बिगड़ती छवि को लेकर एक लेख लिखा था उसमें वह लिखते हैं हम गर्व से कहते हैं कि हम सबसे अधिक सहिष्णु लोग हैं। हमारे यहां विविध आस्थाओं, संस्कृतियों, परंपराओं के लोग, विभिन्न जीवनशैलियों और भाषाओं को बोलने वाले लोग एक साथ रहते हैं। विविधता तो साझेदारी से फलती-फूलती है। परंतु अगर इसे लोगों को एक दूसरे से अलग करने का जरिया बना लिया जाए तो इसे जहर बनने में वक्त नहीं लगता। कोई भी व्यक्ति हिंदू-मुस्लिम विभाजन को आधार बनाकर अपनी सशक्त हिंदू पहचान स्थापित करने की कोशिश नहीं कर सकता। अगर एक बार किसी मामले में विभाजन की इस प्रक्रिया को वैधता प्रदान कर दी गई तो इसके बाद इसका सिलसिला शुरू हो जाएगा। आस्था के आधार पर, विभिन्न समुदायों के इतिहास के आधार पर और आहत पहचानों में अभिव्यक्त सामाजिक और आर्थिक समस्याओं में इसका प्रकटीकरण होने लगेगा। लोकतंत्र में हमेशा भिन्नता के लिए जगह होती है, यह लेन-देन की संस्कृति में पनपता है। यह केवल तभी संभव है  जब चीजों को काले-सफेद के रूप में देखने के बजाय समझौतों और समन्वय की गुंजाइश हो। ध्रुवीकरण लोकतंत्र को कमजोर करता है। जबकि सांप्रदायिकता तो लोकतंत्र को ही असंभव बना देती है।.... हर देश को अपनी ऐतिहासिक और वर्तमान उपलब्धियों पर गर्व होता है। ये बताती हैं कि हम कौन हैं और भारतीय होने का क्या अर्थ है। हमारे इतिहास में भी हिंसात्मक झड़पों की कमी नहीं है लेकिन उनको बार-बार दोहराने से एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकता। जोखिम यह है कि हम अपने इतिहास को सांप्रदायिक बना सकते हैं, एक समुदाय दूसरे समुदाय के खिलाफ हो सकता है और सबके पास अपना इतिहास और अपने नायक होंगे। भारत की उपलब्धियों में गर्व करने लायक काफी कुछ है लेकिन हर बात को उचित ऐतिहासिक संदर्भ में पेश करना होगा। उन्होंने यकीनन मानव ज्ञान को समृद्ध करने में भूमिका निभाई है लेकिन उससे श्रेष्ठता का दावा तो सही साबित नहीं होता। दुख की बात है कि प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों में यह साफ नजर आ रहा है और यह देश की विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की शीर्ष भूमिका को धक्का पहुंचा रहा है। देश के आधुनिक और डिजिटल भविष्य का निर्माण इस आधार पर नहीं किया जा सकता।

इसी तरह राजनीतिक विश्लेषक डा.एके वर्मा लिखते हैं, हमारे नेता अब आए दिन सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को शर्मसार करते रहते हैं। लगता है कि राजनीतिक स्पर्धा में वे यह भूल ही जाते हैं कि विचार, भाषा और अभिव्यक्ति की लक्ष्मणरेखा क्या हो? ग्रामीण-शहरी, गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित, स्त्री-पुरुष इन सभी की राजनीति में गहरी आस्था है, इसलिए राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों के अवांछीय कार्य, कथन और चिंतन लोगों की आस्था को चोट पहुंचाते हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर का हालिया आरोप कि 2019 में भाजपा के दोबारा सत्ता में आने पर लोकतांत्रिक संविधान नहीं बचेगा, मुसलमानों के लिए समानता खत्म हो जाएगी। संविधान हिन्दू राष्ट्र का सिद्धांत अपना लेगा और भारत एक हिन्दू पाकिस्तान बन जाएगा, इसकी एक ताजा बानगी है। ऐसे मिथ्या, भ्रामक और भयादोहन करने वाले आरोप हमारे लोकतंत्र को किधर ले जाएंगे? ऐसा बयान कांग्रेस पार्टी से आया जिस पार्टी ने लंबे समय तक शासन किया और अब भाजपा के शासन करने पर उसे विस्थापित करने को छटपटा रही है। यह भारतीय लोकतांत्रिक-संस्कृति में गंभीर गिरावट का संकेत हैं, लेकिन प्रश्न केवल आज का नहीं, भविष्य का है। यदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो अगले 50 वर्षों में भारतीय लोकतंत्र और राजनीति का क्या स्वरूप होगा? आने वाली पीढ़ी को हम कैसा समाज और संस्कार दे कर जाएंगे? लोकतांत्रिक-राजनीति सामाजिक व्यवस्था के संचालन की पद्धति है। यदि उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आए तो लोगों को किसी बेहतर विकल्प पर विचार करने को मजबूर होना पड़ेगा। आज के राजनीतिक व्यवहार पर एक प्रश्नचिन्ह लगा है। उसमें परिवर्तन जरूरी है, लेकिन वह परिवर्तन क्या हो और कैसे आए? किसी समाज का राजनीतिक व्यवहार उसके राजनीतिक ज्ञान पर निर्भर होता है और वह ज्ञान उस समाज की राजनीतिक शिक्षा पर। आज देश में जो राजनीतिक शिक्षा और ज्ञान विभिन्न विचारधाराओं जैसे उदारवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ के रूप में उपलब्ध है वह यूरोप से आयातित है, लेकिन जैसा कि ब्रिटिश विद्वान ईएच कार ने लिखा है, कोई भी देश इससे असहमत नहीं कि प्रत्येक बच्चे को अपने देश की राष्ट्रीय विचारधारा में शिक्षित होना चाहिए। आखिर वह क्या है जिसे हम भारत में ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के रूप में जानते हैं? क्या अनेकता में एकता की अवधारणा उसे व्यक्त करती है? या फिर कोई और गंभीर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अवधारणा उसे परिभाषित करती है। वास्तव में भारत के विचार को यानी ‘आइडिया-ऑफ-इंडिया’ को समझने के लिए जो प्रारंभिक बिन्दु है वहां तक हम जाना नहीं चाहते। वह बिन्दु ‘वसुधैव-कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का भारतीय दर्शन है। 

उपरोक्त दोनों विद्वानों का इशारा देश में बढ़ती नकारात्मक सोच के कारण होने वाली हानि की तरफ है। देश की आजादी के बाद शायद पहली बार देश की पहचान को, उसके दर्शन को लेकर चर्चा हो रही है। देश में राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक स्तर पर भी परिवर्तन आ रहा है। इसका आम आदमी की सोच के साथ उसके रहन-सहन पर भी पड़ा है। परिवर्तन के इस दौर में अगर नकारात्मक सोच हावी हो गई तो इसका कुप्रभाव सबसे अधिक भावी पीढिय़ों पर ही पड़ेगा। आजादी के तत्काल बाद अगर देश के दर्शन व विचारों पर तवज्जों दी जाती तो शायद आजादी के सात दशक बाद जिन समस्याओं का हम सामना कर रहे हैं उनमें से आधी तो आज होती ही नहीं।

समय की मांग है कि राजनीतिज्ञ ही नहीं बल्कि प्रत्येक भारतवासी भारत हित को प्राथमिकता देते हुए कर्म करे। मात्र दिखावे से या दोहरे मापदंडों से तो भारत की छवि खराब ही होगी और उसका खामियाजा किसी ओर को नहीं बल्कि हम भारतवासियों को ही भुगतना पड़ेगा।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।