Thursday, September 20, 2018 07:07 AM

अवैध प्रवासी

असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) के मसौदे को लेकर देश में एक राजनीतिक जंग शुरू हो गई है। एनआरसी की अंतिम सूची में 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं है। इसका अर्थ हुआ है कि यह असम में अवैध रूप से रह रहे हैं। अवैध प्रवासियों के मुद्दे को लेकर जनसाधारण अपने जन प्रतिनिधियों से यही आशा रखता है कि देश हित को प्राथमिकता देते हुए सभी एक आवाज में अवैध प्रवासियों को देश से बाहर करने की बात करेंगे। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के परिणामस्वरूप देश की सुरक्षा के मुद्दे को लेकर भी राजनीतिक दल अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। अतीत के गुलामी के दौर के कारणों पर जाते हैं तो उसमें एक प्रमुख कारण आपसी एकता का न होना था। विदेशी हमलावर कभी भी भारत पर विजय नहीं प्राप्त कर सकते थे, अगर उन्हें भारतीय राजाओं का साथ न मिला होता।
सदियों की गुलामी के बाद मिली आजादी के प्रति भी हमारे जन प्रतिनिधि चिंतित दिखाई नहीं दे रहे। मात्र अपनी राजनीति स्वार्थसिद्धि के लिए अवैध प्रवासियों के मुद्दे को लेकर भी राजनीतिक दल खेल खेलते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में बोलते हुए कहा कि किसी के पास घुसपैठियों की पहचान करने की हिम्मत नहीं थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौते पर दस्तख्त किए थे। इसकी आत्मा में एनआरसी था। समझौते में कहा गया था कि अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें हमारे सिटीजन रजिस्टर से अलग करना चाहिए, लेकिन वे अमल करने की हिम्मत नहीं दिखा पाए। इस पर अमल करने की हिम्मत हममें हैं, इसलिए हम यह कर रहे हैं। एनआरसी का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जो कहा वह सत्य है। दरअसल, आजादी के बाद एनआरसी में पहला रजिस्ट्रेशन असम में 1951 में किया गया था। तब पूर्वी पाकिस्तान बनने से उपजी स्थितियों से निपटने की कोशिश हुई थी। दरअसल, 1979 से 1985 के बीच अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर असम में एक बड़ा आंदोलन चला। फिर 15 अगस्त, 1985 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन आदि के साथ केंद्र ने समझौता किया। इसमें 25 मार्च, 1971 के बाद आये लोगों की पहचान करना मुख्य मुद्दा था, जिसके बाद असमगण परिषद का उदय हुआ और उसने सरकार बनाई। वर्ष 2005 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन को अपडेट करने का फैसला हुआ। नागरिकों के सत्यापन का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में 2015 में शुरू हुआ, जिसमें बारह तरह के सर्टिफिकेटों व कागजात को नागरिकता का प्रमाण माना गया। ऐसे में जब चालीस लाख लोगों की नागरिकता संदिग्ध हो गई है तो सवाल है कि उनका भविष्य क्या होगा? 
विपक्षी नेता गुलाम नबी आजाद ने सरकार को उपरोक्त मुद्दे को लेकर चार सुझाव दिए हैं। • एनआरसी ड्राफ्ट में जिनके नाम नहीं हैं, सिर्फ उन्हें ही नागरिकता साबित नहीं करना चाहिए, बल्कि सरकार को यह बताना चाहिए कि वे कैसे भारतीय नागरिक नहीं है? • इस ड्राफ्ट से बाहर हुए असम के प्रत्येक व्यक्ति को सरकार कानूनी मदद दे। इसे मानवाधिकार का विषय मानें। • इस दौरान ड्राफ्ट से बाहर हुए व्यक्ति को परेशान या प्रताडि़त न किया जाए। सरकार सुरक्षा सुनिश्चित करे। • नागरिकता साबित करने के लिए एनआरसी ने 16 बिंदु तय किए हैं। अगर कोई एक भी बिन्दु को पूरा करता है, तो उसे एनआरसी की लिस्ट में शामिल करना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह रही हैं कि अगर अवैध प्रवासियों के मामले में सरकार का रुख सख्त रहा तो देश में गृह युद्ध हो जाएगा। कांग्रेस व अन्य दलों का मानना है कि यह मुद्दा 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को सम्मुख रख उठाया गया है।
सरकार ने अवैध प्रवासियों के प्रति जो कठोर कदम उठाने की नियत व नीति बनाने की हिम्मत रखती है उसको कटघरे में खड़ा करने का विपक्षी दलों का प्रयास एक गलत कदम ही कहा जाएगा। विश्व में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां अवैध प्रवासियों को राजनीतिक हित साधने के लिए समर्थन दिया जा रहा हो। कटु सत्य तो यह है कि आजादी के बाद से ही अवैध घुसपैठियों का मुद्दा एक समस्या बनकर सामने आ गया था। मात्र राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण ही पिछली सरकार उपरोक्त मुद्दे पर कोई कदम नहीं उठा सकी। मोदी सरकार तो वो राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाते हुए ही अवैध प्रवासियों के मुद्दे को जन साधारण के सामने रखा है और दृढ़तापूर्वक कह रही है कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजा जाएगा। बांग्लादेश सरकार ने अवैध प्रवासियों को अपना नागरिक न कहते हुए वापस लेने को मना कर दिया है। विपक्षी दल अवैध प्रवासियों के भविष्य को लेकर एक नहीं कई प्रश्न उठा रहे हैं। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साफ किया है कि घुसपैठियों को वापिस जाना ही होगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि वर्तमान रिपोर्ट पर अभी किसी के विरुद्ध सरकार कदम न उठाए। सरकार ने भी रजिस्टर में जिन के नाम रह गये हैं उनको अपनी बात कहने के लिए स्थानीय केंद्रों पर जाने को कहा है। 7 अगस्त तक सभी अपने आवेदन व आपित्त दर्ज करा सकते हैं। इनके आने के बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा। एक लोकतांत्रिक देश में जिस तरीके से कार्य होना चाहिए उस तरह ही सरकार कर रही है। मात्र राजनीतिक लाभ हेतु कई राजनीतिक दल और उनके नेता देश में भय और भ्रम का माहौल बना रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ठीक कहा है कि मुद्दा तो पुराना है लेकिन कांग्रेस में हिम्मत नहीं थी हमने हिम्मत दिखा इसे कर दिया है।
कुल मिलाकर यह ही कहा जा सकता है कि अवैध प्रवासियों के मुद्दे का राजनीतिककरण नहीं होना चाहिए, बल्कि राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हुए इसे राजनीति से ऊपर उठकर हल किया जाना चाहिए।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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