कोरोना काल में पर्व-त्योहार और चुनाव कैसे हों

कोविड काल में त्योहारी और चुनावी मौसम का भी श्रीगणेश होने जा रहा है। नवरात्रि, रामलीला, दुर्गापूजा, दशहरा, दिवाली और फिर छठ। इसके बीच में ही विधानसभा के चुनाव और उप चुनाव भी। यानी एक के बाद धार्मिक और लोकतंत्र के पर्व । यह सब तब हो रहा है जब आशंका जताई जा रही है कि जाड़े के दौरान कोरोना का असर बहुत बढऩे वाला है। माना जा रहा है कि जैसे -जैसे जाड़ा बढ़ेगा वैसे-वैसे कोरोना ज्यादा तेजी से फैलेगा। यह अधिक से अधिक लोगों को अपनी चपेट में लेगा। इसलिए दुनियाभर के कई वैज्ञानिक चिंतित हैं। उन्होंने यह देखा है कि अमेरिका, इटली, इंग्लैंड जैसे ठंडे देशों में कोरोना ज्यादा घातक रहा है। भय इसलिए है क्योंकि माना जा रहा है कि ठंड के साथ बदलते मौसम के कारण कोरोना वायरस अधिक ताक़त के साथ फैलेगा। तब दुनिया को कोरोना वायरस की 'सेंकेंड वेव से भी दो-दो हाँथ करना पड़ेगा।
भारत के लिए यह अनुमान सच में भयावह है क्योंकि यहां पर सड़कों पर लापरवाह लोग, दुकानों के आगे भीड़, गली मोहल्लों में खेलते, लड़ते, झगड़ते बच्चे और महिलाओं की बिंदास चटपटी -चर्चाएं जारी हैं। बिल्कुल पहले जैसा ही मंजर देखा जा सकता है। न मास्क, न डिस्टेंसिंग, न सावधानी, न सतर्कता और न ही किसी तरह की परवाह। कभी-कभी तो लगता है कि जैसे हर कोई निर्देशों की खिल्ली उड़ाते हुए कोरोना से लडऩे का  मन बना चुका है। अब कोई सिर पर कफन ही बांधकर घूमता फिरे तो कोई क्या कर लेगा उसका? वह तो सीधे अपने भगवान से संपर्क स्थापित कर चुका है। भगवान उसे धरती पर रखे या अपने पास बुला लें।
दरअसल अब बिहार में विधानसभा चुनाव भी होने जा रहे हैं। मध्य प्रदेश और झारखण्ड आदि कुछ अन्य राज्यों में भी विधानसभा के उप चुनाव भी होने जा रहे हैं। इन चुनावों की कैंपेन चालू हो गई है। पर मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि जनता या राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकत्र्ता मास्क पहनने या सोशल डिस्टेनसिंग को लेकर कतई गंभीर नहीं है। इस आत्मघाती दुस्साहस पर गुस्सा भी आता है और अफसोस भी होता है। सरकार के स्तर पर बार-बार जनता को आगाह करने के बावजूद शहरी,  ग्रामीण, शिक्षित, अशिक्षित सभी मौज में हैं। इन्हें कोरोना वायरस से कोई भय ही नहीं है। अगर इस तरह की लापरवाही बनी रही तो पता नहीं क्या करेगा कोरोना।
अगर आगे भी त्यौहारों का आनंद लेना है तो कायदे से मास्क लगाओ, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करो, साबुन से हाथ धोओ। कुछ समय के संकट के बाद यह  कष्टकारी कोरोना काल तो समाप्त हो ही जाएगा। आखिर दुनियाभर में कोरोना का मुकाबला करने के लिए वैक्सीन तो बन रही है। दुनियाभर के वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं। अनुमान है कि अगले पांच- छह महीने तक वैक्सीन दुनिया के पास होगी।
 अभी साफ -साफ नहीं कहा जा सकता है कि इस बार रामलीला या दुर्गापूजा के आयोजन किस तरह से होंगे। जो भी होंगे वे विगत वर्षों की तुलना में बहुत छोटे स्तर पर होंगे। यही होना भी चाहिए।  देखिए, इस मौके पर थोड़ी ही लापरवाही बहुत भारी पड़ सकती है। जो गैर-जिम्मेदार लोग अब भी बाज नहीं आ रहे हैं क्या इन्हें पता नहीं है कि अस्पतालों में एडमिशन के लिए रोगियों की भीड़ इलाज के लिए भटक रही है। वहां इस कतार में उल्टी करते, खांसते, कांपते और सांस लेने को तरसते बूढ़े, बच्चे, जवान, महिलाएं और पुरुष सब हैं।
अगर बात त्यौहारी मौसम से हटकर चुनाव की करें तो चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ राजनीतिक दलों को भी बहुत समझदारी से चुनावी रैलियां और छोटी सभाएं आयोजित करनी होंगी। सभी दलों और नेताओं को जनता के पास वचुर्अल रैली के माध्यम से पहुंचना चाहिए। आखिऱ इन्हें अपनी बात ही तो जनता तक पहुंचानी है। उसे वचुर्अल रैली  के माध्यम से भी पहुंचाया ही जा सकता है। भारतीय जनता पार्टी के वरि़ष्ठ नेता और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले जून में वर्चुअल रैली के जरिए बिहार चुनाव का शंखनाद कर दिया था।  अमित शाह ने देश की पहली वर्चुअल रैली 'बिहार जनसंवाद को संबोधित किया था। इस दौरान शाह ने मोदी सरकार 2.0 के एक साल की उपलब्धियां का जिक्र करते हुए दावा किया कि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में दो-तिहाई बहुमत से सरकार बनेगी। कोरोना काल में उस रैली के अनुसरण करते हुए अन्य दलों को भी वर्चुअल रैली करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए था। पर  हमारे यहां लगता है कि अब सकारात्मक विमर्श का दौर जा चुका है। वर्चुअल रैली पर तंज कसते हुए आरजेडी के राष्ट्रीय महासचिव और विधान परिषद सदस्य कमर आलम ने कहा था कि अमित शाह की बिहार जनसंवाद वर्चुअल रैली हवा हवाई रही। उन्होंने यह नहीं कहा कि वर्चुअल रैली जनता तक पहुंचने का एक बेहतर जरिया है। वे तो अमित शाह के भाषण पर मीनमेख निकालते रहे।
वर्चुअल रैली की बजाय पहले की तरह चुनावी रैलियां और सभाएं करने वाले याद रखें कि कोरोना के कारण अस्पतालों में शवों के अंबार लगे हैं, बिस्तरों के ऊपर मुर्दे, शवगृहों में  अज्ञात,  गुमनाम लाशें, जमीन पर असहनीय पीड़ा से रोते बिलखते  कोरोना पीडि़त पड़े हैं। इसलिए आगे भी पर्वों और चुनावों को देखने या उनका आनंद लेने के इच्छुक लोग समझ जाएं। यह वक्त समझदारी दिखाने का है। यह मानकर चलें कि कुछ समय के बाद दुनिया फिर से पहले की तरह से चलेगी। अंधकार के बाद उजाला तो होगा ही। यही प्रकृति का नियम है। एक बार कोरोना पर विजय पाते ही कारें, सोना, नए घर वगैरह फिर बिकने लगेंगे। खरीदारों की कमी नहीं है। आपको याद ही होगा कि पिछले साल दीवाली से पहले तक सारे देश में यह वातावरण बनाया जा रहा था कि मंदी के कारण कारों की बिक्री बिल्कुल बैठ गई है। पर यह अनुमान गलत निकला। तब हजारों कारों की बिक्री हुई। दिल्ली-एनसीआर में ही मर्सिडीज बेंज और बीएमड्ब्ल्यू जैसी लक्जरी कारें सैकड़ों की संख्या में बिकीं। कोरोना खत्म होने के बाद दुनिया से पहले की तरह घूमेगी और खरीददारी करेगी। तब फिर फिर से सिनेमा घर, रेस्तरां और शॉपिंग मॉल्स आबाद भी हो जाएंगे। पर अभी सब को सतर्क और सजग रहना ही हितकर है।

आर.के. सिन्हा
लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं