विकास, विश्वास और संघर्ष का ऐतिहासिक वर्ष

मई, 2019 में केन्द्र सरकार का संचालन करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व पर भारत के लोकतंत्र ने एक बार फिर विश्वास जताया और मोदी (2) का कार्यकाल 2019-2024 का शुभारम्भ हुआ। दूसरी बार मिली इस विजयश्री के बाद पहली बार देश के मतदाताओं को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि जिस प्रकार विगत पाँच वर्षों में हमने सबका साथ और सबका विकास को चरितार्थ किया अब उसके साथ-साथ हमें सबका विश्वास भी जीतना होगा। पुन: सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सभी केन्द्रीय मंत्रालयों को यह निर्देश जारी किया कि भारत की अर्थव्यवस्था को वर्ष 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डालर के स्तर तक पहुँचाने के लिए किस प्रकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर चलना होगा उसका पूरा खाका तैयार किया जाये।

इन लक्ष्यों को लेकर केन्द्र सरकार ने अर्थव्यवस्था की मजबूती का लक्ष्य हर मंत्रालय का केन्द्रीय विषय बना दिया। किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह परम आवश्यक होता है कि उस देश के नागरिक देश के अन्दर एक खुला स्वतंत्र और अधिकार सम्पन्न वातावरण महसूस करें। जहाँ डर या अत्याचार, अपराध या आतंक का कोई स्थान न हो, जहाँ देश का हर नागरिक स्वस्थ रहकर अपने-अपने दायित्वों को पूरी लगन के साथ सम्पन्न करे। दूसरी बार की सत्ता का शुभारम्भ अगस्त माह में तीन तलाक प्रथा के समापन से हो गया। इस नये कानून से देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को एक अत्याचारी और भय उत्पन्न करने वाली प्रथा से मुक्ति मिल गई। वैसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2015 में ही तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया था। विश्व के 23 मुस्लिम देशों में पहले से ही तीन तलाक प्रथा प्रतिबन्धित थी। अगस्त माह में ही भारत की संसद ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी करते हुए जम्मू कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के साथ-साथ लद्दाख को एक अलग केन्द्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया। इससे समूचे भारत में एक संविधान और एक ध्वज का सपना साकार हुआ। इस ऐतिहासिक परिवर्तन के बाद जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के बादल काफी हद तक छट चुके हैं। मैं स्वयं जम्मू कश्मीर प्रान्त का प्रभारी होने के नाते यह दावे से कह सकता हूँ कि जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख के लोगों को अब वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भागीदारी और केन्द्र सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का सीधा लाभ मिलने लगा है। इस परिवर्तन से कुछ अंगुलियों पर गिने जाने योग्य नेताओं के अतिरिक्त आम जनता में पूरी तरह प्रसन्नता की लहर व्याप्त हो चुकी है।

भारत की 80 प्रतिशत जनसंख्या की श्रद्धा के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि जैसे ऐतिहासिक धर्मस्थल पर छिड़े विवाद को पूरी तरह समाप्त करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नवम्बर, 2019 का ऐतिहासिक फैसला सुनाया। वास्तव में यह विवाद तो वर्षों पूर्व देश के राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सुलझा लिया जाना चाहिए था लेकिन स्वतंत्रता के बाद देश का लोकतंत्र बन्द कमरों की राजनीति के चलते तुष्टीकरण के मार्ग को अपनाता रहा। ऐसी तुष्टिकरण नीतियों के कारण न्याय व्यवस्था के मार्ग में तरह-तरह की बाधाएँ खड़ी की गई जिससे न्यायकारी निर्णय लटकता रहा। केन्द्र सरकार ने इस विषय में लोकतांत्रिक प्रथाओं का सम्मान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के ऊपर किसी प्रकार का दबाव न तो स्वयं बनाया और न ही देश के किसी राजनीतिक दल को इस प्रकार की अलोकतांत्रिक और गैर-कानूनी हरकतें करने की अनुमति दी। इन कारणों से सर्वोच्च न्यायालय को बाधा रहित वातावरण कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ तो राम मंदिर निर्णय के बाद मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। दिसम्बर, 2019 में भारत की संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम को पास करके जब पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को अत्याचार से मुक्ति दिलाने की दिशा में एक प्रावधान जोड़ा कि ऐसे जो लोग दिसम्बर, 2014 तक इन तीनों देशों से भारत आ चुके हैं, उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की जायेगी। यह प्रावधान एक सामान्य सा कार्य था, परन्तु भारत के विपक्षी दलों ने इस पर देश के मुस्लिम समुदाय को दिग्भ्रमित करके आन्दोलनात्मक मार्ग पर चलने के लिए विवश किया। हालांकि इस प्रावधान से भारतीय मुस्लिम जनता के हितों पर कहीं कोई प्रभाव नहीं पड़ता था, परन्तु विपक्षी राजनीति को केवल मात्र सरकार का विरोध करने का प्रतीक मानने वाले राजनेताओं ने इस विषय को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की नई शुरुआत के साथ जोड़ दिया। वास्तव में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर का अभी शुभारम्भ हुआ ही नहीं था। इस पर तो केवल विचार और प्रक्रियाओं का निर्धारण ही हो रहा था।

देश के अन्दर इन ऐतिहासिक परिवर्तनों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को तेज प्रगति के पथ पर लाने का कार्य भी गम्भीरता के साथ चलाया जा रहा था कि फरवरी, 2020 में कोरोना महामारी ने हमारे देश पर भी दस्तक दे डाली। इस महामारी को एकदम प्रारम्भिक अवस्था में ही पूरी दूरदृष्टि के साथ नियंत्रण करने के प्रयास युद्धस्तर पर प्रारम्भ कर दिये गये। देश को इस महामारी से बचाने के लिए सबसे पहले कदम के रूप में आपदा प्रबन्धन कानून का सहारा लेकर आपात स्थिति की घोषणा की गई और जिस प्रकार युद्ध में ब्लैकआउट घोषित होता था उसी प्रकार इस महामारी से बचाने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन घोषित किया गया। इस लॉकडाउन के फलस्वरूप भारत में कोराना महामारी का प्रसार उतना नहीं हो पाया जितना विश्व के कई बड़े-बड़े देशों में देखने को मिला। श्री नरेन्द्र मोदी इस महामारी संग्राम में विश्वयोद्धा के रूप में उभरे। बेशक इस लॉकडाउन प्रक्रिया का असर देश के लगभग प्रत्येक नागरिक की आजीविका पर पडऩा स्वाभाविक था। विशेष रूप से श्रमिक, किसानों और गरीब लोगों पर तो इस आपात स्थिति में भूखमरी की नौबत आ गई। परन्तु केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री जी के निर्देश पर भारत सरकार के खजाने से 20 लाख करोड़ रुपये की अनेकों आर्थिक सहायता योजनाएँ घोषित कर दी। इसके अतिरिक्त भी लाखों-करोड़ों रुपये की धनराशि से देश के अन्तिम व्यक्ति तक भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित कराने का एक विशाल कार्य किया जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ऐतिहासिक बताते हुए विश्व के सभी देशों को इसके अनुकरण की सलाह दी। प्रधानमंत्री ने सदैव अपने विनम्र सम्बोधनों में केवल एक ही संशय को बार-बार व्यक्त करके देश के सभी निचले स्तर तक के शासन-प्रशासन और पुलिस के एक-एक अधिकारी तक यह संदेश पहुँचाने में सफलता प्राप्त की कि ‘देश का कोई नागरिक भूखा न सोये’।

सरकार के इन प्रयासों को देखते हुए देश के लाखों-करोड़ों धन-सम्पन्न व्यक्तियों और संस्थाओं ने भी पूरी उदारतापूर्वक अपने साधनों के द्वार गरीब नागरिकों के लिए खोल दिये। देश के प्रत्येक नागरिक को संयम और संकल्प के साथ इस महामारी से लडऩे के लिए श्री नरेन्द्र मोदी ने व्यक्तिगत मानसिक सम्पर्क के द्वारा मास्क पहनने, सामाजिक दूरी बनाये रखने, बार-बार हाथ धोने और सात्विक खान-पान से अपने-अपने शरीर की रोग रक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने जैसे कार्यों को आज देश की संस्कृति के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। इतना ही नहीं इस महामारी के चलते देश की लुढक़ चुकी अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे पटरी पर लाने के उद्देश्य से ‘आत्म निर्भर भारत’ का नारा देते हुए देश के अन्दर से अर्थव्यवस्था को पुन: खड़ा करने की मजबूत योजनाओं का श्रीगणेश कर दिया है। प्रधानमंत्री के इन प्रयासों से देश का भविष्य निश्चित दिखाई दे रहा है कि सामान्य आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा को अब देश में एक नई मजबूती मिलेगी। यह कहना अतिश्योंक्ति नहीं होगी कि भारत इस वर्तमान महामारी से संघर्ष के बाद एक मजबूत लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्ति बनकर अवश्य ही खड़ा होगा। भारत एक ऐसी शक्ति बन सकता है कि जो भविष्य में ऐसी महामारियों के बार-बार आने पर भी निष्प्रभावी रहकर प्रगति के पथ पर चलता दिखाई देगा। इतना ही नहीं बल्कि भविष्य का भारत सारे संसार के लिए एक अनुकरणीय स्तर हासिल करेगा।   -अविनाश राय खन्ना