Tuesday, September 25, 2018 08:31 PM

हिन्दू शरणार्थी

भारत विभाजन से पहले 1945 में पेशावर में इस्लामिया कालेज में अपने भाषण में जिन्ना ने कहा था 'हम ब्रिटिशों से छुटकारा चाहते हैं परन्तु मालिकों का परिवर्तन हम नहीं चाहते! भारत के तीन-चौथाई हिस्से पर हिन्दू अपनी इच्छानुसार शासन कर सकते हैं, लेकिन मुसलमानों को एक चौथाई हिस्सा दिया जाए, जहां वह बहुमत में हैं। दोनों को स्वतंत्र होना चाहिए, इसमें बुरा क्या है?'

जब पाकिस्तान अस्तित्व में आने की स्थिति में था तब 11 अगस्त 1947 को जिन्ना ने पाकिस्तान के हिस्से में रहने वाले लोगों को संबोधित करते हुए कहा, 'इस देश (पाकिस्तान) में आप स्वतंत्र हैं, आप अपने मंदिरों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं, आप अपनी मसजिदों या किसी अन्य प्रार्थना- स्थल पर जाने के लिए स्वतंत्र हैं। आप किसी भी धर्म या जाति यां पंथ के हो सकते हैं-इसका इस मूलभत सिद्धांत से कोई लेना- देना नहीं है कि हम सभी एक देश के नागरिक और समान नागरिक हैं। अब मुझे लगता है कि हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि समय आने पर हिंदू हिंदू नहीं रहेंगे और मुसलमान मुसलमान नहीं रहेंगे-धार्मिक रूप में नहीं, क्योंकि वह प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था हैं : परंतु इस देश के नागरिक के राजनीतिक रूप में।'

जिन्ना द्वारा दिए आश्वासनों पर विश्वास कर लाखों की तादाद में हिन्दू और सिख पाकिस्तान में ही रह गए, लेकिन समय के साथ पाकिस्तान के राजनीतिक व सामाजिक हालातों में तबदीली आई। पाकिस्तान एक इस्लामिक देश घोषित हो गया। पाकिस्तान के इस्लामिक देश घोषित होने के साथ ही पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं और सिखों पर दबाव बढ़ता गया। हिन्दुओं और सिखों ने अपने मान व सम्मान को बचाने के लिए भारत की ओर रुख किया।

दशकों से भारत में शरणार्थी बनकर रहने वाले हिन्दुओं और सिखों को भारत की नागरिकता आज तक भी नहीं मिली। वर्तमान में तो अफगानिस्तान से भी सिख पलायन करने को मजबूर हैं। हिन्दू हों या सिख हैं तो यह भारतीय मूल के ही, इसलिए इनकी प्राथमिकता भारत में आकर बसने की होती है। भारत सरकार की ढिलमुल नीति के कारण दशकों से रह रहे पाकिस्तान से आये हिन्दुओं और सिखों को भारतीय नागरिकता न मिलने के कारण उनकी मुश्किलें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। मौजूदा समय में बड़ी संख्या में पाक हिन्दुओं को अपनी जान और इज्जत की हिफाजत के लिए मजबूरन अपने बने बनाए घर छोड़ कर वर्ष 1992 से भारत में शरणार्थी बनकर रहना पड़ रहा है। जहां 3500 से अधिक पाक हिन्दू शरणार्थी रह रहे हैं। दिल्ली के मजनू का टिल्ला क्षेत्र मेें गुरुद्वारा साहिब के पीछे खाली पड़े ऊबड़- खाबड़ मैदान में अस्थाई जीवन व्यतीत कर रहे इन पाक हिन्दुओं के लिए न तो यहां कोई बिजली पानी का प्रबन्ध है और न ही कोई स्थाई रोजगार। चाहे कि यह इस समय भारत में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं परन्तु यह भारत के नागरिक नहीं हैं। इनके लिए यह भी एक बड़ा दुख है कि अब यह पाकिस्तान के भी नागरिक नहीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान को यह हमेशा के लिए अलविदा कह चुके हैं और अब वह इनके लिए एक बेगाने देश से अधिक और कुछ नहीं हैं। इन शरणार्थी बने पाक हिन्दुओं केे पास भारतीय नागरिकता न होने के कारण यह सुरक्षा नियमों के कारण रोजगार की तलाश में अपने शिविरों से ज्यादा दूर नहीं जा सकते हैं। लिहाजा इनको आस पास के क्षेत्रों में रिक्शा चला कर या मजदूरी करके ही अपना और अपने परिवार का पेट भरना पड़ रहा है। इतने बुरे हालात होने के बावजूद खुशी- खुशी पूछने पर यह 'शुकरातलह हमदोलिलाह' (ईश्वर का शुक्र है) कहकर अपना दुख और मजबूरी के एहसास छिपाने का प्रयास तो करते हैं, परन्तु आंखों में आए आंसू इनकी हालत खुद बयां कर देते हैं। मजनू का टिल्ला शिविर के प्रमुख हनुमान प्रसाद पुत्र भगवान दास के अनुसार पाकिस्तान में उनके बने कारोबार समाप्त करके उनसे बंधुआ मजदूरी करवाई जा रही थी और धर्म त्यागने के लिए सजाएं दी जाती थीं। आदर्श नगर के अस्थाई शिविर में रह रहे बादल, दियाल दास, सीता राम आदि पाक हिन्दू शरणार्थियों ने बताया कि पाकिस्तान के अस्तित्व मेेंं आने से लेकर अब तक एक भी ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता, जब किसी पाकिस्तानी हिन्दू ने अपने देश से गद्दारी की हो या अपना मदर- ए- मुल्क मानने से इन्कार किया हो, परन्तु इसकी अपेक्षा हमेशा वहां रहते हिन्दुओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। रोहिणी सैक्टर के अस्थाई शिविर में रह रहे कसौली व शांति देवी ने कहा कि दिल्ली के शिविरों में रहते सभी हिन्दू शरणार्थी समय- समय पर पर्यटन के बहाने या धार्मिक वीजा लेकर हिन्दुस्तान आए हैं, नहीं तो उनको अपनी जान और बहु- बेटियों की इज्जत बचाने के लिए यहां आने की मंजूरी कभी न मिलती। इन शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि यदि उनको भारत सरकार की ओर से यहां की नागरिकता न मिली तो वे यहीं अपनी जान दे देंगे, परन्तु वापिस पाकिस्तान कभी नहीं जाएंगे।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि दशकों से भारत में रह रहे हिन्दू शरणार्थियों को भारत सरकार वह नहीं दे सकी जिसके वो हकदार हैं। भारत सरकार विश्व में कहीं भी हिन्दुओं या सिखों को संकट में देखती है तो उनकी मदद के लिए सक्रिय हो जाती है। क्योंकि सरकार से ले समाज तक की यह भावना होती है कि वह इस देश व समाज के ही अंग हैं। फिर पाकिस्तान व अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश से लेकर अन्य इस्लामिक देशों के दबाव के कारण भारत आ रहे हिन्दू शरणार्थियों को भारत सरकार नागरिकता क्यों नहीं दे रही। 

भारत सरकार को चाहिए कि हिन्दू शरणार्थियों के मामले को लेकर कानूनी प्रक्रिया को तेज कर शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वह अपने पुरखों की गलती की जिन्होंने जिन्ना के आश्वासन पर भरोसा कर वहीं रुकने की जो गलती की उसकी सजा से मुक्त हो सकें।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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