अरब दुनिया में हिंदी 

अरब दुनिया भारत के लिए एक अनजानी भूमि न होकर सांस्कृतिक और राजनीतिक सहकार की भूमि रही है क्योंकि वह कई सदियों की सांस्कृतिक धरोहरों को लेकर भारत के साथ कदम-दर-कदम बढऩे की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा पर गए थे, तभी उनका प्रोटोकॉल तोड़कर स्वागत किया जाना बदलते परिवेश में संयुक्त अरब अमीरात के लिए भारत की उपयोगिता का एहसास करा रहा था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री के रूप में किसी शख्स ने 34 साल बाद इस देश की यात्रा की थी, जो सही अर्थों में उन तमाम रिक्तियों को भरने काम कर रही थी, जो पिछले दशकों में उपजी थीं। इस यात्रा के बाद दोनों देशों के रिश्तों को जो एक नई दिशा मिली, उसी का एक नतीजा यह भी है कि हिंदी को संयुक्त अरब अमीरात की अदालती कार्यवाही की भाषा बनने का अवसर मिला।

पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात ने हिंदी को अपनी अदालतों में इस्तेमाल होने वाली तीसरी आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया। इससे पहले अरबी और अंग्रेजी ही वहां की अदालती भाषाओं के रूप में मान्य थीं। अब हिंदी भी यूएई की अदालती कार्यवाही का हिस्सा बनेगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से उर्दू को भी अदालती हैसियत प्राप्त हो जाएगी। यानी भारत की भाषा पाकिस्तान के लोगों के लिए भी एक जगह बनाने का कार्य करेगी। अबू धाबी न्यायिक विभाग का यह स्पष्ट मत है कि हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने से श्रमिकों के मुकदमों में न्याय सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। दरअसल संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में हिंदी भाषियों की आबादी लगातार बढ़ रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यूएई की कुल आबादी में दो तिहाई प्रवासी हैं, जिनमें से 26 लाख भारतीय हैं। यह कुल आबादी का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है। चूंकि वहां रह रहे भारतीयों को अरबी नहीं आती, इसलिए वे न्यायिक प्रक्रिया को समझने में असमर्थ रहते हैं। उन्हें जो उनके वकील बताते हैं, वही जान पाते हैं। इसलिए सही अर्थों में अदालती कार्यवाही पारदर्शी नहीं हो पाती। इसी जटिलता को समाप्त करने के लिए यूएई ने हिंदी को अदालती भाषा का दर्जा प्रदान किया है। यूएई का यह कदम भारत के लिए कूटनीतिक लिहाज से भी अहम है। 

भारत और संयुक्त अरब अमीरात में एक भिन्न् तरह का रिश्ता है क्योंकि भारत में इस्लाम के अनुयायियों की इतनी आबादी है कि इसे कुछ विद्वान 'सेकंड होम ऑफ इस्लामÓ भी कहते हैं जबकि संयुक्त अरब अमीरात में रह रही भारतीय आबादी वहां खुद को एक लघु भारत (मिनी इंडिया) के रूप में अभिव्यक्त करती है। यूएई की कुल आबादी में करीब 30 हिस्सा भारतीयों का होने के कारण 'मिनी इंडियाÓ और इंडिया के रिश्तों की गतिशीलता एवं समृद्धता अन्य देशों के मुकाबले कहीं अधिक होगी। यही नहीं मिनी इंडिया लगातार अपना आकार बड़ा कर रहा है। उल्लेखनीय है कि भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार प्रतिवर्ष लाखों भारतीय अरब देशों की ओर जाते हैं, जिनमें लगभग 96 प्रतिशत लोग सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर और ओमान में बसते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि अरब देशों में भारत का डेमोग्राफिक डिपॉजिट तेजी से बढ़ रहा है, जिसका लाभ भारत को केवल आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि कूटनीतिक क्षेत्र में भी हासिल होगा। इसका फायदा भारत पाकिस्तान को काउंटर करने में भी उठा सकता है। ध्यान रहे कि 1970 के दशक से अरब देशों का जिस तरह से इस्लामीकरण हुआ और पाकिस्तान ने जिस तरह उसका लाभ उठाया, वह भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। अब भारत अपने इस डेमोग्राफिक डिपॉजिट के माध्यम से पाकिस्तान को काउंटर कर सकता है।

भारत और संयुक्त अरब अमीरात के आर्थिक रिश्ते भी अमेरिका व चीन को छोड़कर शेष दुनिया के मुकाबले काफी सुदृढ़ हैं। यह दुनिया का दूसरा ऐसा देश है, जहां भारत का सबसे ज्यादा निर्यात होता है हालांकि ट्रेड पार्टनर के रूप में यह तीसरे स्थान पर आता है। वर्ष 2017 में जब संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन पिं्रस भारत के 68वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आए थे, तो दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में 60 प्रतिशत बढ़ोतरी का फैसला किया था। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश व्यापार एवं वाणिज्य विभाग के अनुसार भारत और यूएई के बीच 2020 में व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। संयुक्त अरब अमीरात ने भारतीयों के लिए वीजा के नियमों में भी कई तरह की छूट दे रखी है। और भारत ने 2015 से यूएई के नागरिकों के लिए ई-वीजा की व्यवस्था की है। बीते 2 दिसंबर को भारत-संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) संयुक्त आयोग बैठक (जेसीएम) में दोनों देशों ने नए क्षेत्रों में साझेदारी का आह्वान किया। जेसीएम की इस 12वें सत्र की बैठक के दौरान भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने मुद्रा अदला-बदली की व्यवस्था सहित ऊर्जा, सुरक्षा, व्यापार, निवेश, अंतरिक्ष, रक्षा समेत अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन बातचीत की। मुद्रा अदला-बदली समझौते से आयात एवं निर्यात के लिए डॉलर में भुगतान की आवश्यकता नहीं रह जाएगी, जो कि भारत के लिए कई मायनों में लाभदायक साबित होगा।

एक और प्रमुख तथ्य है- आतंकवाद का दुबई कनेक्शन। इसके अतिरिक्त आईएसआईएस के भारत की ओर बढ़ते कदम तथा शिया-सुन्नी देशों का आपसी टकराव महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टिकोण से संयुक्त अरब अमीरात भारत के लिए खास अहमियत रखता है। चूंकि भारत में हुए कुछ चरमपंथी हमलों का दुबई कनेक्शन रहा है, विशेषकर मुंबई हमले से डेविड हेडली का संबंध और उसका दुबई में रहना, मुंबई में ही 2003 में हुए दोहरे बम विस्फोट जुड़ा मुहम्मद हनीफ द्वारा धमाकों की योजना दुबई से बनाना और पाकिस्तान को यूएई का लगतार आर्थिक सहयोग मिलना आदि। इस स्थिति में संयुक्त अरब अमीरात के साथ आतंकवाद रोकने की दिशा में एक मूल्यवान साझेदारी भारत के लिए आवश्यक हो जाती है। चूंकि संयुक्त अरब अमीरात हार्न ऑफ अफ्रीका के अल धाकरा एयर बेस (अबूधाबी), एयरबेस एलाइड ऑपरेशन और 1991 के खाड़ी युद्ध में हिस्सेदारी निभा चुका है, इसलिए भी संभावना बनती है कि संयुक्त अरब अमीरात आतंकवाद के खिलाफ किसी भी जंग में भारत का साथ देगा।

फिलहाल भारत-संयुक्त अरब अमीरात संबंध मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, मिनी इंडिया और हिंदी के बढ़ते मान समेत भारत के विभिन्न् आयामों को संयोजित किए हुए हैं। दोनों देशों के गहराते संबंध न सिर्फ इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स के वित्त-पोषण में, बल्कि ड्रग ट्रैफिकिंग रोकने, पाकिस्तान की इस्लाम आधारित कूटनीति को काउंटर करने के साथ-साथ अमेरिका की ऑयल डिप्लोमैसी से उपजी चुनौतियों का सामना करने में भी सहायक साबित होंगे।