दंगा पीड़ित हिन्दू परिवार

पिछले माह देश की राजधानी दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर संसद में हुई बहस में जब गृहमंत्री अमित शाह से यह पूछा गया कि दंगों में कितने मुस्लिम और हिन्दू मरे हैं तो गृहमंत्री ने कहा कि दंगों में जो लोग मरे हैं वह भारतीय हैं। हम हिन्दू और मुस्लिम के रूप में नहीं देखना चाहते। गृहमंत्री अमित शाह ने जो कहा वह अपनी जगह ठीक है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जान-माल की हानि हिन्दू वर्ग की ही अधिक हुई है। दिल्ली दंगों के दौरान 50 से अधिक लोगों की मौत हुई है जिनमें से आधे से अधिक की मौत गोली लगने से हुई है। इनके अलावा 200 के करीब लोग गोली लगने से घायल हुए हैं। दिल्ली दंगों के दौरान अग्नेयास्त्रों के साथ-साथ छोटे हथियारों जो उत्तर प्रदेश, बिहार में ही अधिक बनते का इस्तेमाल हुआ। गुलेलें, तेजाब बम पत्थर, चाकु इत्यादि दर्शाते हैं कि एक योजनाबद्ध तरीके से हमले हुए। सरकार भी यही कह रही है कि शाहीन बाग धरने से लेकर साम्प्रदायिक दंगों के पीछे देश विरोधियों का दिमाग चला और इन्हें भीतर व बाहर से आर्थिक सहायता भी मिलती रही। उपरोक्त तथ्यों से यह बात तो स्पष्ट हो रही है कि जो तत्व देश विरोधी गतिविधियों में सक्रिय थे उन्हें बाहर व भीतर से आर्थिक सहायता मिलती रही।

अब प्रश्न यह है कि जो देश के हित के लिए सामने आए वह कोई योजनाबद्ध तरीके से नहीं आये। वह तो एक क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में सडक़ों पर उतरे और उनका जिस तरह हिंसात्मक विरोध हुआ उसके परिमामस्वरूप उनका जानी नुकसान के साथ-साथ लाखों-करोड़ों रुपए का अर्थिक नुकसान भी हुआ। नुकसान दोनों वर्गों का ही हुआ लेकिन अंतर यह है कि मुस्लिम वर्ग को तो सरकार के साथ उनका समाज मदद के लिए उतर आया है, जबकि दंगा पीडि़त हिन्दू समाज की मदद के लिए दिल्ली सरकार उदासीनता दिखा रही है और केंद्र सरकार अभी छानबीन में ही व्यस्त है। कटु सत्य यह है कि हिन्दू समाज में से दंगा पीडि़त हिन्दुओं की आर्थिक मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दिल्ली में एक नहीं अनेक ऐसे मंदिर होंगे जिनकी आय लाखों-करोड़ों रुपए की होगी। इसी तरह बड़े-बड़े हिन्दू संत, प्रचारक, कथावाचक तथा कई अन्य हिन्दू समाज की बात भी करते हैं और हिन्दू धर्म का प्रचार भी करते हैं। इन सबके पास धन-दौलत की कमी नहीं है। इसी तरह विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल और संघ तथा संघ से जुड़े संगठन जो सामाजिक उत्थान व सेवा कार्य में लगे हुए हैं,  लेकिन दंगा प्रभावित हिन्दुओं परिवारों की आर्थिक सहायता करने के लिए कोई आगे नहीं आया।

हिन्दू पर्वों व त्यौहारों पर विशेषतया कुम्भ पर लाखों-करोड़ों की तादाद में एकत्रित होने वाला हिन्दू समाज अपने हिन्दू समाज के पीडि़तों के लिए क्यों नहीं आगे आता ? यही प्रश्न आज दिल्ली दंगे में पीडि़त हिन्दू परिवार पूछ रहे हैं। देश व दुनिया में हजारों-लाखों की तादाद में बने मंदिर हैं इनमें से कुछ एक के पास अरबों रुपए हैं लेकिन ऐसे मंदिरों की प्रबंधक कमेटियां भी हिन्दू दंगा पीडि़तों के लिए आगे नहीं आतीं। आज से तीन दशक पहले जब कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को भगाया गया था तब भी उनकी आर्थिक सहायता के लिए कोई हिन्दू मंदिर, महंत, संत सार्वजनिक रूप से आगे नहीं आया था। समाज सेवा के नाम पर कार्य कर रहे कुछ संगठन अवश्य आगे आए।
हिन्दू समाज का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि वह अपने पीडि़त वर्ग चाहे वह दंगा पीडि़त हो या दलित व गरीब हो उसकी आर्थिक सहायता तथा मानसिक समर्थन के लिए आगे नहीं आता जबकि दूसरे सम्प्रदायों के लोग एकजुट होकर अपने सम्प्रदाय के पीडि़त व गरीब वर्ग की मदद के लिए संकट की घड़ी में आगे आते हैं।

सरकार के नियंत्रण में जो मंदिर हैं वहां लाखों रुपये का चढ़ावा प्रतिदिन चढ़ता है, सरकार भी मंदिरों के पैसों को हिन्दुओं पर खर्च नहीं करती। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दूसरे सम्प्रदाय के सामाजिक कामों पर अवश्य खर्च कर देती है। उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह आवश्यक है कि हिन्दू समाज में भी एक संस्था अवश्य बनाई जाए जो देश में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण अपना सबकुछ लुटा देने वाले हिन्दू परिवारों की सहायता के लिए सहायक हो सके। दिल्ली दंगों में प्रभावित सभी वर्गों के परिवारों को दिल्ली सरकार ने तत्काल सहायता के रूप में 25000-25000 प्रत्येक परिवार को देने की घोषणा की है। जिनकी दुकान और घर जलकर राख हो गया हो उसका 25000 में क्या होगा। हिन्दू समाज के बुद्धिजीवी, मंदिर प्रबंधक कमेटियां, डेरों के महंत व संत समाज दिल्ली दंगों को सम्मुख रख पैदा हुए संकट के समाधान के लिए अवश्य सोचें और हिन्दू परिवारों की सहायता के लिए आगे आएं। हिन्दू संगठनों को तत्काल रूप से आगे आकर दंगा पीडि़त परिवारों का हाथ पकड़ मदद करनी चाहिए। यह सबका नैतिक कत्र्तव्य है, इसे निभाने में ही समाज की भलाई है।    

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।