'हुआ तो हुआ'

पंजाब में चुनावी दौरे पर आये कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस से जुड़े बुद्धिजीवी सैम पित्रोदा द्वारा की टिप्पणी 'हुआ तो हुआ' को शर्मनाक बताते हुए कहा कि सैम को ऐसा बोलने से पहले शर्म आनी चाहिए थी। सिख दंगे त्रासदी थी और 84 के दंगों के आरोपियों को छोड़ा नहीं जाएगा। सैम को समूचे देश से माफी मांगने के लिए कहा गया है।

बठिंडा में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि सैम पित्रोदा के बयान के बाद हुए बवाल पर नामदार कह रहे हैं कि उन्हें शर्म आनी चाहिए। शर्म तो नामदार को आनी चाहिए जिन्होंने 84 के सिख दंगों के दोषियों को न केवल केंद्र में जगह दी, बल्कि पंजाब का प्रभारी भी बनाया। जब उसका विरोध हुआ तो उन्हें वहां से हटाकर मध्यप्रदेश का सीएम बना दिया। इसलिए शर्म तो नामदार को ही आनी चाहिए, जिन्होंने 35 साल तक सिख दंगा प्रभावितों को इंसाफ नहीं दिया। मोदी ने कहा, 2014 लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि सिख दंगों के दोषियों को सजा दिलाई जाएगी। यह वादा पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल के आशीर्वाद से पूरा हुआ है। अब जो भी दोषी बचे हैं उन्हें भी जल्द जेल भेजा जाएगा।

ही है। पंजाब में दंगे नहीं हुए लेकिन दिल्ली व देश के अन्य स्थानों पर हुए। पंजाब में भिंडरावाला और निरंकारियों के बीच 1978 में अमृतसर में हुई खूनी झड़प के बाद से ही हिन्दुओं पर दबाव बढ़ता चला गया। 1978 से लेकर 1984 तक आये दिन पहले निर्दोष हिन्दुओं को अलगाववादियों ने अपने निशाने पर रखा फिर सुरक्षाबलों और पुलिस कर्मियों को इसी दौर में सरकारी भवन और रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड अग्नि भेंट भी होते रहे। बसों से उतार कर हिन्दुओं की हत्या की गई। धीरे-धीरे अकाली दल और अन्य सिख संगठनों पर भी अलगाववादी सोच रखने वालों की पकड़ मजबूत होने लगी और परिणामस्वरूप पाकिस्तान की सीमा से लगने वाले गुरुद्वारों और डेरों को अलगाववादियों और आतंकवादियों ने अपना आश्रय स्थल बना लिया।

पाकिस्तान, इंग्लैंड, जर्मन और कनाडा तथा जर्मनी में बैठे अलगाववादियों के संरक्षकों और समर्थकों ने भारत विरुद्ध एक अभियान छेड़ दिया। खालिस्तान के नाम पर सिखों के युवा वर्ग को भड़काया गया और फिर पंजाब की धरती पर निर्दोषों को विशेषतया हिन्दुओं को निशाने पर रखा गया और नारा लगा कि 'धोती टोपी यमुना पार', एक सिख 35 हिन्दुओं को मारे तो खालिस्तान अपने आप बन जाएगा।

उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सिखों के इतिहासिक व पवित्र धार्मिक स्थानों का खुलकर इस्तेमाल हुआ। 'गोल्डन टैंपल' को तो एक प्रकार से किले का रूप ही दे दिया गया। पंजाब में जिसने भी अलगाववादियों का विरोध किया उसकी हत्या कर दी गई। व्यापारी, कर्मचारी, नेता, पत्रकार चाहे कोई किसी भी वर्ग का था जिसने विरोध किया वह आतंकियों के निशाने पर था। पंजाबी हिन्दू तो दूसरी श्रेणी का नागरिक बनकर रह गया था उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ आम बात हो गई थी। हिन्दुओं की हत्या कर प्रतिदिन स्कोर गिनने की कहानियां सुनने को मिलने लगी थी। सुबह घर से निकलने पर शाम को घर वापसी यकीनी नहीं थी। गांवों से हिन्दू परिवारों का पलायन शुरू हो गया था।

पंजाब में देश विरोधी माहौल को देखते हुए पंजाब तथा केंद्र सरकार ने आतंकियों विरुद्ध अभियान चलाया जिसका अंत आप्रेशन 'ब्लू स्टार' के रूप में हुआ और उसकी प्रतिक्रिया में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कत्ल उन्हीं के दो सिख अंगरक्षकों ने किया जिसके बाद देश में 1984 के सिख विरोधी दंगे भड़के।

सिख विरोधी दंगे उसी लड़ी का एक अमानवीय कृत्य था जो 1978 के पंजाब में वैसाखी के दिन निरंकारी व भिंडरावाले के समर्थकों के बीच खूनी झड़प के साथ शुरू हुआ था। आज पक्ष और विपक्ष 84 के देगों के लिए एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं लेकिन इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर 84 के देगों को लेकर संघ परिवार को इसलिए दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है कि संघ परिवार ने सिखों को बचाया नहीं। सत्य यह है कि दिल्ली में पंजाबी हिन्दू परिवारों तथा संघ से जुड़े लोगों ने सिख परिवारों को बचाया था। जिस तरह पंजाब के सीमावर्ती गांवों में सिख परिवारों ने हिन्दू परिवारों को बचाया। आज संघ को उपरोक्त बात के लिए श्रेय देने की बजाये उस पर उंगली उठाई जा रही है, जो कि गलत है और सत्य से मुंह मोडऩे वाली बात है। पंजाब में जो हिन्दू परिवार गांवों से पलायन कर आये या जिन निर्देषों को मारा गया उनके परिवारों को तो किसी सरकार ने आज तक नहीं संभाला। कै. अमरेन्द्र सिंह जब पिछली बार पंजाब के मुख्यमंत्री थे तब शिव सेना हिन्दोस्तान और हिन्दुओं के अन्य संगठनों की मांग पर आतंकवाद प्रभावित परिवारों को 700 करोड़ रुपए से अधिक सहायता देने की घोषणा की गई थी। कै. अमरेन्द्र सिंह दोबारा पंजाब के मुख्यमंत्री बन गये हैं लेकिन हिन्दुओं को आज तक एक पैसा भी सहायता के रूप में नहीं मिला।

84 के दंगों के पीडि़तों को तो पंजाब तथा केंद्र सरकार के साथ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी सहित अन्य कई संगठनों ने हर प्रकार की सहायता की लेकिन पंजाबी हिन्दू ने जो कुछ पंजाब में झेला जिनके परिवारों के सदस्य आतंकियों की गोली का निशाना बने, जिनके कारोबार समाप्त हो गये, जिन्हें पंजाब छोड़कर जाना पड़ा उनकी सुधबुध तो न पंजाब सरकार ने न केंद्र सरकार ने न ही किसी संगठन ने ली।
सिखों के मत प्राप्त करने के लिए 84 के दंगों की बात तो उठाई जाती है लेकिन पंजाब में 1980 से लेकर 1990 के दशक तक जिन निर्दोष हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा गया उनके लिए हमदर्दी के दो शब्द कहने से आज भी नेता लोग डरते हैं, क्योंकि हिन्दू असंगिठत हैं उनको लगता है कि विभाजित हिन्दू का खून खून नहीं। 

उपरोक्त सब कुछ लिखने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि भावी पीढ़ी को पूर्ण सत्य का पता हो। गलती किससे हुई और दोषी कौन है? यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि पंजाब में जब निर्दोषों के खून से होली खेली गई व जिस तरह धार्मिक भावनाओं को उभारा गया और देश की एकता व अखंडता को चुनौती दी गई थी अगर उस समय पंजाबी विशेषतया सिख बुद्धिजीवी आगे आकर देशहित में अपनी आवाज आगे आकर बुलंद करते तो शायद यह स्थिति ही पैदा न होती।

खून चाहे पंजाब में बहा चाहे दिल्ली व देश के अन्य भागों में वह हमारी कमजोरी को ही दर्शाता है। 'हुआ तो हुआ' वाली सोच को जब हम छोड़कर अपने मानवीय पक्ष को मजबूत कर लेंगे तभी हम दावा कर सकेंगे कि हम एक लोकतांत्रिक भारत के जागरूक नागरिक हैं।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।