बढ़ती जनसंख्या एक चुनौती

13 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाता है। चीन के बाद विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश भारत है। अगर भारत की जनसंख्या इसी तरह बढ़ती रही तो करीब एक दशक बाद जनसंख्या की दृष्टि से भारत चीन को भी पीछे छोड़ जायेगा। तेजी से बढ़ती भारत की जनसंख्या और उस की वजह से आने वाली चुनौतियों को लेकर राज्यसभा में गत दिनों राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने निजी विधेयक पेश किया है।

जनसंख्या विनियमन विधेयक 2019 में दो बच्चों के छोटे परिवार के आदर्श को पुनर्जीवित किया जाएगा। इस विधेयक के जरिए राज्यों और केंद्र सरकारों की ओर से प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध, उसकी पहुंच में और उसके सामथ्र्य के हिसाब से बनाने पर जोर दिया जाएगा। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उभरते सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य, पोषण, महामारी विज्ञान, पर्यावरण और अन्य विकासात्मक आवश्यकताओं के साथ जनसंख्या स्थिरीकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनसंख्या विनियमन विधेयक-2019 का लक्ष्य है।

देश की युवा और गतिशील जनसंख्या आयु संरचना के माध्यम से जनसंख्या की गति के निहितार्थ को पहचानने के लिए इस विधेयक को लाया जा रहा है। स्थायी तरीके से जनसांख्यिकीय क्षमता का दोहन और जनसंख्या समूहों व क्षेत्रों में प्रचलित जनसांख्यिकीय और सामाजिक आर्थिक विषमताओं को दूर करने में मदद करने और सभी को एक समान अवसर देने के लिए चाहे वह किसी भी आयु, लिंग, धर्म, जाति, वर्ग, वंश, रिहाइश, भाषा आदि को क्यों न हो ताकि पूर्ण विकास क्षमता के लक्ष्य को पाया जा सके।
 संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि 2010 से लेकर 2019 के बीच भारत की आबादी 1.2 फीसद की सालाना दर से बढ़ी है। जबकि इस दौरान चीन की जनसंख्या वृद्धि दर 0.5 फीसद ही रही। भारत में एक महिला औसतन 2.3 बच्चों को जन्म दे रही है। हालांकि इस जन्म औसत में पिछले पांच दशक में काफी सुधार आया है। 1969 में यह दर 5.6 थी। यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो यह आंकड़ा अभी ढाई फीसद है। यदि औसत आयु की बात करें तो 2019 में जीवन प्रत्याशा उनहत्तर साल है जो 1969 में मात्र सैंतालीस साल थी। वर्तमान में जापान के लोगों की औसत आयु चौरासी साल है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत की आबादी आने वाले कई वर्षों तक बढ़ती रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि बढ़ती आबादी किस तरह से नई-नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। आजादी के वक्त भारत की जनसंख्या तैंतीस करोड़ थी, जो पिछले सात दशक में चार गुना से अधिक बढ़ गई है। परिवार नियोजन के आधे-अधूरे कार्यक्रमों, अशिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव, अंधविश्वास और विकासात्मक असंतुलन के चलते आबादी तेजी से बढ़ी है। निश्चित रूप से सात साल बाद जब भारत दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होगा तो भारत के समक्ष वर्तमान में दिखाई दे रही जनसंख्या की चुनौतियां और अधिक गंभीर रूप में दिखाई देंगी। दुनिया की कुल जनसंख्या में भारत की हिस्सेदारी करीब अठारह फीसद हो गई है, जबकि पृथ्वी के धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा भारत के पास है। चार फीसद जल संसाधन है। जबकि विश्व में बीमारियों का जितना बोझ है, उसका बीस फीसद बोझ अकेले भारत पर है।

भारत आज जिन गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, उनका बड़ा कारण तेजी से बढ़ती आबादी ही है। हालांकि हमारे नीति-निर्माताओं ने तीन-चार दशक पहले ही जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न खतरों को भांप लिया था। इस समस्या से निपटने के लिए अनेक योजनाएं भी बनीं, लेकिन ये सभी योजनाएं आबादी नियंत्रण के लक्ष्य को हासिल कर पाने में नाकाम रहीं। 

पिछले दो दशकों में भारत ने काफी तरक्की की है और यह विश्व की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बन गया, लेकिन इस बात का बहुत प्रतिकूल प्रभाव भी देखने को मिला। मसलन, अंतरराज्यीय असमानताएं पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ गर्इं। दूसरी तरफ जनसंख्या वृद्धि से बेरोजगारी, स्वास्थ्य, परिवार, गरीबी, भुखमरी और पोषण से संबंधित कई चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। हालांकि इन समस्याओं का विश्व के प्राय: सभी देशों को सामना करना पड़ रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत में अभी भी जागरूकता और शिक्षा की कमी है। लोग जनसंख्या की भयावहता को समझ नहीं पा रहे हैं। आबादी का विस्फोट किसी भी देश के आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। जनसंख्या के लगातार बढऩे से कई देशों में गरीबी बढ़ रही है। लोग सीमित संसाधनों और पूरक आहार के तहत जीने के लिए बाध्य हैं। भारत सहित कई देशों में आबादी के बोझ ने अनेक गंभीर संकटों को जन्म दिया है। खाद्यान्न, जल संकट, प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ती जनसंख्या की ही देन हैं। चिंताजनक बात यह है कि लोगों की संख्या तो प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन धरती का क्षेत्रफल नहीं बढ़ सकता। संसाधन तेजी से सीमित होते जा रहे हैं।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए समाज व सरकार दोनों को एकजुट होकर बढ़ती जनसंख्या के कारण देश के समक्ष आने वाली चुनौतयों प्रति जनसाधारण को जागरूक करने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है। गरीबी और शिक्षा की कमी जनसंख्या बढ़ाने के दो मुख्य कारण हैं। समाज व सरकार को सर्वप्रथम सही दो बिन्दुओं को केन्द्र में रखकर योजनाएं बनानी और लागू करनी हों तभी भविष्य में भारत जनसंख्या की समस्या का समाधान कर पायेगा।

इरविन खन्ना,  मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।