विरोधियों को हराने नहीं, उन्हें जीतने में यकीन रखते थे गोखले

आजादी की लड़ाई के दौरान ऐसी अनेक शख्सियतें सामने आई, जिनमें पर्याप्त वैचारिक मतभेद थे लेकिन अपनी विद्वता, देशभक्ति, देश-हित, वैचारिक प्रखरता, सत्य पर अडिगता और देश की आजादी के लिए अपने योगदान के लिए हमेशा याद रहेंगे। उन्हीं में से एक कांग्रेस की नरमपंथी धारा के अग्रणी राजनेता गोपाल कृष्ण गोखले भी हैं। राजनेता के साथ ही वे देश के इतिहास में समाजसेवी, सुधारक, विचारक, शिक्षाविद और चिंतक के रूप में भी याद किए जाएंगे। वे महाराष्ट्र के सुकरात कहे जाने वाले महादेव गोविंद राणाड़े के प्रिय शिष्य थे और महात्मा गांधी उन्हें अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। यही नहीं, मोहम्मद अली जिन्ना के लिए भी वे प्रेरणास्रोत थे। ब्रिटिश भारत में गोखले उच्च संसदीय परंपराओं के विकास के लिए भी जाने जाते हैं।
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिला के कोटलुक ग्राम में 9 मई, 1866 को हुआ। उनके पिता कृष्णराव श्रीधर गोखले की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी लेकिन शिक्षा की अहमियत वह महसूस करते थे। इसलिए उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को अच्छी शिक्षा दी। बचपन में ही गोखले ने उच्च मूल्यों को आत्मसात किया। बताते हैं कि कोटलुक के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाते हुए अध्यापक ने बच्चों से पूछा- तुम्हें रास्ते में एक हीरा मिल जाए तो तुम उसका क्या करोगे? बालकों ने ऐसे मिले किसी हीरे से कल्पना के किले खड़े कर दिए। अधिकतर बालक हीरा मिलने से अमीरी के नशे में मस्त हो गए। कोई बोला मैं इससे गाड़ी खरीदूंगा, कोई बोला-विदेश यात्रा पर जाऊंगा। गोखले ने कहा-'मैं उस हीरे के मालिक का पता लगा कर लौटा दूंगा।Ó चकित भाव से अध्यापक ने आगे कहा- 'मानो खूब पता लगाने पर भी उसका मालिक न मिला तो?Ó गोखले बोले- 'तब मैं हीरे को बेचूंगा और इससे मिले पैसे को देश की सेवा में लगा दूंगा।Ó बालक गोपाल गोखले की इस ईमानदारी से शिक्षक बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें सच्चा देशभक्त बनने की खूब दुआएं दी।
गोपाल कृष्ण गोखले में अपनी गलती को स्वीकार करने का साहस था। इससे जुड़ा उनका एक और प्रेरक प्रसंग प्रसिद्ध है। बताते हैं कि गणित के अध्यापक को परीक्षा लेनी थी। अध्यापक ने सवालों के सही हल करने वाले को पुरस्कार की घोषणा कर दी थी। सवाल थोड़े कठिन थे। इसलिए पुरस्कार को लेकर तो विद्यार्थियों में उत्साह था, लेकिन सवाल हल नहीं हो पाने के कारण वे डरे हुए थे। काफी देर विद्यार्थी सवालों को हल करने की कोशिश करते रहे। आखिर में एक विद्यार्थी उठा और अध्यापक को अपनी उत्तर पुस्तिका दिखाई। सवाल सही ढ़ंग से हल किए गए थे और उत्तर भी सही थे। अध्यापक ने उसकी पीठ थपथपाई और पुरस्कार देकर सम्मानित किया। अन्य विद्यार्थी कमजोर माने जाने वाले इस विद्यार्थी द्वारा सबसे पहले उठने और सवाल हल कर दिखाने से हैरान थे। अगले दिन जैसे ही अध्यापक कक्षा में आए पुरस्कार विजेता विद्यार्थी उनके पैरों से लिपट गया और फूट-फूट कर रोने लगा। अध्यापक ने पूछा- 'तुम क्यों रो रहे हो। तुमने तो पुरस्कार जीत कर अच्छे विद्यार्थी होने का परिचय दिया है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए।Ó विद्यार्थी ने कहा- 'आपके द्वारा दिए गए पुरस्कार का मैं अधिकारी नहीं हूँ। मैंने किताब से नकल करके सवालों का हल किया था। मुझे मेरी गलती के लिए क्षमा कर दें। भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी।Ó अध्यापक ने कहा- 'तुम्हें सवालों का सही हल नहीं आता। लेकिन तुम्हें किसी को धोखा देना भी नहीं आता। गलत ढ़ंग से कोई काम करने पर तुम्हारी आत्मा तुम्हें कचोटती रही। तुमने आत्मा की आवाज सुनकर अपनी गलती स्वीकार कर ली। अपनी गलती मान लेने वाले बड़े होकर बड़ा काम और ऊंचा नाम करते हैं।Ó अध्यापक ने उसे गले से लगा लिया। अपनी गलती स्वीकार करके शिक्षक का स्नेह प्राप्त करने वाला वह बालक गोपाल कृष्ण गोखले ही था।
 स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले कुछ समय तक एक स्कूल में अध्यापक रहे। बाद में पूना के प्रसिद्ध फग्र्यूसन कॉलेज में इतिहास और अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। राणाडे के संपर्क में आने के बाद गोखले सार्वजनिक कार्यों में रुचि लेने लगे। कांग्रेस की स्थापना के कुछ समय बाद वह उससे जुड़ गए। 1905 में बनारस अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। उस समय कांग्रेस में नरम दल व गरम दल में तीखे मतभेद देखने को मिले। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक व बिपिन चंद्र पाल की लाल-बाल-पाल की तिकड़ी ने कांग्रेस की शांतिपूर्ण ढ़ंग से कार्य करने और ज्ञापन देने की नीति का विरोध किया और देश को आजाद करवाने के लिए जोरदार आंदोलन की पक्षधरता की। गोखले क्रांति की बजाय सुधारों में विश्वास करते थे और शांतिपूर्ण तरीके से देश को स्वशासन की तरफ ले जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने शिक्षा को महत्वपूर्ण माना। देश की गरीब जनता तक शिक्षा पहुंचाने के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण सुझाव दिए। 1902 में उन्हें इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल का सदस्य चुना गया। उन्होंने इस भूमिका में छह से 10 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे की अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव रखा, जोकि आजाद भारत में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार की नींव और प्रेरणास्रोत बना। 
गोखले का मानना था कि शिक्षा की सारी जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए। लेकिन अंग्रेजी सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। उस समय अंग्रेजी सरकार शिक्षा के फैलाव को अपने लिए खतरे की तरह देखती थी। गोखले वित्तीय मामलों पर बोलने वाले प्रखर वक्ता थे। काउंसिल के सदस्य के रूप में उन्होंने संसदीय परंपराओं के मामले में आगामी नेताओं का मार्गदर्शन किया। वे राजनैतिक मतभेदों को स्वीकार करने वाले और अपने विचारों को स्पष्ट ढ़ंग से रखने वाले नेता थे। बताते हैं कि किसानों के मुद्दों पर ब्रिटिश शासन के दौरान विधान परिषद के सदस्य के रूप में पहली बार वॉक आउट उन्होंने किया था।
गोपाल कृष्ण गोखले ने आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के प्रेरक व गुरु की भूमिका निभाई। गांधी के निमंत्रण पर गोखले दक्षिण अफ्रीका गए और अंग्रेजों द्वारा किए जाने वाले रंगभेद की निंदा की। रंगभेद के विरुद्ध गांधी जी के आंदोलन की प्रेरणा-शक्ति गोखले ही थे। दक्षिण अफ्रीका से भारत में पहुंचने के बाद गांधी जी ने गोखले के संदेश के अनुसार देश को आजाद करवाने के लिए यात्राएं की। उनके दिशा निर्देश से ही गांधी जी आजीवन आम लोगों के घरों-बस्तियों में जाते रहे। किसी भी नीति व कार्यक्रम की सफलता का आधार अंतिम जन को मिलने वाले लाभ से आंकते रहे। गोपाल कृष्ण गोखले का हिन्दु-मुस्लिम एकता व साम्प्रदायिक सदभाव में विश्वास था। गांधी की तरह ही वे मोहम्मद अली जिन्ना के भी राजनीतिक गुरू थे। जिन्ना की प्रतिभा से गोखले प्रभावित हुए और उन्हें भारतीय राजनीति में आगे लाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि बाद में वे गोखले के दिखाए मार्ग पर नहीं चल पाए और देश के बंटवारे के लिए धर्म के आधार पर खून-खराबे को सही ठहराते रहे।
19 फरवरी, 1915 में गोखले का मुंबई में निधन हो गया। उनके धुर विरोधी रहे बाल गंगाधर तिलक ने उनके सम्मान में कहा था- 'यह भारत का रत्न सो रहा है। देशवासियों को जीवन में इनका अनुकऱण करना चाहिए।Ó गांधी ने अपने गुरु को याद करते हुए कहा- 'गोखले शीशे की तरफ साफ, एक मेमने की तरह दयालु,  एक शेर की तरह साहसी थे। और इन राजनीतिक हालात में आदर्श पुरुष थे।Ó कईं बार आम लोग गोखले को एक कमजोर नेता के रूप में देखने लगते हैं, जबकि यह सच नहीं है। पट्टाभि सीतारामैय्या के शब्दों में कहें तो, 'गोखले विरोधियों को हराने में यकीन नहीं रखते थे, वे विरोधियों को जीतने में विश्वास करते थे।

-अरुण कुमार कैहरबा
हिन्दी प्राध्यापक, स्तंभकार, लेखक, 
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