खेलों में भविष्य

खेल जगत में मात्र क्रिकेट के प्रति जनून रखने वाले भारत की पहचान अब बदल रही है। विश्व मंच पर भारतीय खिलाडिय़ों को गंभीरता से लिया जाने लगा है। इस का मुख्य कारण राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में भारतीय खिलाडिय़ों का बेहतर होता प्रदर्शन। गत दिनों भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों के बाद 2018 एशियाई खेलों में पदकों की संख्या में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके एक कदम आगे बढ़ाया है। ओलंपिक खेलों के बाद दूसरे नंबर पर आंके जाने वाले इन महाद्वीपीय खेलों में भारत ने कभी भी इतना शानदार प्रदर्शन नहीं किया था। जकार्ता और पालेमबांग से लौट रहे पदकधारियों के लिए यह उपलब्धि शानदार है और पोडियम स्थान के बढऩे से क्रिकेट के प्रति जुनूनी देश में ओलंपिक खेलों के लिए उत्साह बढ़ सकता है। खिलाडिय़ों ने देश के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया जिसमें युवा सौरभ चौधरी से लेकर 60 साल के प्रणब बर्धन तक शामिल रहे। हालांकि भारत को कबड्डी और हॉकी में उलटफेर का सामना करना पड़ा, भारत ने कुल 69 पदक अपनी झोली में डाले जिसमें 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदक शामिल रहे। वहीं चार साल पहले इंचियोन में देश ने 65 पदक जीते थे। भारत ने 1951 में शुरुआती खेलों में हासिल किए गए 15 स्वर्ण पदकों की बराबरी की। कुल मिलाकर भारत ने शीर्ष 10 में अपना स्थान कायम रखते हुए फिर से आठवां स्थान हासिल किया। हर बहु स्पर्धा वाले टूर्नामेंट में विवाद होते हैं और इस बार भी कुछ अलग नहीं रहा। हालांकि जब एक बार खेल शुरू हो जाता है तो एथलीट और उनका प्रदर्शन ही सुर्खियों में रहता है। ट्रैक एवं फील्ड स्पर्धा भारत के लिए सबसे ज्यादा पदक जुटाने वाला खेल रहा जिसमें देश ने गेलोरा बंग कर्णी स्टेडियम में 15 में से सात स्वर्ण पदक जुटाए। तेजिंदर पाल सिंह तूर ने जहां 20.75 मीटर के रेकार्ड से एथलेटिक्स में पहला पदक दिलाया तो वहीं पैरों में 12 अंगुलियों वाली स्वप्ना बर्मन ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम लिखवा लिया। दुती चंद ने भी ट्रैक पर धमाकेदार वापसी की और ट्रैक पर दो रजत पदक जीतने में सफल रहीं, जिसमें से 100 मीटर में भारत ने 20 साल में पहला पदक हासिल किया। हिमा दास को 200 मीटर में रजत पदक से संतोष करना पड़ा। नीरज चोपड़ा ने उम्मीदों के अनुरूप शानदार उपलब्धि हासिल की और वह भाला फेंक में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बन गए। धावक मंजीत सिंह और जिनसन जॉनसन ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से कुछ आंकड़ों में बदलाव किया। भारत की बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल और पीवी सिंधू ने शानदार खेल दिखाते हुए देश का व्यक्तिगत पदक जीतने का 36 साल के इंतजार को खत्म किया।

भारत का विश्व स्तर पर नाम रोशन करने वाले सभी खिलाडिय़ों को बधाई। भारत के सफल खिलाडिय़ों में अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र और साधारण परिवारों के हैं। अपनी मेहनत व लग्न के कारण ही वह अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से केंद्र सरकार के खेल मंत्रालय द्वारा खिलाडिय़ों की सुख-सुविधा व अभ्यास को लेकर विशेष प्रबंध किए गए थे। इन सबके कारण खिलाडिय़ों को मनोविज्ञानिक लाभ के साथ-साथ खेल के तकनीकी पक्ष में भी मजबूती आई। भारत सरकार ने अब 'खेलो' भारत की नीति के तहत विभिन्न खेलों के खिलाडिय़ों को चुन कर भविष्य के लिए तैयार करने की जो योजना बनाई है, उसके लिए मोदी सरकार बधाई की पात्र है। खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौर खुद ओलम्पियन  हैं, इसलिए वह योजना को सफल बनाने में विशेष प्रयास कर रहे हैं। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि भारतीय खिलाडिय़ों का भविष्य उज्ज्वल है।

तस्वीर का दूसरा पक्ष जिसे कमजोर पक्ष कहा जा सकता है वह यह है कि  विजेताओं को पुरस्कार स्वरूप जो राशि संबंधित प्रदेश सरकारें दे रही हैं उसमें इतना अंतर है कि कई विजेता खिलाड़ी को खुशी मिलने की बजाय दु:ख होने लगता है। खिलाडिय़ों को राज्यों द्वारा पुरस्कार राशि में कितना अंतर है यहां देखिये-

    राज्य    गोल्ड    सिल्वर    ब्रॉन्ज
1.     हरियाणा    3 करोड़     1.5 करोड़     75 लाख तथा सरकारी नौकरी                        
2.     गुजरात     2 करोड़    1 करोड़     50 लाख
3.    दिल्ली    1 करोड़    75 लाख    50 लाख
4.    बिहार    1 करोड़    75 लाख    50 लाख
5.    मेघालय    1 करोड़    50 लाख    25 लाख
6.    अरुणाचल    1 करोड़    75 लाख    50 लाख
7.    तमिलनाडु    50 लाख    30 लाख    20 लाख
8.    केरल    40 लाख    20 लाख    10 लाख
9.    ओडिशा    40 लाख    20 लाख    12 लाख
10.    राजस्थान    30 लाख    20 लाख    10 लाख
11.    आंध्र प्रदेश    30 लाख    20 लाख    10 लाख
12.    पंजाब    26 लाख    16 लाख    11 लाख
13.    झारखंड    12 लाख    10 लाख    7 लाख
14.    महाराष्ट्र    10 लाख    7.5 लाख    6 लाख
15.    तेलंगाना    10 लाख    7.5 लाख    5 लाख
16.    मिजोरम    8 लाख    4 लाख    2 लाख
17.    हिमाचल    1 लाख    60 हजार    40 हजार

अपने-अपने खेल में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी को जब राज्य स्तर पर मिलने वाली राशि अन्य से कम मिलती है तो उसका दिल अवश्य दुखता है। मेहनत तो उसने भी उतनी ही की होती है लेकिन मान-सम्मान में अंतर चुबता है। बेशक राज्य स्तर पर पुरस्कार राशि निर्धारित करना राज्यों का ही अधिकार है। लेकिन धन राशि में बढ़ता अंतर चिंता का प्रश्न है। केंद्र सरकार को तथा राज्य सरकारों को मिलकर पुरस्कार की धनराशि और सरकारी नौकरी इत्यादि के लिए एक ठोस नीति बनानी चाहिए जिसमें सभी पदक विजेताओं की पुरस्कार व मान-सम्मान में 10 से 25 प्रतिशत से अधिक अंतर न हो। हां अपवादवश किसी विशेष खिलाड़ी को उसकी विशेष सफलता के लिए राज्य सरकार कुछ अधिक करे, इसमें किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए।

भारत का खेलों में स्तर विशेषतया ओलम्पिक स्तर पर तभी पहुंच सकेगा, जब ग्रामीण के साथ शहरी क्षेत्र में भी खेलों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। वर्तमान में शहरी क्षेत्रों का युवा वर्ग अभी खेलों को न के बराबर ही महत्व दे रहा है, जोकि चिंता का विषय है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के युवाओं का खेलों प्रति संतुलित दृष्टिकोण ही विश्व स्तर भारत का नाम रोशन करने में सहायक होगा। राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में मिली सफलता ने एक उज्ज्वल भविष्य की आशा तो जगाई है, आशा पर ही जीवन टिका है। सो इसी आशा के साथ कि सरकार व समाज खिलाडिय़ों को उनका बनता मान-सम्मान देगा और खिलाड़ी अपनी मेहनत, लग्न और पुरुषार्थ के साथ भारत का नाम रोशन करते रहेंगे। पदक विजेताओं को बधाई और जो पदक नहीं पा सके वह भविष्य में सफल रहे, उसके लिए शुभकामनाएं।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।