वित्तमंत्री जेटली के दावे

पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के दो वर्ष पूरे होने पर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि ‘अक्सर ऐसा कहा जाता है कि वक्त सभी जख्मों को भर देता है लेकिन नोटबंदी के जख्म दिन-ब-दिन गहरे होते जा रहे हैं।’ पूर्व प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया है कि मोदी सरकार को कोई गैर परम्परावादी या लघु अवधि के आर्थिक उपाय नहीं करने चाहिए जिससे अर्थ व्यवस्था और वित्तीय बाजार में अनिश्चितता बढ़े।

गौरतलब है कि कांग्रेस सहित विपक्षी दल नोटबंदी को गलत करार देते हुए मोदी सरकार को कटघरे में खड़े कर रही है। वहीं कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में सडक़ों पर उतरकर सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार पर एक से बढक़र एक गंभीर आरोप लगा रही है।

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने फेसबुक पेज पर कर संग्रह के आंकड़ों के हवाले से दावा किया है कि कर संग्रह में 6 प्रतिशत से लेकर 9 प्रतिशत तक की बढ़ौतरी हुई है। जेटली ने ‘नोटबंदी का प्रभाव’ शीर्षक से अपना फेसबुक पोस्ट कर कहा, वर्ष 2014-15 में सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में अप्रत्यक्ष कर 4.4 फीसदी था जो जीएसटी के बाद एक फीसदी बढक़र 5.4 फीसदी हो गया है। जेटली ने कहा कि छोटे करदाताओं को 970 अरब रुपए की आयकर राहत और जीएसटी देनदारों को 800 अरब रुपए की छूट देने के बावजूद कर संग्रह में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी से अब कर प्रणाली के दायरे में आने से बच पाना मुश्किल होता जा रहा है। जेटली ने कहा कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों करों की दरों में कटौती की गई है लेकिन कर संग्रह बढ़ा है। जेटली ने दावा किया कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को औपचारिक स्वरूप मिला और कर आधार भी बढ़ा। इसके चलते सरकार गरीबों के कल्याण एवं ढांचागत विकास के लिए अधिक संसाधनों का आवंटन कर पाई। 31 मार्च को समाप्त वित्त वर्ष में 6.86 करोड़ कर रिटर्न जमा किए गए जो वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 25 फीसदी अधिक है। चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में 5.99 करोड़ रिटर्न जमा किए जा चुके हैं जो गत वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 54.33 फीसदी अधिक है। रिटर्न भरने वालों में 86.3 लाख लोग पहली बार शामिल हुए हैं। जेटली ने उम्मीद जताई कि पांच साल का कार्यकाल पूरा होने तक कराधान दोगुना हो जाएगा। नोटबंदी और जीएसटी ने नकद लेनदेन पर बड़ी चोट की है। डिजिटल लेनदेन में तेजी प्रत्यक्ष है। 64 लाख करदाताओं का दायरा जीएसटी के बाद बढक़र 1.2 करोड़ हो गया है। अब वस्तुओं और सेवाओं की दर्ज होती वास्तविक खपत कर दायरे में बढ़ौतरी का संकेत करती है। इससे अप्रत्यक्ष करों की वृद्धि तेज हुई है जिससे केंद्र और राज्यों दोनों को लाभ हुआ है। जीएसटी के बाद प्रत्येक राज्य को करों में सालाना 14 प्रतिशत की अनिवार्य बढ़ोतरी मिल रही है। वर्ष 2014-15 में जीडीपी के अनुपात में अप्रत्यक्ष करों का हिस्सा 4.4 प्रतिशत था जो जीएसटी के बाद एक प्रतिशत बढक़र 5.4 फीसद हो गया। यहां तक कि छोटे करदाताओं को 97,000 करोड़ रुपये सालाना और जीएसटी में भी 80,000 करोड़ रुपये की राहत देने के बावजूद कर संग्रह में तेजी आई है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों करों में कटौती हुई है, लेकिन कर संग्रह में बढ़ोतरी हुई है। जीएसटी की शुरुआत के समय से जिन 334 वस्तुओं पर 31 फीसद कर की दर प्रभावी थी, उन पर दर घटाई जा चुकी है। सरकार ने इन संसाधनों का उपयोग बेहतर बुनियादी ढांचा निर्माण, सामाजिक क्षेत्र और ग्रामीण भारत के ऊपर किया है। इसके अभाव में हम गांवों को सडक़ों से और हर घर तक बिजली कैसे पहुंचा सकते हैं? ग्रामीण स्वच्छता का दायरा 92 प्रतिशत तक पहुंच गया है और एक सफल आवासीय योजना के साथ ही आठ करोड़ गरीब घरों में रसोई गैस पहुंचाई जा चुकी है। दस करोड़ परिवार आयुष्मान भारत के दायरे में हैं। खाद्य सब्सिडी पर 1,62,000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। एमएसपी में 50 प्रतिशत की बढ़ौतरी और एक सफल फसल बीमा योजना लागू की गई है। यह अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने का ही प्रभाव है कि 13 करोड़ उद्यमियों को मुद्रा ऋण मिल रहे हैं। हफ्तों के भीतर ही सातवां वेतन आयोग लागू कर दिया गया और वन रैंक-वन पेंशन की भी अर्से से चली आ रही मांग भी पूरी हो गई। अर्थव्यवस्था के अधिक औपचारिक होने का अर्थ है कि राजस्व बढ़ेगा जिससे गरीबों के लिए संसाधन बढ़ेंगे, बुनियादी ढांचा बेहतर होगा और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होगा।

धरातल पर स्थिति यह है कि नोटबंदी के कारण सबसे अधिक प्रभाव सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों पर ही पड़ा था इनमें से अधिकतर अभी तक सामान्य स्थिति में नहीं आ पाए जबकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई है और अब भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गई है तथा आशा की जाती है कि यह रुझान भविष्य में भी बना रहेगा।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि नोटबंदी और जीएसटी को लेकर जो दावे वित्तमंत्री अरुण जेटली कर रहे हैं उनमें दम तो है लेकिन प्रश्न तो लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों को बचाने और जन साधारण को राहत देने का है। सरकार को इन दोनों वर्गों को राहत देने के लिए आत्मचिंतन कर नीति की कर्मचारियों को दूर कर जन साधारण को राहत देने हेतु ठोस कदम उठाने चाहिए।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।