कांग्रेस का चेहरा

राहुल गांधी के कांग्रेसी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की पहली कार्य समिति की बैठक के बाद पत्रकार वार्ता में कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत और मीडिया प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कोई शक नहीं कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव में जा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष ही घटक दलों और संभावित नए साथी दलों से वार्ता करेंगे। कांग्रेस ने हालांकि राहुल को सीधे तौर पर प्रधानमंत्री उम्मीवार के रूप में पेश नहीं किया। ऐसा विपक्षी गठबंधन में नेतृत्व को लेकर खटास जैसी नौबत अभी न आने देने के मकसद से किया गया है। पूछने पर सुरजेवाला ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि जब कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगी तो राहुल ही हमारा चेहरा होंगे। उन्होंने कहा कि 2004 में भी सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी का चेहरा थीं और जनता ने उस पर फैसला दिया था। इसके बाद सोनिया और पार्टी ने मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का निर्णय लिया। बैठक में राहुल गांधी ने कांग्रेसजनों को आह्वान किया कि वे भारत के दबे-कुचले लोगों की लड़ाई लड़ें। राहुल गांधी ने कहा कि नवगठित सीडब्ल्यूसी अनुभव और जोश के समावेश वाली इकाई है। कांग्रेस अध्यक्ष ने भारत की आवाज के तौर पर कांग्रेस की भूमिका तथा वर्तमान एवं भविष्य की इसकी जिम्मेदारी के बारे में भी याद दिलाया और आरोप लगाया कि भाजपा संस्थाओं दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों अल्पसंख्यकों और गरीबों पर हमले कर रही है। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी को गैर भाजपा गठबंधन का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पेश किया जाने के एक दिन बाद अन्य दलों के बयान भी आये हैं। जेडीएस प्रमुख व पूर्व पीएम एचडी देवेगौड़ा ने कहा कि उनकी पार्टी को कोई आपत्ति नहीं है। वह इसके लिए पूरी तरह तैयार है। वहीं, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं है। राहुल गांधी समेत ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, शरद यादव और मायावती, सब शामिल है। विपक्ष इनमें से जिसे भी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करता है, वह उन्हें मंजूर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस विपक्षी दलों में सबसे बड़ी पार्टी है और सबको एकजुट करने की जिम्मेवारी राहुल गांधी पर है।

राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में मोदी सरकार व विशेषतया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विरुद्ध दिखाये तेवर से ही स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का भावी लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ही नेता होगा। राहुल गांधी ने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया है जिसके खून में ही भारतीय राजनीति है। लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी आज भी जन साधारण के नेता नहीं बन सके, क्योंकि जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे तब राहुल गांधी ने पर्दे के पीछे रहकर ही राजनीतिक गोटियां फैंकने में अपनी बेहतरी समझी। परिणामस्वरूप राहुल गांधी धरातल की राजनीति को समझने में अभी भी कठिनाई महसूस कर रहे हैं।

कांग्रेस जिन राजनीतिक दलों से गठबंधन करने का प्रयास कर रही है उन दलों के नेता ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, नवीन पटनायक और ऐस कई नेता हैं जो राहुल गांधी से अधिक राजनीतिक अनुभव रखते हैं। इसलिए राहुल गांधी के नीचे कार्य करना उनके लिए मुश्किल ही होगा। धरातल का अनुभव न होने का ही परिणाम है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते-साधते भारत की छवि को बिगाड़ते दिखाई दे रहे हैं। अलवर में भीड़ द्वारा गौ रक्षा के नाम पर हत्या पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि ‘न्यू इंडिया’ में मानवता की जगह नफरत ने ले ली है। गांधी अनुसार यह मोदी का बर्बर ‘न्यू इंडिया’ है, जहां लोगों को कुचला जा रहा है और मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है।

राहुल गांधी का उपरोक्त ब्यान ही उनके लिए राजनीतिक कठिनाइयां बढ़ाने वाला है। लोकसभा में अपने भाषण के बाद प्रधानमंत्री से जाकर गले मिलना और वापस अपनी जगह पर बैठने के बाद अपने सहयोगी को आंख मारना इत्यादि घटनाएं दर्शाती हैं कि धरातल स्तर पर राहुल गांधी का अनुभव कम है और यही उनके लिए सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को पार करने के बाद ही वह अपने सहयोगी दलों के वरिष्ठ नेताओं से राजनीतिक तौर पर ऊंचा उठने पर ही नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे सकने की स्थिति में होंगे।

कांग्रेस के चेहरे के रूप में राहुल गांधी आज स्थापित हो चुके हैं इसमें कोई दो राय नहीं है।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।