मतभेदों की अभिव्यक्ति

आजकल उत्तर प्रदेश की हिन्दू महासभा की एक स्थानीय इकाई की प्रधान व उनका पति इसलिए चर्चा में है कि दम्पत्ति ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोस्टर पर गोलियां चलाई और उनके हत्यारे नत्थुराम गोडसे के समर्थन में नारे भी लगाए और उसके चित्र पर फूल मालाएं भी डाली। हिन्दू महासभा इकाई के इन सदस्यों का मानना है कि भारत विभाजन के लिए गांधी जिम्मेवार थे और गोडसे ने जो किया वह उचित ही किया था।

भारत विभाजन के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेवार ठहराना ही सबसे बड़ी गलती है। भारत विभाजन तो अंग्रेजी हुकूमत की एक सोची समझी योजना थी जिसमें हिन्दू, मुस्लिम सहित विभिन्न धर्मों और समुदायों के तत्कालीन नेताओं ने अपना-अपना योगदान जाने व अनजाने में डाला। लोगों की भावनाओं को उभारकर अतीत में सत्ता को संभालने का प्रयास अंग्रेजी हुकूमत ने किया था और आज जब देश ने आजाद हो एक लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई है उसमें भी सत्ता प्राप्ति के लिए वही खेल तो चल रहा है जो अंग्रेजी हुकूमत ने शुरू किया था।

लोकतंत्र के विचारों में मतभेद होना तो उसकी शक्ति है। लेकिन जब हम अपने मतभेदों की अभिव्यक्ति हिंसा के माध्यम से करते हैं तो वह लोकतंत्र की कमजोरी बन जाती है। लोकहित को लेकर महात्मा गांधी ने कहा था 'मेरी दृष्टि में हमारे मार्ग में जितनी बड़ी बाधा सरकारी हिंसा है, उतनी ही बड़ी बाधा लोक-हिंसा भी है। बल्कि सच पूछा जाए तो मैं लोक-हिंसा की तुलना में सरकारी हिंसा का सामना ज्यादा कामयाबी के साथ कर सकता हूं। क्योंकि लोक-हिंसा का सामना करते समय मुझे उतना समर्थन प्राप्त नहीं होगा जितना सरकारी हिंसा का सामना करते समय होगा। मैं दृढ़तापूर्वक यह कहना चाहता हूं कि हिंसा का रास्ता किसी धर्म में निहित नहीं है। जहां अधिकांश धर्मों में अहिंसा का व्यवहार मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य माना गया है, वहीं कुछ धर्मों में खास परिस्थितियों में इसकी इजाजत भर दी गई है। लेकिन मैंने भारत के सामने अहिंसा का अंतिम स्वरूप स्पष्ट नहीं किया है। मुझे हिंसा से आपत्ति इसलिए है कि जब यह प्रतीत होता है कि इससे भलाई हो रही है तो वह भलाई केवल अस्थायी होती है, पर इससे जो बुराई फैलती है, वह स्थायी होती है।'

30 जनवरी, 1999 को महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर राष्ट्र को संबोधन करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हमारे जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में लोगों के आपसी विचारों में भिन्नता हो सकती है, और है भी, किंतु मतभेदों को अभिव्यक्त करने के लिए हिंसा कोई रास्ता नहीं है, बल्कि बातचीत ही इसका रास्ता है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, गांधीजी अत्यधिक धार्मिक थे। उनके लिए आस्था का प्रश्न जीवन और मरण का प्रश्न था। उन्होंने सभी धर्मों के धर्मग्रंथों का गूढ़ अध्ययन किया था। वे विभिन्न धर्म गुरुओं के साथ नियमित रूप से बातचीत करते रहते थे। वे अकसर एक-दूसरे के विचारों से असहमत भी होते थे, लेकिन फिर भी, उनके व्यक्तिगत संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। दूसरे के विचारों को आदर के साथ सुना जाता था, प्रश्न पूछे जाते थे और उनके स्पष्टीकरण दिए जाते थे। इस पुण्यतिथि पर महात्माजी के सत्य और प्रेम के संदेश और उनके द्वारा अपनाई गई पद्धति को हमें याद रखना होगा। एक ऐसा रास्ता अपनाना होगा जिसमें न तो हिंसा के लिए स्थान हो और न ही असंस्कार के लिए। मतभेदों को बातचीत और सार्वजनिक चर्चा के जरिए दूर किया जाना चाहिए। मतभेदों को दूर करने का यही एकमात्र सभ्य तरीका है।

महात्मा गांधी के विचारों से मतभेद रखने वाले आज भी लाखों की तादाद में होंगे लेकिन राष्ट्रपिता के प्रति अपना विरोध एक मर्यादा में रहकर और अहिंसात्मक ढंग से आज भी कर रहे हैं। आजादी के दौरान महात्मा गांधी ने जो भूमिका निभाई उसे कोई भी नहीं भूल सकता। गांधी हमारे इतिहास का अटूट अंग था और आज आजाद हिन्दोस्तान के लिए वह प्रेरणास्रोत है। विचारों का मतभेद होने का यह अर्थ नहीं कि आप हिंसा पर उतारू हो जाएं या कर्म ऐसा न करें जिसे सभ्य समाज अमर्यादित मानता हो।

गांधी जी के बुतों को तोडऩा या पोस्टरों पर गोली चलाना एक अलोकतांत्रिक कदम है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम है। मतभेदों की अभिव्यक्ति का लोकतंत्र में एक ही तरीका है और वह संवाद! 

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।