पाकिस्तान में चुनाव

पाकिस्तान में आम चुनाव में हिंसा की आशंका को देखते हुए 4 लाख के करीब सैनिकों को तैनात किया गया लेकिन लेख लिखने तक क्वेटा में हुए बम धमाके में 31 लोगों की मौत और 30 के घायल होने का समाचार आ चुका है। मतदान समाप्ति तक स्थिति क्या रहती है उस बारे अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। इससे पहले इसी माह 13 जुलाई, 2018 को मस्तांग में बलूचिस्तान अवामी पार्टी के जलसे में सबसे भयानक आत्मघाती विस्फोट हुआ था, जिसमें राजनेता नवाबज़ादा सिराज़ रायसानी समेत 128 लोग मारे गये थे। विस्फोट में घायलों की संख्या 200 पार कर गई थी। इस कांड की जि़म्मेदारी आइसिस ने ली है। इससे ठीक तीन दिन पहले पेशावर में टीटीपी के दहशतगर्दों ने अवामी नेशनल पार्टी के नेता हारून बिल्लौर समेत 19 लोगों को मानव बम से उड़ा दिया था। 22 जुलाई को डेरा इस्माइल ख़ान में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के प्रत्याशी इकरामुल्लाह गंदापुर विस्फोट में मारे जा चुके हैं। दो हफ्तों के दरम्यान ऐसी बड़ी घटनाओं को यह बताने के लिए अंजाम दिया गया ताकि मतदाता डरकर आतंकियों की मर्जी के उम्मीदवार जितायें, या फिऱ वोट न करें। ‘नेशनल काउंटर टेररिजम अथॉरिटी’ ने 65 नेताओं को सचेत किया है कि वे चुनावी सभाओं में सतर्क रहें क्योंकि वे आतंकियों के निशाने पर हैं। इस बार दस करोड़ 59 लाख 60 हज़ार मतदाताओं को वोट देना है। इनमें 4 करोड़ 63 लाख महिलाएं हैं। पाकिस्तान में 81 लाख नये वोटर शामिल किये गये हैं। पंजाब में सबसे अधिक 6 करोड़ 67 लाख वोटर हैं। खैबर पख्तूनख्वा (1 करोड़ 53 लाख 20 हज़ार), सिंध (1 करोड़ 24 लाख 44 हज़ार) और बलूचिस्तान (43 लाख) के बाद फाटा में सबसे कम 26 लाख मतदाता हैं। माहौल 2013 के आम चुनाव में उतना खऱाब नहीं था, तभी 8 करोड़ 61 लाख 90 हज़ार लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया था। देखें, इस दफा कितने लोग बूथ तक जाने की हिम्मत कर पाते हैं।

चुनावों से पहले यही अंदाजा लगाया जाता था कि चुनाव त्रिकोणीय होंगे लेकिन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सीमित आधार को देखते हुए मुख्य मुकाबला नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग और इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ के बीच ही होता दिखाई दे रहा है। इरमान खान को पाकिस्तान सेना का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वहां के समाचार पत्र तो यह ही घोषणा कर रहे हैं कि पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री बनने की सबसे अधिक संभावना क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की है।

संसद की 272 सीटों पर प्रत्यक्ष निर्वाचन होना है। 342 सीटों वाली नेशनल असेंबली में सबसे अधिक राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा पंजाब ही है। पंजाब में 141, सिंध में 61, खैबर पख्तूनख्वा में 39, बलूचिस्तान में 16 फाटा में 12 सीटे नेशनल असेम्बली की है। दिल्ली की तरह ही इस्लामाबाद भी कैपिटल टेरटरी है जिसमें तीन सीटें है। 60 सीटें महिलाओं के लिए और 10 सीटे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं। 70 सीटों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर उम्मीदवार चुने जाएंगे।

चुनाव में जीत किसकी होगी यह तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता चलेगा लेकिन एक बात स्पष्ट है कि चुनाव प्रचार के दौरान भारत ही मुख्य केंद्र का मुद्दा रहा है और चुनाव परिणाम के बाद भी भारत ही मुख्य मुद्दा रहेगा। पाकिस्तान का अस्तित्व ही आज भारत विरोध पर टिका है। पाकिस्तानी फौज का लक्ष्य पाक में लोकतंत्र को एक सीमा से आगे न बढऩे देना ही है। इस लक्ष्य की प्राप्ति को ले पाकिस्तानी फौज भारत का भय दिखा वहां की राजनीति में दखल देती रही है और देती रहेगी। इस बार आतंकी संगठनों ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं और वह बेखौफ होकर अपना प्रचार भी कर रहे हैं तथा भारत को निशाना भी बना रहे हैं।

3459 प्रत्याशी नेशनल असैम्बली के लिए और 8396 उम्मीदवार विधानसभाओं के लिए चुनाव मैदान में उतरे हैं और 10 करोड़ 596 मतदाता इनके भाग्य का फैसला करेंगे। पाकिस्तान के समाचार पत्र डॉन ने अपने सम्पादकीय में कहा है कि कांटे की टक्कर में इमरान बढ़त में है। जबकि इमरान खान ने चुनाव प्रचार में भारत के खिलाफ जहर उगला है और सेना का परोक्ष साथ भी उन्हें मिल रहा है, इसलिए यदि इमरान सरकार बनाते हैं तो उनके साथ भारत से अच्छे रिश्तों की उम्मीद बेकार साबित होगी। क्रिकेट से राजनीति में आए इमरान कई अवसरों पर जेहादियों से वार्ता शुरू करने और कट्टरपंथियों को मुख्य धारा में लाने की पैरवी कर चुके हैं। इस कारण उनके विरोधी उन्हें तालिबान खान तक के नाम से पुकारते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन और बिलावल भुट्टो के नेतृत्व वाली पार्टी पीपीपी की पूर्ववर्ती सरकारें भारत के साथ शांतिपूर्ण रिश्तों की पक्षधर रही है। इसलिए इनमें से कोई भी पार्टी यदि सत्ता में आती है तो भारत के साथ रिश्ते सुधरने की दिशा में वार्ता चलते रहने की उम्मीद की जा सकती है।

पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो भारत की यही इच्छा है क्योंकि एक लोकतांत्रिक सरकार ही भारत के साथ रिश्ते सुधारने की पहल कर सकती है। फौजी शासन और उसकी कठपुतली सरकारें तो लोकतंत्र की मजबूती की राह में बाधा ही मानी जाएंगी। पाकिस्तान तथा उसके लोगों का भविष्य कैसा होगा इस पर तो चुनाव परिणामों के आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।