अहंकार और विवेक

पंजाब में मंत्रिमंडल की बैठक दौरान मुख्यमंत्री की मौजूदगी में मुख्य सचिव द्वारा वित्त मंत्री से माफी मांगने के बाद पिछले कुछ दिनों से चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया। वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई तीन बार माफी मांगे और माफ न करे तो यह उचित नहीं होगा। क्षमा को लेकर महाभारत में कहा गया है कि ‘क्षमा ही मनुष्य का धर्म है।’ शेख सदी ने कहा है कि ‘जो तेरे सामने झुकता है उसके सामने तू भी झुक जा।’

पंजाब में जिस तरह मुख्य सचिव व वित्त मंत्री के बीच विचारों के मतभेद के कारण विवाद उठा उसी तरह हरियाणा, हिमाचल प्रदेश सहित देश के अन्य प्रदेशों में राजनीतिज्ञों और अधिकारियों के बीच विवाद व टकराव के समाचार आये दिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिलते हैं। यह सिलसिला अतीत से चला आ रहा है। सत्य यही है कि जहां दो व्यक्ति कार्य करेंगे वहां विचारों के कारण विवाद या टकराव की संभावना हमेशा बनी रहेगी। स्थिति को सामान्य करने के लिए एक को तो झुकना पड़ेगा। जो झुकता है उस पर प्रश्न चिन्ह भी लगते हैं लेकिन जीवन का कटु सत्य यह भी है कि जो जितना आगे बढ़ता है उसकी कठिनाईयां भी उतनी बढ़ती है और अपने इन्हीं अनुभवों से आदमी का चरित्र भी बनता है।

गहराई से सोचें तो यह सारा विश्व दो बातों से ही संचालित होता दिखाई दे रहा है। एक अहंकार और दूसरा विवेक से। इंसान जो कुछ भी कर रहा है वह इन दो स्रोतों से ही प्रभावित है। अहंकार शरीर का प्रतिनिधित्व करता है और विवेक आत्म-तत्व का। जब इंसान अहंकार के प्रभाव में होता है तो फिर विवाद और टकराव वाली स्थिति पैदा होती है और जब व्यक्ति विवेक से कार्य लेता है तो स्थिति सामान्य हो जाती है। अहंकार और विवेक दोनों इंसान के अंदर ही हैं जबकि दोनों तत्वों के उद्देश्य एक-दूसरे के विपरीत हैं। जहां अहंकार बढ़ता है वहां विवेक पृष्ठ भूमि में चला जाता है। जहां विवेक बढ़ता वहां अहंकार पृष्ठ भूमि में चला जाता है। इन दोनों में संतुलन बनाकर चलना ही सबसे कठिन कार्य है। शरीर के उद्देश्य, अर्थात् भौतिक समृद्धियों की प्राप्ति का मूल प्रेरणास्रोत अहंकार ही होता है। इस अहंकार की प्रकृति परमात्मा ने ऐसी बनाई है कि यह स्वयं अपना पोषक बने। अंत: इसके पोषण के लिए किसी भी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता ही न रहे। अपने अभीष्ट को प्राप्त करने पर सदा असंतुष्ट बने रहना इसकी मौलिक प्रकृति है। अत: एक बार भौतिक समृद्धियों के बटोरने के मार्ग पर लगने पर एक ओर यह अहंकार मनुष्य से अथक प्रयास करवाता रहता है, तो दूसरी ओर समृद्धियां प्राप्त होने पर यह स्वयं अधिकाधिक बढ़ता भी जाता है। इस अन्तहीन चक्र में फिर किस उत्कृष्ट स्तर की समृद्धियां अर्जित हो जायें, न तो इसकी सीमा रहती है, और न अहंकार के बढऩे की सीमा। इस तरह यह अहंकार सीमाहीन स्तरों तक बढऩे के लिए समर्थ बनाया गया। जब अहंकार बढ़ता है तो विवेक उसी अनुपात में घटता है। अत: जब अहंकार एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तो विवेक इतना घट जाता है कि फिर उस व्यक्ति को विवेक द्वारा उठाई गई, ‘आत्म-तत्व’ के उद्देश्य का स्मरण दिलाने वाली आवा•ा विष समान लगती है और वह अनसुनी रह जाती है। जीवन की समाप्ति तक फिर वह व्यक्ति केवल भौतिक समृद्धियां ही बटोरते रहने में लगा रह जाता है। इस तरह वह जीवन के दूसरे और श्रेष्ठ, ‘आत्म-तत्व’ के उद्देश्य की प्राप्ति में नितान्त असफल रह जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्म-तत्व के उद्देश्य की प्राप्ति में व्यवधान का मूल कारण है अहंकार का अनियंत्रित होकर अपने वांछित स्तर से अधिक बढ़ जाना। यदि किसी प्रकार इस अहंकार को नियंत्रित रखने में मनुष्य सफल हो जाए तो वह अपने जीवन के दूसरे मौलिक उद्देश्य को कभी विस्मृत नहीं कर सकता। विडम्बना यह है कि मायाजाल में फंसा मानव दो क्षण के लिए भी अपने पास नहीं बैठ पा रहा। यदि कभी सोचने भी बैठा तो अपने अन्त:करण में उलझनें ही उलझनें पाता है। वह नहीं पहचान पाता कि वह स्वयं तो एक है, परन्तु उसके अन्दर व्याप्त यह दो-दो सत्ताएं कैसी बनी हुई है जिनसे जीवन के प्रत्येक मोड़ पर, प्रत्येक परिस्थिति में दो परस्पर विपरीत आवा•ों आती हैं? क्यों आती हैं? अपने ही अन्दर एक दूसरे के हनन पर आमादा उन दो शक्तियों के बीच फंसा मानव अपने अन्दर ही अन्दर बनने वाले तनावों के जाल में फंसता सा चला जाता है और तब वह केवल एक ही उधेड़बुन में लग पड़ता है, कैसे भी इन तनावों से उसे मुक्ति मिले, किसी भी कीमत पर उसे शान्ति मिले। वह यह न जान पाया कि विवेक की प्यास जिन तत्वों के लिए है, वे अहंकार के लिए विष समान हैं, और अहंकार की प्यास जिन तत्वों के लिए तरसती है, वे ‘विवेक’ को विष से लगते हैं। उसे यह न याद रहा कि इन दोनों तत्वों के उद्देश्य भले ही एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हों, पर मानव का जीवन पूर्णतया सार्थक बनाने के लिए, इनमें से किसी एक के नहीं, अपितु, दोनों ही के उद्देश्यों की पूर्ति पूर्णता से करना जीवन की अनिवार्यता है।

उसी इंसान का जीवन सफल होता है जो अपने अहंकार पर नियंत्रण पाकर अपने विवेक से कार्य करता है। जब अहंकार नियंत्रण में होता है तो इंसान विनम्रता के साथ अपना कार्य करता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जाता है। सत्य, संयम, शील और विनम्रता विवेकी पुरुष के ही गुण हैं। क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों अहंकार रहित विवेकी पुरुष के गुण हैं। साधारण इंसान की दृष्टि में यह हार-जीत का मामला हो सकता है।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।