भारतीय राजनीति में वंशवाद

कांग्रेस पार्टी का केन्द्र बिन्दु आज गांधी परिवार ही है। नेहरु के बाद इंदिरा फिर राजीव, सोनिया और अब राहुल और प्रियंका। कांग्रेस के युवा और बुजुर्ग नेता सभी के लिए सोनिया, राहुल ही प्रेरणा स्त्रोत कहे जा सकते हैं। करीब 5 दशक से अधिक सत्ता में रही। कांग्रेस और सत्ता व संगठन का केन्द्र बिन्दु नेहरु गांधी परिवार ही है। इसके ठीक विपरीत भाजपा जो अतीत में जनसंघ के नाम से जानी जाती थी वहां वंशवाद के बीज के अंकुर को फूटने का अवसर ही नहीं दिया गया। जनसंघ के समय में भी और भाजपा में भी संगठन और सत्ता के प्रमुख अवश्य केन्द्र बिन्दु रहे हैं। आज अगर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी केन्द्र बिन्दु है तो उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी केन्द्र बिन्दु रहे हैं। इनसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की जोड़ी ने संघर्ष के दौर का सामना किया था।

वामपंथी दलों में भी वंशवाद को जगह नहीं मिली। क्षेत्रीय दलों में समय के साथ-साथ वंशवाद पनपता चला गया। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में वंशवाद देखने को मिलता है। क्षेत्रीय स्तर पर अकाली दल बादल, इनेलो, राजद, समाजवादी पार्टी में वंशवाद फलता-फूलता दिखाई दे रहा है। इसी तरह दक्षिण में भी क्षेत्रीय दलों में वंशवाद देखने को मिलता है। उत्तर प्रदेश, बिहार में समाजवादी पार्टी, राजद और बसपा में जो गठबंधन हुआ है वह वंशवाद और जातिवाद आधारित राजनीति को बढ़ावा देने वाला ही कहा जा सकता है। कांग्रेस भी क्षेत्रीय स्तर पर उन्हीं राजनीतिक दलों के साथ समझौता कर रही है या प्रयास में है जो वंशवाद और जातिवाद की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। लोकसभा चुनावों की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आ रही ही है वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मियां भी बढ़ती जा रही हैं। राजनीतिक माहौल के गर्माने के साथ ही वंशवाद-जातिवाद और क्षेत्रवाद पर आधारित मुद्दे उठाए जाने लगे हैं। विकास, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दे जो जनसाधारण के साथ सीधे-सीधे जुड़े हैं वह सिद्धांतों पर न होकर वंशों तथा जातियों  पर आधारित अधिक है। इसी कारण अब देश में चर्चा का विषय भारतीय राजनीति में वंशवाद बन गया है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डा. राममनोहर लोहिया की जयंती पर लिखा - डॉ. लोहिया वंशवादी राजनीति को हमेशा लोकतंत्र के लिए घातक मानते थे। यदि वह जिंदा होते तो हैरान होते कि उनके 'अनुयायियोंÓ के लिए परिवार हित देशहित से ऊपर हैं। उनका मानना था कि जो व्यक्ति समता, समानता और समत्व भाव से काम करता है वह योगी है। दुख की बात यह है कि स्वयं को लोहियावादी कहने वाली पार्टियों ने इस सिद्धांत को भुला दिया है। इनको सत्ता हथियाकर जनता की धन संपत्ति लूटने में महारथ हासिल है। जिस गैर-कांग्रेसवाद के लिए लोहिया जीवनभर लड़ते रहे, उसी कांग्रेस के साथ सपा ने महामिलावटी गठबंधन कर लिया। समाजवादी दलों पर टिप्पणी करते हुए पीएम ने कहा, देश के 130 करोड़ नागरिकों के सामने यह सवाल है कि जिन लोगों ने डॉ. लोहिया से विश्वासघात किया, उनसे हम देशसेवा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? ऐसे लोग हमेशा की तरह आगे भी देश से छल करते रहेंगे। पीएम ने राजद को आड़े हाथों लिया और कहा, राजनीति में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम हो रहे हैं। अगर इस समय डॉ. लोहिया होते तो विचलित और व्यथित हो जाते। क्योंकि उन्हें आदर्श मानने वाले दलों ने उनके सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी। मोदी ने, वरिष्ठ समाजवादी नेता सुरेंद्रनाथ द्विवेदी की टिप्पणी का जिक्र करते हुए लिखा, डॉ. लोहिया जितनी बार अंग्रेजों की हुकूमत में जेल गए, उससे कहीं अधिक बार उन्हें कांग्रेस की सरकार में जेल जाना पड़ा था।

इससे पूर्व प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित भाजपा नेता कांग्रेस को गांधी परिवार को अपना सर्वे-सर्वा मानने के लिए कटघरे में खड़े करते आ रहे हैं। 

भाजपा द्वारा जारी उम्मीदवारों की सूची में गुजरात से लालकृष्ण आडवाणी और हिमाचल प्रदेश से शांता कुमार को लोकसभा की टिकट न देने के कारण काफी चर्चा है। कई तरह की अटकलें लग रही हैं लेकिन एक बात स्पष्ट है कि दोनों नेताओं ने अपनी टिकट कटने के बाद भी अपने किसी परिवार के सदस्य के लिए टिकट नहीं मांगी। लालकृष्ण आडवाणी और शांता कुमार दोनों अगर भाजपा नेतृत्व से अपने-अपने परिवार के सदस्य के लिए टिकट सार्वजनिक रूप से मांग लेते तो शायद भाजपा नेतृत्व के लिए न करना मुश्किल होता। आडवाणी और शांता कुमार का परिवारिक सदस्यों के लिए टिकट न मांगना दर्शाता है कि दोनों नेता राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने के विरुद्ध हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, उड़ीसा सहित कई राज्यों में बंटा वंशवाद पर आधारित राजनीति का आधार एक सीमा के बाद कमजोर होने लगा है। ऐसी स्थिति का राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सामना कर रही है। इससे राजनीतिक दलों और नेताओं को समझ लेना चाहिए कि भारतीय राजनीति में वंशवाद के दौर की उलटी गिनती शुरू हो गई है। राजनीतिक दल और नेता जितनी जल्दी बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को समझकर वंशवाद को घेरे को तोड़ बाहर आएंगे उतना ही अधिक उनको लाभ मिलेगा।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।