क्या आप जानते हैं कि मुफ्त में नहीं मिला था देश को 'Sunday Weekly Off', इसके लिए बहाया गया था खून-पसीना 

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): एक समय था, जब हफ्ता सोमवार से शुरू नहीं होता था और रविवार पर खत्म भी नहीं जी हां, आप हफ्ते की शुरुआत या अंत कहीं से भी कहीं पर भी मान सकते थे क्योंकि कामगारों और कामकाजी लोगों को हर दिन काम करना होता था। कोई साप्ताहिक छुट्टी  नहीं होती थी, लेकिन अब मौजूदा हालात में हफ्ते में रविवार की छुट्टी तो सबसे कॉमन बात है ही, कई जगह तो अब वर्किंग वीक भी 5 दिनों का ही रह गया है। क्या आपने कभी सोचा है कि संडे की छुट्टी भारत में कबसे और क्यों मिलना शुरू हुई?

खून पसीना बहाया गया, मुफ्त में नहीं मिला था देश को 'संडे का वीकली ऑफ'

क्या आपने कभी ये भी सोचा है कि इस छुट्टी दिलाने के पीछे कितना बड़ा संघर्ष हुआ और किस शख्सियत की वजह से ये मुमकिन हुआ होगा? ब्रिटिश राज के वक्त की 130 साल पुरानी कहानी आपको इसलिए भी जाननी चाहिए क्योंकि संडे की छुट्टी की शुरुआत आराम, मौज मस्ती या फिल्म देखने के लिए नहीं हुई थी बल्कि यह भारत की मज़दूर क्रांति का एक ज़रूरी अध्याय है।

अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी के वर्चस्व से पहले खेती आधारित देश भारत में ज़्यादातर किसान और कृषि श्रमिक काम करते थे। नियमित या साप्ताहिक अवकाश जैसा कोई चलन नहीं था, ज़रूरत के मुताबिक छुट्टी मिल जाती थी। जब अंग्रेज़ों ने मिलों और कारखानों की स्थापनाएं कीं, तो भारतीय गरीबों का ही शोषण शुरू हुआ। यह व्यवस्था जल्द ही इतनी क्रूर हुई कि बगैर नियम कायदों के खून चूसने की हद तक लोगों से काम लिया जाता था। 

Narayan Lokhande fight for Sunday weekly off 128 years to Sunday holiday |  | Loksatta

फिर मज़दूरों के लिए दो शिफ्टों की व्यवस्था शुरू हुई थी। काम के बीच में मज़ूदरों को भोजन व शौच तक के लिए समय नहीं दिया जाता था। दूसरी तरफ, भारत में चर्च बन चुके थे और तमाम ईसाई यानि अंग्रेज़ रविवार को प्रार्थना के लिए चर्च में जाया करते थे और इसमें करीब उनका आधा दिन  कट जाता था, लेकिन गरीब मज़ूदरों के लिए आधे मिनट तक की छुट्टी मुहाल थी। बूढ़े, बच्चे और गर्भवती महिलाएं तक, सबको एक ही डंडे से हांक दिया जाता था।

बॉम्बे टेक्सटाइल मिल में बतौर स्टोर कीपर तैनात नारायण मेघाजी लोखंडे ने मज़दूरों की तकलीफ को बहुत करीब और संवेदना के साथ महसूस किया। मज़दूरों के लिए कोई सुविधा नहीं थी, अवकाश छोड़िए, स्वास्थ्य, ठीक वेतन, भोजन तक जैसे मूलभूत मानव ​अधिकार तक मज़दूरों को मुहैया नहीं थे। अंग्रेज़ों तक बात पहुंचाने के लिए 1880 में लोखंडे ने पहले 'दीन बंधु' नाम से एक अखबार निकाला और उसमें मज़दूरों की परेशानियों व अधिकारों की बातें लिखीं।

'बॉम्बे हैंड्स एसोसिएशन' के ज़रिये लोखंडे ने 1881 में पहली बार कारखाने संबंधी अधिनियम में बदलावों की मांग रखी। जब उनकी मांगें सिरे से खारिज की गईं, तब एक संघर्ष शुरू हुआ। 1884 में लोखंडे इस एसोसिएशन के प्रमुख भी बने और मज़ूदरों के ​अधिकारों के लिए संघर्ष आगे चलता रहा और गति पकड़ता रहा। श्रमिक सभा में साप्ताहिक अवकाश की मांग उठाने के बाद मज़दूरों की मांगों का एक पूरा प्रस्ताव तैयार किया गया और इसमें ये तमाम मांगें शामिल थीं।

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- मजदूरों के लिए रविवार के अवकाश हो।
- भोजन करने के लिए काम के बीच में समय मिले।
- काम के घंटे यानी शिफ्ट का एक समय निश्चित हो।
- काम के समय दुर्घटना की स्थिति में कामगार को वेतन के साथ छुट्टी मिले।
- दुर्घटना में मज़दूर की मौत की स्थिति में उसके आश्रितों को पेंशन मिले।

इस मांग पत्र पर साढ़े पांच हज़ार से ज़्यादा मज़ूदरों ने दस्तखत किए तो मिल मालिक और ब्रिटिश हुकूमत ने इस आंदोलन को कुचलने का फैसला किया। मज़दूरों को और बुरी तरह प्रताड़ित किया जाने लगा, बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। यातनाएं जितनी बढ़ीं, लोखंडे का आंदोलन और बड़ा हुआ और महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में फैल गया।

आंदोलन इतना बड़ा हो गया था कि लोखंडे की श्रमिक सभा में बॉम्बे के रेसकोर्स मैदान में देश के करीब 10 हज़ार मज़दूर जुटे और मिलो में कामबंदी का ऐलान कर दिया। तब जाकर ब्रिटिश राज की हेकड़ी निकली और 10 जून 1890 के दिन 'रविवार' को मज़दूरों के लिए साप्ताहिक अवकाश घोषित किया गया। यही नहीं, काम के घंटे भी तय हुए और भोजन आदि के लिए समय भी मंज़ूर हुआ, जिसे बाद में लंच ब्रेक माना गया।

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अंग्रेज़ों को रविवारीय प्रार्थना में चर्च जाने के लिहाज़ से पश्चिमी देशों में रविवार के साप्ताहिक अवकाश का चलन हुआ था, लेकिन भारत में यह मज़दूर क्रांति का इतिहास है। उस समय भारत में संडे की छुट्टी मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि सेहत का खयाल रखने, सामाजिक और देशहित के कामों में समय देने के लिहाज़ से मांगी गई थी और लंबी लड़ाई के बाद लोखंडे के नेतृत्व में हासिल की गई थी।

भारत सरकार ने 2005 में जब लोखंडे के चित्र और नाम के साथ जब डाक टिकट जारी किया था, तब कुछ चर्चा में आने वाले मज़दूर नेता लोखंडे के बारे में बहुत कम जाना गया है। 1848 में पुणे ज़िले में एक गरीब परिवार में जन्मे लोखंडे ने महात्मा ज्योतिबा राव फुले के सत्यशोधक आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और फुले के सक्रिय कार्यकर्ता बन गए थे।

मैट्रिक के बाद लोखंडे ने पहले रेलवे के डाक विभाग में नौकरी की थी और फिर वो बॉम्बे टेक्सटाइल मिल में पहुंचे थे। यहां से उन्होंने मज़ूदर यूनियनों और आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी और फिर नेतृत्व किया। भारत में मज़दूर क्रांति के जनक लोखंडे ने मज़दूरों के अधिकारों के लिए जो आंदोलन छेड़ा था, उसमें फुले भी शामिल थे और मज़दूरों को सभा में संबोधित किया करते थे।