किसी क्रीम के विचारों को अपने विचार ना बनने दें

11:11 AM Jul 07, 2020 |

आप के चहरे का रंग देख कई बार आप को लोगों के विचार सुनने को मिले होंगे। गोरे हो या काले हर किसी को रंग के लिए टिप्पणी सुनने को मिल ही जाती है। किन्तु यह दो रंग और इससे जुड़े विचारों को ही महिलाओं का सम्पूर्ण जीवन बना दिया जाता है। चाय मत पियो काली हो जाओगी, बाहर खेलने मत जाओ धूप से निखार कम हो जाएगा। काली है कोई लडक़ा शादी नहीं करेगा। जैसे शब्द हमेशा ही आम तौर पर हम सभी ने कहीं ना कहीं जरुर सुनें होते हैं।  
खूबसूरती एक ऐसा शब्द जिसकी हमारे जीवन के साथ ही साथ समाज में जगह होने के बहुत बड़ा इतिहास भी रहा है।  प्रकृति हो या इंसान हर किसी को इस शब्द के आधार पर ही तौला जाता है। हम इंसानों की प्रकृति ने अन्य जीव जंतू से अलग बनाया, जिसके चलते हम सोच समझ सकने के साथ ही सही और ग़लत, पसंद-नापसंद के लिए नियम बनातें हैं। हमारे समाज में सालों से सभी की सोच का हिस्सा रही धारणा है कि गोरा रंग खूबसूरती का प्रतीक है। हमारे समाज में यह सोच एक ऐसी कुप्रथा है जिसका हम विरोध करने की जगह जानें अनजाने इसका हिस्सा ही बन जाते हैं। 

समाज में फैली इस गलत सोच का फायदा उठा कर क्रीम कम्पनियों ने अपने लिए व्यापार के रास्ते बनाए। इनमें से एक है फेयर लवली। जिसे बाजार में 1975 में लाया गया, इस क्रीम को हिन्दुस्तान यूनिलीवर लेकर आईं थीं। लोगों को गोरा बनाने का दावा करने वाली यह क्रीम सालों से भारतीय जनता में लोकप्रिय रही है। लड़कियों को गोरा बनाने की उम्मीद देने वाली यह क्रीम लोगों के उन भावों और कार्यों को अपने से जोड़ कर प्रस्तुत करतीं थीं। जैसे शादी, नौकरी, पढ़ाई इत्यादि ऐसे सभी कार्यों को इन्होंने समय-समय पर अपनी क्रीम के साथ प्रस्तुत करने के लिए इश्तिहार का इस्तेमाल किया। 

खुबसूरत और कामयाबी को गोरे रंग से जोड़ कर फेयर लवली और फेयर लवली जैसी बहुत सी क्रीम का व्यापार धड़ल्ले से चल रहा है। इन क्रीम को बेचने वाली कंपनियों की बातों में कितनी सच्चाई है इसका आज तक कोई प्रमाण नहीं मिल सका है। कई सारे डॉक्टर और रिसर्चर का यह मानना है कि ऐसी कोई क्रीम नहीं है जिससे किसी गोरा बनाया जा सकें। बस कुछ खतरनाक केमिकल का प्रयोग कर कुछ समय के लिए चहरे के रंग को हल्का किया जा सकता है। 
आउटलुक इंडिया’ नामक पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, 2015 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (ष्टस्श्व) ने पाया कि भारत में बिकने वाली 44 फीसद फेयरनेस क्रीम्स में पारा होता हैं।  कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स में जहरीली धातुएं मिली होती हैं। कई ब्रैंड्स के साथ ष्टस्श्व की इस स्टडी ने ‘फेयर एंड लवली’ एंटी माक्र्स क्रीम को बढ़े हुए पारे के लेवल्स के लिए फ्लैग भी किया। जिनसे त्वचा से जुड़े रोग होने का खतरा है। किन्तु इस के बाबजूद उस पर कभी कोई कार्यवाही नहीं हुई, क्योंकि फेयर लवली बैचने वालीं कम्पनी हिन्दुस्तान यूनिलीवर का मानना है कि उनके सभी प्रोडक्ट एफ. ए. डी. द्वारा अप्रूव किए गए हैं और इन में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। 

भारत में हर साल करोड़ों का व्यापार करने वाली यह क्रीम अपना नाम बदल रही है। अमेरिका में नस्लवाद के विरोध के चलते। किन्तु इस क्रीम को? जिस धारणा के साथ बेचा जाता रहा है उस धारणा में कोई बदलाव नहीं। भेदभाव की सोच का जितना अधिक प्रचार बाजारों में आने वाले ऐसे प्रोडक्ट जिनका प्रयोग हम अपने कद बढ़ाने, पतले या मोटे दिखने इत्यादि कार्यों के लिए करते हैं। सभी पर हम या हमारी सरकार कभी रोक लगाने पर विचार नहीं करते है। 
हमें खुद से प्रेम करना सीखाने के स्थान पर यह सभी प्रोडक्ट हमें खुद में और दुसरो में भेदभाव करने की भावना सीखाते है। यह मौलिक अधिकारों के विरूद्ध होने के साथ ही साथ हम सभी में एक दूसरे के लिए नफऱत को भी जन्म देता है। फिर भी हम ऐसी क्रीम और प्रोडक्ट पर रोक लगाने की जगह उन के व्यापार में सालों-साल बढ़त कर रहे हैं। हमें विचार करने की आवश्यकता है कि हम असल में खुद के लिए और अपनों के लिए कैसा समाज बना रहें हैं। शरीर की बनावट और रंग से प्रेम एवं अधिकार का निर्णय लेने की धारणा से आगे बढ़े तथा यह समझने की कोशिश करें कि असल में ख़ूबसूरती का अर्थ क्या है।

-राखी सरोज

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