वित्त विधेयक के रास्ते गैर-कराधान बदलाव करने पर लोकसभा में तीखी बहस

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): वित्त विधेयक में गैर-कराधान अधिनियमों को बदलने वाले प्रस्तावों को शामिल करने को लेकर गुरुवार को लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई तथा विपक्ष ने जहाँ इसे असंवैधानिक करार दिया वहीं सत्ता पक्ष ने इसे सही ठहराते हुए कहा कि इन प्रावधानों को लाना अनिवार्य है। 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जैसे ही वित्त विधेयक, 2019-20 को विचारार्थ सदन के पटल पर रखा, रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि वित्त विधेयक में सिर्फ कराधान संबंधी नियमों में संशोधन किये जा सकते हैं। इसमें ऐसे बदलाव भी नहीं किये जा सकते जिनकी स्थायी प्रकृति हो। लेकिन, सरकार ने इसमें रिजर्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम, बेनामी कानून, सेबी अधिनियम, बैंकिंग एक्ट, बीमा अधिनियम, धनशोधन कानून आदि में बदलाव के प्रावधान किये हैं। उन्होंने इसे संविधान की धारा 110 तथा लोकसभा के कार्यसंचालन एवं प्रक्रिया संबंधी नियमों का उल्लंघन बताया। उन्होंने पहले लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर, दूसरे अध्यक्ष एम.ए. अय्यंगर तथा 16वीं लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा दी गयी व्यवस्थाओं का भी इस संबंध में जिक्र किया। 

उन्होंने कहा “सरकार पीछे के दरवाजे से विधायी काम करना चाहती है। वह संसदीय प्रक्रिया को बाईपास करना चाहती है।” उन्होंने अध्यक्ष से सदन के अधिकारों की रक्षा का आग्रह किया। 

सीतारमण ने कहा कि प्रेमचंद्रन ने जिस नियम का उल्लेख किया है उसमें लिखा है कि वित्त विधेयक में गैर-कराधान संबंधी प्रावधान नहीं होंगे जब तक कि यह “अनिवार्य” न हो। उन्होंने कहा “सरकार को लगता है कि यह बिल्कुल अनिवार्य है और इसलिए इन प्रावधानों को विधेयक में शामिल किया गया है।” उन्होंने कहा कि उन प्रावधानों में यह जरूर कहा गया है कि वित्त विधेयकों में ‘मुख्य रूप से ’ कराधान संबंधी प्रावधान होने चाहिए लेकिन ये अन्य प्रावधानों को इसमें शामिल करने से ‘‘रोकते’’ नहीं हैं।