संस्कृति भारतभूमि के कण-कण में तथा संस्कृत भारतीयों के डीएनए में है : प्रो.हर्ष

तलवाड़ा (पवन शर्मा) - संस्कृति मानव की जीवन-शक्ति है, संस्कृति प्रगतिशील साधनाओं की विभूति है, संस्कृति राष्ट्रीय आदर्श की गौरवमयी मर्यादा है और स्वतन्त्रता की वास्तविक प्रतिष्ठा है। इस तथ्य का चिन्तन करते हुए भारतीय परम्परा ने सदा ही संस्कृति-निष्ठा के मंगलमय मार्ग को अपनाया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति भारतभूमि के कण कण में है तथा संस्कृत हर भारतीय के डी.एन.ए. में है। विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों तथा सैद्धांतिक मतभेदों के चलते भी सांस्कृतिक परम्परा की अविच्छिन्न गति में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं पड़ा। वेद ने यदि माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या: कहा है तो गुरुओं ने पवन गुरु पानी पिता माता धरत महत्त कहा, यदि शास्त्रों ने कहा कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: तो गुरुओं ने कहा सो क्यों मंदा आखिए जित जमें राजान यदि ऋषियों ने कहा कि एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति तो गुरुओं ने कहा एक पिता एकस के हम वारिस। 

यह बात संस्कृत भारती पंजाब के अध्यक्ष प्रोफेसर डाक्टर हर्ष मेहता ने जेसीडीएवी कालेज दसूहा में आयोजित संस्कृत दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कही। प्रोफैसर मेहता ने आगे कहा कि 'संस्कृति संस्कृत आश्रिताÓ अर्थात् संस्कृति संस्कृत भाषा पर आश्रित है जब तक हम संस्कृत भाषा को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाएंगे तब तक संस्कृति को समझना और उसे संस्कार रूप में जीवन की दिनचर्या में शामिल करना कठिन होगा। 

संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गुरमीत सिंह ने कहा कि संस्कृत मानव सभ्यता के प्राचीन इतिहास से जुड़ी विश्व की प्राचीन भाषा है जो कि आधुनिक भाषा के रूप में सर्वथा सार्थक है। कालेज के प्रिंसिपल डाक्टर अमरदीप गुप्ता ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में संस्कृत भाषा को सबसे विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है परन्तु सदैव सधारण लोगों के प्रोत्साहन एवं विश्वास के कारण यह समृद्ध भाषा रही है। वर्तमान समय में संस्कृत के महत्व को सभी देश समझ रहे हैं। 

कालेज रजिस्ट्रार निवेदिका ने आए हुए सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृत संसार के लिए सबसे बड़ी निधि है। इसमें समाज के निर्माण की क्षमताएं हैं। इस अवसर  प्रोफैसर एस एस राणा, प्रो. विनय, प्रो.ओंकार सिंह, डॉ. अनिल, डॉ. शीतल, डॉ. राजेश ठाकुर, प्रो. मुक्ता सोनी, प्रो. शिल्पी, प्रो. सवितोज तथा शहर के संस्कृत अनुरागी अरुण शर्मा, प्रेम शर्मा, कुंदनलाल तथा सेवा निवृत्त प्रो.एच.सी.शर्मा भी उपस्थित थे।