अपराध खत्म नहीं हो सकते हैं,पर इंसाफ तो पूरा होना चाहिए

09:20 PM Jan 16, 2021 |

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में अधेड़ महिला के साथ हैवानियत के बाद हत्या की वारदात से एक बार फिर मानवता शर्मसार हो गई। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इस अधेड़ महिला के साथ वहां हैवानियत हुई जहां वह अपने बीमार पति के स्वास्थ और लम्बे जीवन की कामना करने के लिए गई थी। किसी धार्मिक स्थल या उसके परिसर में इस तरह की वारदात का होना यही बताता है कि हैवानों को भगवान से भी डर नहीं लगता है।इतना ही नहीं इस कांड में मंदिर का केयरटेकर भी शामिल था। बदायूं का कृत्य भी हाथरस कांड जैसी तमाम घटनाओं से कम नहीं था। बस फर्क था तो समय और स्थान का। हाथरस की तरह यहां भी पुलिस और प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन करने में जरा भी रूचि नहीं दिखाई। वैसे उक्त दो मामले अपवाद नहीं है। सच्चाई यही है कि बात अपराध की हो या फिर जनता से जुड़ी समस्याओं अथवा विकास कार्यों की सरकारी अमला हमेशा लापरवाह ही नजर आता है। नौकरशाहों और बड़े जिम्मेदार अधिकारियों के माथे पर तब तक शिकन नहीं आती है,जब तक की पानी सिर से ऊपर नहीं चला जाता है। मुरादनगर शमशान घाट पर छत गिरने से करीब दो दर्जन मौतों के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला था। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि करीब-करीब पूरा सरकारी अमला अपनी मनमर्जी से काम करता है। आम जनता शिकायत करती है तो उन शिकायतों की सुनवाई भी यही लोग करते हैं और मामले को रफादफा होने में समय नहीं लगता है। सरकारी मशीनरी कैसे काम करती है, इसका पता तो वह ही बता सकता है जो भुक्तभोगी होता है। कहीं पुलिस पीडि़त की सुनवाई नहीं करती है तो कहीं- कहीं तो वह दबंगों के साथ ही खड़ी हो जाती है। पुलिस का जनता से सीधा सरोकार रहता है, इसलिए उसकी खामियां तो जगजाहिर हो जाती है,वर्ना करीब-करीब सभी सरकारी विभागों में एक जैसे हालात हैं। अर्दली से लेकर ऊपर तक बैठे अधिकारी मनमानी करते रहते हैं। इसका कारण है किसी अधिकारी/कर्मचारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं तय है।  न ही सजा का कोई खास प्रावधान है जिससे सरकारी नुमाइंदों में भय पैदा हो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तमाम कोशिशों के बाद भी सरकारी अधिकारी/कर्मचारी अपना रवैया नहीं बदल रहे हैं तो इसे सिस्टम की चूक कहा जाएगा। पता नहीं ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो बदांयू कांड के लिए जिम्मेदार एसओ को निलंबित भर करके छोड़ दिया गया। वह क्यों नहीं जेल में है। सबसे पहले तो उसी की गिरफ्तारी होनी चाहिए थी।  

बहरहाल, हमेशा की तरह बदायंू कांड को लेकर भी विपक्ष योगी सरकार पर हमलावर हो गया है। विपक्ष जो सत्ता पक्ष को घेरने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता है। इसमें भले किसी को सियासत नजर आए लेकिन इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि विपक्ष की सक्रियता के चलते ही कई आपराधिक मामले उजागर हो जाते हैं। वर्ना सरकारी अमला तो ऐसे मामलों को दबाए रखने में महारथ रखता है। बस विपक्ष के विरोध का तरीका नहीं समझ में आता है। ऐसा तो है नहीं कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार से पहले अपराध नहीं हुआ करते थे। पहले भी हुआ करते थे, आगे भी होते रहेंगे? यह कड़वी हकीकत है। चाहें कोई कुछ कहे हर जगह पुलिस नजरें जमाए नहीं रह सकती है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जब किसी आपराधिक घटना के होने या होने की संभावनाओं की जानकारी शासन-प्रशासन और पुलिस को लगे तो तब भी वह आंख मूंदे बैठा रहे या घटना स्थल पर जाने से बचता रहे। बस, होना यह चाहिए कि पीडि़त को जल्द से जल्द न्याय मिल जाए और अपराधी चाहें जितना रसूख वाला क्यों न हो उसे कोई बचाने की हिमाकत नहीं कर पाए। यह जिम्मेदारी सरकार की होती है कि जब शासन-प्रशासन और पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने में सफल नहीं होते दिखे तो वह न्यायसंगत कदम उठाते हुए दूध का दूध,पानी का पानी कर दे।  विपक्ष को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। उसे हर समय अपनी सियासत चमकाने की बजाए समाज के प्रति भी सजग रहना चाहिए। हमेशा सरकार को घेरने से बचते हुए किसी अपराध के पीछे कौन जिम्मेदार है ? इस पर ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए। घटना के बाद जिस प्रकार से पुलिस की लापरवाही सामने आई है, उससे सरकार की किरकिरी हो रही है। सपा-बसपा और कांग्रेस समेत कई दलों ने योगी सरकार को निशाने पर ले लिया है,परंतु सभी दलों का आलाकमान योगी को निशाने बनाने तक ही सीमित होकर रह गया है। समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार के दौरान कानून व्यवस्था का क्या हाल था,यह किसी से छिपा नहीं है,लेकिन आज अखिलेश कह रहे हैं कि बीजेपी सरकार का कुशासन अपराधियों की ढाल न बने। भाजपा सरकार अपराधियों को बचाने की कोशिश न करे और मृतका व उसके परिवार को पूर्ण न्याय मिले। अखिलेश को लम्बी चौड़ी बातें करने की बजाए यह बताना चाहिए कि बदायंू कांड में योगी सरकार ने क्या चूक करी। चाहें तो वह यह भी बता सकते हैं कि उनकी सरकार के समय ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद उन्होंने किस तरह के कदम उठाए थे।

कितनों को तुरंत जेल भेज दिया था और कितनों को निलंबित किया था। मगर ऐसी मिसाल अखिलेश सरकार  ने अपने शासनकाल में स्थापित ही नहीं की थी, इसी लिए अखिलेश इधर-उधर की बात कर रहे हैं। बदायूं कांड को लेकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अखिलेश से अधिक गंभीरता दिखाई। माया ने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए ट्वीट किया कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में महिला के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म और हत्या की घटना अति-दुखद व अति-निंदनीय है। बीएसपी की मांग है कि राज्य सरकार इस घटना को गंभीरता से ले और दोषियों को सख्त सजा दिलाना भी सुनिश्चित करे। ताकि ऐसी घटना की पुनरावृति न हो।    कांग्रेस और खासकर गांधी परिवार जो देश की आन-बान और शान जैसे हर मुद्दे पर सियासत करता रहता है,उसने बदायूं कांड पर भी जनता को उकसाने की भरपूर कोशिश की। कांगे्रस की राष्ट्रीय महासचिव व यूपी प्रभारी प्रियंका वाड्रा ने योगी सरकार पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि महिला सुरक्षा पर सरकार की नीयत में खोट है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि हाथरस में सरकारी अमले ने शुरुआत में फरियादी की नहीं सुनी, सरकार ने अफसरों को बचाया और आवाज को दबाया। बदायूं में थानेदार ने फरियादी की नहीं सुनी, घटनास्थल का मुआयना तक नहीं किया। महिला सुरक्षा पर यूपी सरकार की नीयत में खोट है। प्रियंका ने जो कहा सही कहा,लेकिन ऐसी बेबाक बयानबाजी वह तब नहीं कर पाती हैं जब  कांग्रेस शासित राज्यों में इस तरह की कोई आपराधिक घटना होती है। इन दलों के नेताओं को समझना होगा कि किसी महिला की 'इज्जतÓ और हत्या के मामले में दोहरा रवैया न अपनाए। अन्यथा इन नेताओं की बात को कोई गंभीरता से नहीं सुनेगा और इनकी विश्वसनीयता का ग्राफ गिरता ही रहेगा।कुल मिलाकर समाज से अपराध तो खत्म नहीं हो सकते हैं लेकिन इसके लिए जिम्मेदारों को कड़ी सजा और भुक्तभोगी को इंसाफ तो मिलना ही चाहिए।

-अजय कुमार
-लेखक लखनऊ के वरिष्ठ स्तंभकार हैं।