हर शहीद के गांव में मेले लगाएं देशवासी

11:06 AM Jul 07, 2020 |

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की बेडिय़ों में जकड़ी भारत माता को स्वतंत्र करवाने के लिए देश के असंख्य वीरों ने सर्वस्व अर्पण किया। हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए, काले पानी की यातनाएं सहीं। बहुत से ऐसे हैं जो काले पानी में ही कहां गायब हो गए, उनका कोई हिसाब नहीं पर उस समय पूरे देश में वतन पर मर मिटने वालों की एक लंबी कतार थी कभी समाप्त न होने वाली। देश में भी विदेश में भी। उनका एक ही लक्ष्य था-भारत माता को स्वतंत्र करना उस समय के कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र शहीदों की आत्मा की आवाज को इन शब्दों में गाते थे-

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तिहाँ होगा
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशाँ होगा

उन्हें संभवत: यह विश्वास रहा होगा कि हर शहीद की चिता पर देशवासी स्वतंत्र देश के वासी मेला लगाएंगे ही, पर उनका विश्वास हम पूरा नहीं कर पाए। आज भी सीमाओं की रक्षा करने के लिए देश के वीर सैनिक दिन-रात संघर्षरत हैं। 15-16 जून की मध्यरात्रि को जब हम सब घरों में आराम से सो रहे थे उसी समय गलवान घाटी में भारत माता की इंच-इंच भूमि के लिए हमारे जवान संघर्ष कर रहे थे और उसी में बीस जवान शहीद हो गए। यह शहादत भारत के बेटों ने दी। पूरे भारत में इस शहादत को सिर आंखों पर उठाया। चीन के विरुद्ध रोष का सशक्त स्वर उठा। परिणाम यह हुआ कि जो स्वर पहले कहीं और कभी सुनाई देता था, अब पूरे भारत में सरकार समेत चीनी माल के बहिष्कार का निर्णय कर लिया। एक अभियान ऐसा चला जैसा बंग-भंग आंदोलन के समय मान्चेस्टर इंग्लैंड की बनी वस्तुओं के विरुद्ध चला था। यहां एक प्रश्न है क्या शहीदों की चिताओं पर मेले लगते हैं? मेरा यह मानना है कि जो मेले लगाने से आज राजनेताओं को कोई लाभ दिखाई देता है, वे तो बड़े स्तर पर लगते हैं। शेष आम जन अपने-अपने गली मुहल्ले में शहीदों के चित्र उठाकर गीत गाते दिखाई दे जाते हैं। देशभक्ति का स्वर उनके हृदय से प्रकट होता है, शहीदों के लिए श्रद्धांजलि। आज का सवाल यह है कि क्या हम अपने शहीदों की याद में मेले लगाते हैं? अफसोस से कहना पड़ता है नहीं। जब से हमारा देश स्वतंत्र हुआ उसके पश्चात हजारों सैनिक सीमाओं की रक्षा करते शहीद हो चुके हैं। मेरा यह विश्वास है कि अब ये मेले शहीदों के घर, गांव, स्कूलों में लगने चाहिए। कितना अच्छा हो कि पूरे देश के लिए यह नियम बना दिया जाए कि जो शहीद सैनिक अथवा अद्र्धसैन्य बल का जवान जिस स्कूल में शिक्षा प्राप्त करके सीमा पर गया है उस स्कूल का नाम तत्काल ही उस शहीद के नाम पर रख दिया जाए जो तिरंगे में लिपटकर गांव में पहुंचता है, तिरंगा ऊंचा रखने के लिए बलिदान देता है।

आदेश यह भी होना चाहिए कि शहीद के स्कूल में उसका चित्र लगे और हर वर्ष बलिदान दिवस भी वहीं मनाया जाए, जिसमें उस परिवार को जिनका पुत्र शहीद हुआ है विशेष रूप से आमंत्रित कर सम्मानित किया जाए। पूरा गांव और विशेषकर स्कूल के बच्चे शहीद के बलिदान से परिचित हों, उसका जय-जयकार करें। यह भी हो सकता है कि शहीद के गांव को जाने वाली सडक़ या शहर की शहीद के घर की सडक़ का नाम भी उसी के नाम पर रखा जाए। क्या राजनीतिक लोगों ने कोई ठेका दे रखा है कि किसी भी सडक़, अस्पताल या बड़ी परियोजना का नाम राजनेताओं के नाम पर ही होगा? यह उचित नहीं।

आज की स्थिति यह है कि कुछ परिवारों में मैंने स्वयं देखा है कि दीपावली के दिन वे अकेले रह जाते हैं। क्यों न एक लहर ऐसी चले कि शहीद के गांव के सब लोग पंचायत के नेतृत्व में दीवाली के दिन पहले उसके घर जाएं, दीपक जलाएं और फिर अपने-अपने घरों में दीपावली मनाएं। सब कुछ संभव है अगर लहर उठे तो पूरे देश तक जाएगी। इसके साथ ही कितना अच्छा हो अगर भारत सरकार यह तय करे कि सभी प्रांत सरकारें एक जैसा धन शहीद परिवार की सहायता के लिए देंगी। आजकल तो सरकार की दया पर निर्भर हैं वे परिवार। कोई सरकार 15 लाख देती है कोई पचास लाख और कोई इससे भी ज्यादा। गलवान घाटी के संघर्ष में पंजाब के चार जवान शहीद हुए और उसके बाद एक और पटियाला का। पंजाब सरकार ने पहले तो हास्यास्पद घोषणा की, जो विवाहित युवक शहीद हुआ उसके परिजनों को बारह लाख और जो विवाहित नहीं है उनके लिए दस लाख की सहायता राशि दी जाएगी। यह तो अच्छा हुआ समय रहते सरकार को समझ आ गई और पचास लाख रुपया हर शहीद के परिवार को सहायता दी गई। वैसे इस राशि को जो लोग मुआवजा कहते हैं वे शहीद का अपमान करते हैं। यह सम्मान राशि तो हो सकती है, पर मुआवजा कदापि नहीं। क्या दस-बीस लाख रुपये किसी परिवार के बेटे का मुआवजा हो सकता है। इसे सम्मान राशि कहना ही उचित होगा। दिल्ली सरकार ने इसे अनुग्रह राशि कहा, पर यह भी कोई कृपा नहीं की; कर्तव्य पूरा किया गया है। विचार यह भी होना चाहिए कि शहीद की पत्नी को बार-बार विधवा कहना कितना उचित है। उसे शहीद पत्नी ही क्यों न कहा जाए। उसका सम्मान बढ़ेगा, परिवार का सम्मान बढ़ेगा।

क्या यह संभव नहीं स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के सरकारी कार्यक्रमों में इन सभी शहीद परिवारों को आमंत्रित किया जाए। उनका सम्मानित किया जाए। हर जिले में तिरंगा फहराया जाता है, तो क्या तिरंगेे के सम्मान हित जीवन देने वालों के परिजनों का वहां उपस्थित रहना कार्यक्रम की शोभा नहीं बढ़ाएगा? उन परिवारों के घावों पर भी मरहम लगेगा जो अपने पुत्र-पिता या भाई को खो चुके हैं हमारे लिए, देश के लिए, सीमाओं की रक्षा के लिए।
बहुत अच्छा लगा जब तीन जुलाई को अचानक ही देश के प्रधानमंत्री लद्दाख क्षेत्र में सैनिकों के मध्य पहुंच गए। उनका सम्मान बढ़ाया, घायल सैनिकों से मिले और सीमा पर जब प्रधानमंत्री गरजकर भारत माता की जय और वंदेमातरम का नारा लगाते हैं और उनके साथ ही भारत के वीर पुत्र बाजू उठाकर भारत माता की जय और वंदेमातरम कहते हैं तब किस देशभक्त का सीना चैड़ा नहीं हो जाता। सैनिकों का उत्साह तो बढऩा ही था। प्रधानमंत्री का सीमा पर जाना अर्थात पूरे देश की तरफ से यह संदेश कि देश सैनिकों के साथ है। मुझे ऐसा लगता है कि सैनिक परिवारों की पूरी देखभाल हो। शांतिकाल में भी सैनिकों को नागरिक जीवन में पूरा सम्मान दिया जाए। सुना है अमेरिका में कोई सैनिक रेलगाड़ी या बस में यात्रा करता है तो सभी अन्य यात्री तालियां बजाकर उसका स्वागत करते हैं।

भारत सरकार से एक और निवेदन है कि न जाने क्यों सन 2004 में यह निर्णय ले लिया गया कि अद्र्धसैन्य बलों के जवानों को सेवामुक्ति के बाद पेंशन नहीं मिलेगी। जो जवान सीमा पर शहीद हो जाएगा केवल उसी का परिवार पेंशन पाने का अधिकारी होगा। यह निर्णय जितनी शीघ्रता से बदला जाए उतना ही अपने अद्र्धसैन्य बलों के जवानों के लिए अच्छा है। वैसे भी हिंदुस्तान का हर जागरूक नागरिक यह प्रश्न करता है कि एक बार विधायक या सांसद बन जाने पर पूरे जीवन के लिए पेंशन और अन्य अनेक सुविधाएं मिल जाती हैं, पर तीस वर्षों तक सीमाओं की रक्षा करने वाला जब घर आए तो वह खाली हाथ क्यों आए? भारत सरकार को विशेषकर प्रधानमंत्री जी से यह निवेदन है कि बीएसएफ, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, सीआरपीएफ तथा अन्य अनेक बल ऐसे हैं जो हिममंडित चोटियों से लेकर रेगिस्तान की तपती रेत में बिना रुके अपने देश के लिए साधना करते हैं। उनको सेवामुक्ति के बाद पेंशन देना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। इसे भी पूरा कर लिया जाए तो हमारे जवानों और उनके परिजनों के लिए यह एक बहुत बड़ा उपहार होगा और शस्त्र उठाकर सीना तानकर दुश्मनों से जूझने वालों के लिए प्रोत्साहन भी होगा। एक बार फिर मैं यही कहना चाहती हूं कि स्वतंत्रता से पहले शहीद सोचते होंगे कि उनकी चिता पर मेले लगाकर देशवासी उन्हें याद करेंगे, पर आज का सच यह है कि चिताओं पर मेले लगाने कोई नहीं जाता। ये मेले स्वतंत्र भारत के हर शहीद के गांव, स्कूल, शहर में लगने चाहिए जहां उनके परिवारों को अहसास हो कि उनके पुत्र की शहादत को प्रणाम किया जा रहा है।

-लक्ष्मीकांता चावला
लेखक पंजाब की पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं