चुनौतियों से जूझता देश

लद्दाख सीमा पर पहुंचे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लुकुंग चौकी पर जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘अब तक जो बातचीत हुई है उससे मामला हल होना चाहिए, कहां तक हल होगा इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता।’ रक्षामंत्री ने देशवासियों को एक कटु सत्य से ही परिचित कराया है। चीन की सेनाएं गलवान घाटी से पीछे तो हट रही हैं लेकिन जिस गति से सारी कार्रवाई चल रही है तथा जिस तरह चीन कई स्थानों से पीछे हटने को तैयार दिखाई नहीं दे रहा और चीन द्वारा भारतीय सीमा के साथ लगते क्षेत्रों में सैन्य दृष्टि से अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए जवानों, टैंकों व विमानों को तैनात किया है, उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि चीन की चुनौती अभी बरकरार ही है। चीन के साथ-साथ देश में कोरोना संक्रमित मामलों का तेज गति से बढऩा दूसरी बड़ी चुनौती है। 24 घंटों में अब 38 हजार से ऊपर कोरोना संक्रमित मामले आ रहे हैं। गत रविवार तक 11 लाख से ऊपर कोरोना संक्रमण के मामले हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई के अंतिम सप्ताह से लेकर अगस्त के अंत तक संक्रमण का स्तर शीर्ष पर होगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार कोविड-19 के 86 फीसदी मामले सिर्फ 10 राज्यों में देखे गए हैं जिससे महामारी के असमान स्तर पर प्रसार का रुझान दिखता है। इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक देश भर की व्यापक संख्या को देखना उतना सार्थक नहीं है क्योंकि कुछ राज्यों में ही संक्रमण के मामले में ज्यादा तेजी दिख रही है।

अशोक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (कंप्यूटेशनल बायोलॉजी और सैद्धांतिक भौतिकी) गौतम मेनन कहते हैं कि विभिन्न राज्यों में अलग रफ्तार से प्रगति होनी चाहिए, ऐसे में उनके लिए एक-दूसरे के साथ कदम मिला कर चलना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमें इस महामारी की प्रगति को समझने के लिए शहरों में जिले और उप-जिले तथा शहरों में जोन के स्तर के पैमाने पर देखा जाना चाहिए। भारत में कोविड संक्रमण का स्तर 10 लाख के दायरे को पार कर गया है। हालांकि संक्रमित लोगों की एक बड़ी तादाद ऐसी है जिनमें महामारी के हल्के लक्षण या लक्षण ही नहीं हैं। ऐसे में सीरो सर्वेक्षण के आंकड़ों के बगैर संक्रमण की तादाद का अनुमान लगाना मुश्किल ही है। इसका मतलब यह है कि अभी यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि भारत में महामारी के शीर्ष स्तर पर पहुंचने पर कितने मामले हो सकते हैं और तब तक क्या सामुदायिक स्तर पर आबादी के बड़े हिस्से में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो पाएगी। प्रो. भ्रमर मुखर्जी ने कहा कि हमारे मॉडल से संकेत मिलता है कि भारत में दर्ज कराए गए मामले की तुलना में 10 गुना अधिक मामले हैं। इस लिहाज से भी हम सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने से काफी दूर हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि इसके लिए लगभग 50-70 प्रतिशत आबादी का संक्रमित होना जरूरी है।

महामारी विशेषज्ञों का कहना है कि इस बात की ज्यादा संभावना है कि रोजाना के मामलों की तादाद जब एक बार शीर्ष स्तर पर पहुंच जाएगी तब उसके बाद इसमें धीरे-धीरे गिरावट आएगी और इस गिरावट के साथ ही कुछ बदलाव भी दिखेंगे। मेनन ने कहा कि इसके बाद क्या मामले में दूसरे चरण की स्पष्ट तेजी होगी या कुछ अलग-अलग तेजी देखी जाएगी, यह अभी अस्पष्ट है। हालांकि शीर्ष स्तर से बचना संभव नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कम करना संभव है ताकि किसी जगह पर किसी दिन मरीजों के मुकाबले ज्यादा बेड उपलब्ध हो। कोविड-19 के दौरान उत्पन्न चुनौतियों को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि एक अप्रैल से लेकर 15 मई तक के बीच 24 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 55 फीसदी परिवार दिन में महज दो वक्त का खाना ही जुटा पाए। देश में 5,568 परिवारों पर किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। बच्चों के अधिकारों के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठन वल्र्ड विजन एशिया पैसेफिक द्वारा जारी एशिया में सर्वाधिक संवेदनशील बच्चों पर कोविड-19 के असर से संबंधित आकलन में पाया गया कि भारतीय परिवारों पर पड़े आर्थिक, मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक दबाव ने बच्चों के कल्याण के सभी पहलुओं पर असर डाला, जिनमें खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, जरूरी दवाएं, स्वच्छता आदि तक पहुंच और बाल अधिकार एवं सुरक्षा जैसे पहलू शामिल हैं। इस अध्ययन में 1 अप्रैल से लेकर 15 मई तक 24 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली तथा जम्मू-कश्मीर) के 119 जिलों में 5,668 परिवारों पर सर्वेक्षण किया गया, जिसमें मुख्य रूप से सामने आया कि कोविड-19 के चलते 60 प्रतिशत से अधिक अभिभावकों की आजीविका पूरी तरह या गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

सर्वेक्षण के दौरान पाया कि लॉकडाउन की सबसे अधिक मार दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी और इसके चलते छिनी आजीविका ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई। दिहाड़ी मजदूर इस सर्वेक्षण का सबसे बड़ा हिस्सा थे। अध्ययन में कहा गया है कि करीब 67 फीसदी शहरी अभिभावकों ने पिछले हफ्तों में काम छूट जाने या आय में कमी आने की बात कही। इस रिपोर्ट के निष्कर्ष में खुलासा हुआ कि सर्वेक्षण में शामिल परिवारों में से 55.1 फीसद परिवार दिन में महज दो वक्त का खाना ही जुटा पाए जो सामथ्र्य चुनौती के कारण भोजन आपूर्ति तक उनकी सीमित पहुंच को दर्शाता है। कोरोना महामारी के कारण हमारी जीवनशैली ही बदल गई है। कोरोना के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है। युवाओं की नौकरियां चली गई हैं, बेरोजगारी बढ़ गई है, व्यापार व उद्योग जगत अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संघर्षरत हैं। देश की आर्थिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है, शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरियां सार्वजनिक हो रही हैं। कोरोना महामारी के दबाव में जिन लोगों ने शहरों को छोड़ गांवों को रुख किया था वहां उनके हाथ को काम और पेट भरने को खाना नहीं मिल रहा, बाढ़ की मार अलग से है।

कोरोना महामारी और चालबाज चीन की नापाक हरकत ने भारत की समस्याओं को बढ़ा दिया है। ऐसे चुनौती भरे समय में आंतरिक दलगत भेद भुलाकर सभी राजनीतिक दलों के नेतृत्व को एकजुट होकर चुनौतियों का सामना करना चाहिए। यह समय ‘तेरे-मेरे’ का नहीं बल्कि ‘हम’ का है। ऐसी सोच के साथ ही इस चुनौती भरे दौर का हम सफलतापूर्वक सामना कर पायेंगे।। यह बात नेताओं से लेकर अधिकारियों, कर्मचारियों तथा किसान व मजदूर तथा व्यापारियों सहित सभी भारतवासियों को समझनी होगी। जितनी जल्दी समझ लेंगे, उतनी जल्दी अधिक देश को चुनौतियों से राहत मिलेगी।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।