कोरोना टीकाकरण अभियान

कोविड-19 के साथ लड़ते हुए वर्ष 2020 निकल गया। वर्ष 2020 में भारत सहित विश्व इस महामारी से निजात पाने के लिए दवाई का इंतजार करता रहा। विकासशील तथा विकसित देश अपने-अपने स्तर पर कोरोना महामारी की दवाई ढूंढने की खोज में लगे रहे। विश्व के कुछेक देश कोरोना महामारी से निजात पाने के लिए दवाई बनाने में सफल रहे, भारत उनमें से एक है। कोरोना टीकाकरण का अभियान शुरू करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा आज वो वैज्ञानिक और वैक्सीन की शोध से जुड़े लोग, विशेष रूप से प्रशंसा के हकदार हैं, जो बीते कई महीने से दिन-रात वैक्सीन बनाने में जुटे थे। उन्होंने न दिन देखा, न रात देखी और न त्योहार देखा। आमतौर पर वैक्सीन बनाने में महीनों लग जाते हैं लेकिन इतने कम समय में भारत में एक नहीं बल्कि दो-दो 'मेड इन इंडियाÓ वैक्सीन तैयार हुए हैं। इतना ही नहीं बल्कि कई और वैक्सीन पर भी काम तेज गति से चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना टीकाकरण अभियान के पहले चरण में तीन करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों को टीका लगाकर समाज उनके ऋण को चुका रहा है। मोदी ने कोरोना के खिलाफ जंग में स्वास्थ्यकर्मियों के त्याग और समर्पण भाव को याद करते हुए कहा कि राष्ट्र सिर्फ मिट्टी, पानी, कंकड़, पत्थर से नहीं बनता। राष्ट्र का अर्थ होता है-हमारे लोग। कोरोना के खिलाफ लड़ाई को पूरे देश ने इसी भावना के साथ लड़ा है। उन्होंने कहा, आज जब हम बीते साल को देखते हैं, तो एक व्यक्ति के रूप में, एक परिवार के रूप में और एक देश के रूप में, हमने बहुत कुछ देखा है, जाना है, समझा है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, आज भारत जब अपना टीकाकरण अभियान शुरू कर रहा है, तो मैं उन दिनों को भी याद कर रहा हूं, कोरोना संकट का वो दौर, जब हर कोई चाहता था कि कुछ करे लेकिन उसको उतने रास्ते नहीं सूझते थे। सामान्य तौर पर बीमार व्यक्ति की देखभाल के लिए पूरा परिवार जुट जाता है लेकिन इस बीमारी ने तो बीमार को ही अकेला कर दिया। कई जगहों पर बीमार बच्चों को मां से अलग कर दिया। मां रोती थी लेकिन चाहकर भी कुछ कर नहीं पाती थी। बच्चे को गोद में नहीं ले पाती थी। कई बुजुर्ग पिता अस्पताल में अकेले बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी संतान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी। जब वो चले जाते थे, तो उन्हें परंपरा के मुताबिक वो विदाई भी नहीं मिल पाती थी, जिसके वो हकदार थे। मोदी ने कहा जितना हम उस समय के बारे में सोचते हैं, मन सिहर जाता है, उदास हो जाता है, लेकिन संकट के उसी समय में, निराशा के उसी वातावरण में कोई आशा का भी संचार कर रहा था। हमें बचाने के लिए अपने प्राणों को संकट में डाल रहा था। हमारे डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल कर्मचारी, एंबुलेंस ड्राइवर, आशाकर्मी, पुलिसकर्मी, सफाईकर्मचारी और अग्रिम मोर्च पर डटे दूसरे कर्मी, उन्होंने मानवता के प्रति अपने दायित्व को प्राथमिकता दी।

इनमें से अधिकांश अपने बच्चों और परिवार से दूर रहे। कई-कई दिन तक घर नहीं गये। सैकड़ों साथी ऐसे भी हैं, जो कभी घर वापस नहीं लौट पाये। उन्होंने एक-एक जीवन को बचाने के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा  इसी कारण आज कोरोना का पहला टीका स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों को लगाकर, एक तरह से समाज अपना ऋण चुका रहा है। यह टीका उन सभी साथियों के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की आदरांजलि भी है। मोदी ने कहा कि कोरोना वैक्सीन की दो डोज लगनी बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा वैक्सीन की एक डोज ले ली और दूसरी लेनी भूल गये, ऐसी गलती न करें। जैसा विशेषज्ञ कह रहे हैं, पहली और दूसरी डोज के बीच लगभग एक माह का अंतराल भी रखा जायेगा। इसके साथ ही यह याद रखना भी जरूरी है कि दूसरी डोज लगने के दो सप्ताह के बाद ही कोरोना के खिलाफ जरूरी शक्ति विकसित हो पायेगी। इसी कारण टीका लगते ही असावधानी बरतें, दो गज की दूरी भूल जायें और मास्क न पहनें, ऐसी गलती भूलकर न करें। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि जिस तरह पूरे देश ने धैर्य के साथ कोरोना का मुकाबला किया, वही धैर्य अब टीकाकरण के समय भी दिखाना है। इतिहास में इतने बड़े स्तर का टीकाकरण अभियान कभी नहीं चलाया गया है। यह अभियान कितना बड़ा है, इसका अंदाजा पहले चरण से ही लगाया जा सकता है। दुनिया में 100 से अधिक ऐसे देश हैं जिनकी आबादी तीन करोड़ से कम है और भारत पहले चरण में ही तीन करोड़ लोगों का टीकाकरण कर रहा है। दूसरे चरण में इसी 30 करोड़ लोगों तक ले जाना है। दुनिया में तीन ही ऐसे देश हैं, जहां की आबादी 30 करोड़ से अधिक है, खुद भारत, चीन और अमेरिका। मोदी ने कहा कि यह अभियान भारत के सामथ्र्य को दिखाता है। भारत के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ जब दोनों मेड इन इंडिया वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभाव को आश्वस्त हुए तब ही इनके आपात इस्तेमाल की अनुमति दी है।

लोगों को दुष्प्रचार से बचकर रहना चाहिए। भारत की प्रक्रिया की पूरे विश्व में विश्वसनीयता बहुत पहले से है। यह भरोसा भारत ने अपने ट्रैक रिकॉर्ड से हासिल किया है। दुनियाभर के करीब 60 प्रतिशत बच्चों को लगने वाले जीवनरक्षक टीके भारत में बनते हैं। भारत की सख्त वैज्ञानिक प्रक्रिया से होकर ही यह गुजरते हैं। भारत के वैज्ञानिकों को और वैक्सीन से जुड़ी हमारी विशेषज्ञता पर दुनिया का यह विश्वास और मजबूत होने वाला है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना टीकाकरण अभियान को लेकर दिशा-निर्देश दिए हैं। इसमें किसी व्यक्ति द्वारा टीका लगाए जाने के बाद संभावित दुष्प्रभाव के बारे में भी जानकारी देनी है। ठ्ठ आपातकालीन उपयोग अधिकार (ईयूए) के तहत, टीका केवल 18 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिए है। अगर आवश्यक है, तो कोरोना का टीका तथा दूसरा कोई टीकाकरण कम से कम 14 दिन के अंतराल पर किया जाए। टीके की पहली तथा दूसरी खुराक, दोनों एक ही टीके की होनी चाहिए। ठ्ठ जिन्हें कोविड टीके की पिछली खुराक में एनाफिलेक्टिक या एलर्जी हो। इसके अलावा, गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अभी टीका नहीं लगाना चाहिए क्योंकि फिलहाल ऐसा समूह चिकित्सकीय परीक्षण का हिस्सा नहीं रहा है। ठ्ठ ऐसे मरीज जिन्हें फिलहाल कोरोना संक्रमण है या जिन्हें प्लाज्मा थेरेपी एवं ऐंटीबॉडी दी जा चुकी है और जो लोग किसी बीमारी के कारण गंभीर रूप से बीमार हैं तथा अस्पताल में भर्ती हैं, उन्हें ठीक होने के चार-छह सप्ताह बाद टीका दिया जा सकता है। रक्तस्राव या खून का थक्का जमने के विकार के इतिहास वाले व्यक्तियों को लेकर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्रालय अनुसार टीका लगने के बाद सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द, बेचैनी, ठंड लगना, दिल घबराना, पेट दर्द व पसीना तथा चक्कर भी आ सकते हैं, इसलिए ऐसे संकेत मिलने पर घबराने की नहीं बल्कि डाक्टर की सलाह लेने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टीकाकरण अभियान शुरू करते समय जो भाव प्रकट किए हैं विशेषतया राष्ट्र को लेकर वह ऐसा सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। अपने देश के वैज्ञानिकों पर आज गर्व करने का अवसर है। यह टीकाकरण भारत के विश्वस्तर बढ़ते कदमों का भी प्रतीक है, लेकिन टीकाकरण के बाद भी एहतियात रखनी भी आवश्यक है, तभी कोरोना टीकाकरण अभियान सफल होगा। 
वैज्ञानिकों को बधाई तथा देशवासियों को शुभकामनाएं।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।