EVM से जुड़ी कुछ ऐसी बातें जिसे शायद की जानते होंगे आप, पहली बार यहां हुआ था इस्तेमाल

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): ईवीएम की सुरक्षा को लेकर अक्सर चुनाव आयोग पर आरोप लगते रहे है। अभी हाल ही में हुए चुनावों में ईवीए्म से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए कांग्रेस अधिवेशन में ईवीएम के स्थान पर मतपत्र से चुनाव करवाने की मांग की जा रही है। चलिए जानते है ईवीएम के बारे में। यह एक मशीन है जिसके माध्यम से चुनाव करवाए कर गए है। 

ईवीएम पांच-मीटर केबल से जुड़ी दो यूनिट-एक कंट्रोल यूनिट और एक बैलेटिंग यूनिट-से बनी होती है। कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास होती है और बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखी होती है। वोटिंग के लिए इन मशीनों का इस्तेमाल होता है। बात करें इसकी शुरुआत की तो सबसे पहले नवम्बर 1998 में आयोजित 16 विधान सभाओं के साधारण निर्वाचनों में इसका इस्तेमाल किया गया था। इन 16 विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में से मध्य प्रदेश की 5, राजस्थान की 5, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की 6 सीट शामिल थीं। 


 
खास बात यह है कि ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल बिना बिजली के भी काम करती है। ईवीएम 6 वोल्ट की एल्कलाइन साधारण बैटरी पर चलती है जो इसे बिना बिजली के काम करने में मदद करती है। 19एक ईवीएम में अधिकतम 3840 मत दर्ज किए जा सकते हैं। वैसे एक मतदान केंद्र पर 1500 मतदाता ही वोट देते हैं, इसके आधार पर ईवीएम में वोटर्स की संख्या पर्याप्त है। आपकी जानकारी के लिए बता दें एक ईवीएम में 64 उम्मीदवारों के नाम शामिल किए जा सकते हैं और एक मशीन में 16 नाम जोड़े जाते हैं। अगर किसी क्षेत्र में 16 से अधिक उम्मीदवार चुनावी मैदान में होते हैं तो वहां मशीन जोड़ दी जाती है और चार मशीन तक जोड़ी जा सकती है। वहीं अगर उम्मीदवारों की संख्या 64 से अधिक हो जाए तो वहां  पर फिर ईवीएम के इस्तेमाल की बजाए मत पत्र का इस्तेमाल करना होगा।  

चुनाव आयोग के अनुसार ये मशीनें बेहद सुरक्षित है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें ढेरों बैठकें करने, प्रोटोटाइपों की परीक्षण-जांच करने एवं व्यापक फील्ड ट्रायलों के बाद दो लोक उपक्रमों अर्थात भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलूर एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, हैदराबाद के सहयोग से निर्वाचन आयोग की ओर से तैयार एवं डिजाइन की गई है। साल 1989-90 में जब मशीनें खरीदी गई थीं उस समय प्रति ईवीएम (एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेटिंग यूनिट एवं एक बैटरी) की लागत 5500/- थी। खरीदते समय निवेश भले ही अधिक हो, लेकिन इससे मत पत्र से होने वाले वोटिंग की तुलना में कम खर्च होता है। 

ईवीएम के इस्तेमाल से काफी हद तक बूथ कैप्चरिंग पर रोक लगाने में सफलता मिली है। बता दें पहले जब मत पत्रों से चुनाव होता था, बूछ कैप्चरिंग कर लोग जबरदस्ती वोट डाल देते थे। लेकिन ईवीएम में एक मिनट में सिर्फ 5 वोट ही डाल सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर 'परिणाम' बटन के अलावा एक 'टोटल' बटन भी होता है। इस बटन को दबाने पर बटन को दबाए जाने के समय तक डाले गए मतों की कुल संख्या अभ्यार्थी-वार गणना को दर्शाए बिना प्रदर्शित हो जाएगी। एक और खास बात जिसे जान आप हैरान हो जाएंगे कि कंट्रोल यूनिट की मेमोरी में परिणाम 10 साल और उससे भी अधिक समय तक रहता है।