Sunday, September 23, 2018 03:46 PM

भूख से बच्च्यिों की मौत

जब पेट खाली होता है तो जिस्म रूह बन जाता है और जब भरा हो तो रूह जिस्म बन जाती है। शेख सादी द्वारा सदियों पहले कही उपरोक्त बात आज भी सत्य है। देश की राजधानी दिल्ली में भूख से तड़पकर एक ही परिवार की 3 बच्चियों की जान चली गई। इंसानियत को शर्मसार करने वाली यह घटना मंडावली में मंगलवार को हुई थी। तब तक तीनों सगी बहनें शिखा (8), मानसी (4) और पारुल (2) की मौत में रहस्य बरकरार था। लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में डाक्टरों ने शवों के पोस्टमार्टम के बाद बताया कि बच्चियां कई दिनों से भूखी थीं। उनके पेट में खाने का एक भी दाना नहीं था। उनके शरीर पर न तो चोट के निशान थे और न ही शरीर में जहर का अंश मिला है। ऐसे में संभव है कि भूख से ही तीनों बच्चियों की मौत हुई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने गुरु तेग बहादुर अस्पताल में मेडिकल बोर्ड द्वारा दोबारा पोस्टमार्टम कराया। उसकी वीडियोग्राफी भी की गई और विसरा को सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया।

दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यही खुलासा हुआ है कि तीनों बच्चियों की मौत ‘भूख’ के कारण ही हुई है। केंद्रीय उपभोक्ता एवं खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने कहा है कि उपरोक्त मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को नोटिस भेज चार सप्ताह में जवाब देेने को कहा है। राजधानी दिल्ली में भूख से हुई तीन बच्चियों की मौत का मुद्दा संसद में भी उठा। उपरोक्त कदम व कार्रवाई जो कुछ भी हो रही है या हुई है वह तीन बच्चियों की मौत के बाद ही हो रही है। मौत से पहले सरकार व समाज द्वारा दिखाई गई लापरवाही और उदासीनता सबसे बड़ा चिंता का विषय है। एक परिवार भूख से जूझ रहा हो और आस-पास वालों को पता ही न चले यह बात दर्शाती है कि नीचे से लेकर ऊपर तक हम आत्म केंद्रित होते जा रहे हैं। आस-पास क्या हो रहा है इसको लेकर किसी को चिंता नहीं है।

सरकार आये दिन गरीबों की भलाई के लिए नित नई योजनाएं बनाती है उन पर प्रशासन कार्य भी करता है लेकिन समाज के सहयोग न मिलने के कारण या प्रशासन की समाज के प्रति उदासीनता, उपरोक्त दोनों बातों के कारण निचले स्तर पर योजनाओं का लाभ जन साधारण तक नहीं पहुंच पाता। प्रशासन अगर सक्रिय होता व समाज जागरुक होता तो शायद तीन बच्चियों की भूख के कारण मौत न होती।
चाणक्य अनुसार दरिद्रता रूपी जीवन अभिशाप है, दरिद्रता मनुष्य के लिए मौत के समान है, भारत में आज भी 30 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और एक समय की रोटी के लिए संघर्षरत हैं। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि लाखों टन अनाज सरकारी गोदामों में पड़ा है और बर्बाद भी हो रहा है, लेकिन गरीब को मुफ्त में नहीं दिया जाता। समाज आये दिन बचा खाना कूड़े में फैंक देता है, देश में औसतन सात करोड़ टन बचा खाना फैंका जाता है। अगर इसी को ढंग से बचाकर गरीबों में बांट देने की व्यवस्था हो जाए तो शायद भूख से मरने वालों की संख्या कम हो जाए।

तीन बच्चियों की मौत ने एक बार फिर सरकार व समाज को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। सरकार के गोदामों में अनाज सड़ रहा है और समाज बचे खाने के रूप में करोड़ों टन खाद्य पदार्थ बर्बाद कर रहा है। सरकार और समाज अगर भूखे और गरीब वर्ग के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझते हुए कम से कम खाद्य पदार्थों को बर्बाद न कर गरीब वर्ग में बांट देने का प्रबंध तो कर ही सकते हैं। सरकार को गैर-सरकारी व धार्मिक संगठनों का सहयोग लेकर बचे हुए खाने को गरीब व भूखे वर्ग में बांटने की योजना तो तत्काल रूप से बनानी चाहिए। गोदामों में बर्बाद होने वाले अनाज को बचाकर गरीब वर्ग में मुफ्त बांटने का इंतजाम करना चाहिए।

भारत आज विश्व स्तर पर अपनी सभी उपलब्धियों को लेकर जो दावा कर रहा है उसकी हवा तो भूख के कारण मरी तीन बच्चियों ने ही निकाल दी है। भारत तब तक एक शक्तिशाली व विकसित देश का दावा नहीं कर सकता जब तक देश में भूखमरी के समाचार आते रहेंगे। विश्व स्तर पर जितने भूखे हैं उनमें से 25 प्रतिशत तो भारत में है। जब तक भारत में भूखमरी की चुनौती कायम है, तब तक भारत कटघरे में ही खड़ा दिखाई देगा।

भारत सरकार व समाज दोनों को मिलकर गरीबी और भूखमरी विरुद्ध युद्ध स्तर पर कार्य कर इन पर काबू पाने की आवश्यकता है। प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटना न हो।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू। 

WhatsApp पर न्यूज़ Updates पाने के लिए हमारे नंबर 7400063000 को अपने Mobile में Save करके इस नंबर पर Missed Call करें ।