बच्चें की काबिलियत

देश व दुनिया पर न•ार दौड़ाएं तो धन कमाने तथा बुनियादी सुविधाओं से लेकर आरामदायक •िांदगी के लिए इंसान दिन-रात एक करता दिखाई देता है। लेकिन इस दौड़ के पीछे अधिकतर का लक्ष्य स्वयं से अधिक अपने बच्चों के जीवन को सुरक्षित करना होता है। मां-बाप चाहे गरीब हैं या अमीर उनकी इच्छा अपने से बेहतर सुख-सुविधा अपने बच्चों को देने की होती है। बच्चों को बेहतर जीवन देने के लिए कई मां-बाप तो स्वयं की जिंदगी का संतुलन खो बैठते हैं। 
18 वर्ष का वयस्क. होकर जब बच्चा समाज में कदम रखता है तो उसके व्यवहार से ही अंदाजा लग जाता है कि उसका लालन-पालन कैसे हुआ और किस परिवार व समाज से वह आता है। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य व काबिलियत को लेकर नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति अपने अनुभव सांझा करते हुए लिखती हैं कि 'हाल ही में मेरी एक पुरानी स्टूडेंट मेरे पास अपनी बिटिया को लेकर आई और बोली 'मेरी बेटी बिल्कुल नहीं पढ़ती है और आपको मेरी मदद करनी है कि वो पढऩा शुरू करेÓ। मैंने स्टूडेंट से पूछा बताओ आप कितनी किताबें पढ़ती हो? उसका जवाब था मुझे क्यों बुक रीड करनी चाहिए? मैंने कहा अगर आप रीडिंग नहीं करेंगी तो यह उम्मीद मत रखिएगा कि आपके बच्चे रीडिंग करेंगे। स्टूडेंट का कहना था मैं चाहूंगी कि मेरे बच्चे स्टडी करें, ना कि रीड। मैंने कहा रीडिंग और स्टडी एक तरह से समान ही हैं। जब मां नहीं पढ़ेगी तो बच्चे भी नहीं पढ़ेंगे। मैं मदर्स से गुजारिश करूंगी कि वो जरूर किताबें पढ़ा करें। ऐसा नहीं है कि पिता नहीं पढ़ सकते, दोनों बराबर हैं लेकिन लॉजिकली मां ज्यादा जिम्मेदार होती हैं, मां का असर कुछ अधिक होता है। इसी वजह से तो हम कहते हैं, मातृभाषा। फादर टंग आपने कभी नहीं सुना होगा। •िांदगी में हर चीज की कीमत है, सिवाय मां के प्यार के। इसलिए मां की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। आप अपने बच्चों से किसी चमत्कार की उम्मीद मत कीजिए, खासतौर पर तब जबकि आपने उनके लिए मेहनत नहीं की है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चे पढऩे की आदत डालें तो आप भी जनरल रीडिंग शुरू कीजिए। रीडिंग वाकइ बेहतरीन आदत है। 
वर्तमान कोरोना काल के दौर में स्कूल बंद हैं। ऐसे में माता-पिता के लिए बच्चों की क्षमता व काबिलियत बढ़ाना अपने आप में एक चुनौती है। इस संदर्भ में मनोविज्ञानियों का मानना है कि बच्चे नए-नए कामों में महारत हासिल करें, इसमें पैरेंट्स उनकी मदद कर सकते हैं। मसलन, बालों में डाई लगवाना, किचन में बर्तन मंजवाना, झाड़ू लगाना, फोन कर पैक्ड फूड बुलवाना या वाई-फाई बूस्टर सेट करवाना आदि। ये छोटे-छोटे काम आप खुद भी कर सकते हैं, लेकिन इन्हें करने से बच्चों की मानसिक सेहत बेहतर होती है। उन्हें लगता है कि वे उपयोगी हैं और किसी भी काम को सफलतापूर्वक कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसे छोटे-छोटे काम से बच्चों में बेहतर बनने की भावना पैदा होगी? विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को वास्तविक जीवन की चुनौतियों से दो-दो हाथ करने देना उनकी क्षमता और काबिलियत बढ़ाता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजिस्ट अल्बर्ट बांदुरा इसे सर्वश्रेष्ठ अनुभव कहती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबोर्न में पॉजिटिव साइकोलॉजी की प्रो. ली वाटर्स कहती हैं, 'यह बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने की शुरुआती कवायद है। क्योंकि यह माने बगैर कि मैं कोई भी काम कर सकता हूं, कोई बच्चा ही नहीं, वयस्क व्यक्ति भी आत्मविश्वास खो देता है। क्षमता में कमी और बेबसी से चिंता, डिप्रेशन, उम्मीद और प्रेरणा की कमी महसूस होती है। दूसरी तरफ बेहतर क्षमता या उत्पादकता से संतुष्टि, आत्मविश्वास, सामाजिक जुड़ाव और इसी तरह की मानसिक स्थिति मिलती है।Óडॉ. वॉटर्स सुझाव देती हैं, 'उनके काम को पहचानें और मान्यता दें। आप कह सकती हैं कि तुमने यह काम वाकई अच्छी तरह किया, यह पूरा काम तुमने खुद किया या इस बार तुम्हें किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी। ये प्रशंसाएं बच्चे के लिए बैंक अकाउंट का काम करती हैं।
समस्या यह है कि वर्तमान दौर में बच्चों को घर का काम या कोई साधारण सा काम करने के लिए शायद ही कोई मध्यम श्रेणी का माता-पिता कहता है। गरीब परिवारों की स्थिति अलग है। जहां तक धनाढय परिवारों की स्थिति है वहां तो बच्चों के आगे पीछे सेवादार घूमते हैं परिवारों का माहौल ऐसा हो गया है कि बच्चों के मूड के हिसाब से ही मां-बाप चलने लगे हैं। 
अतीत में जाएं तो बच्चे मां-बाप के हिसाब से पलते-बढ़ते थे। परिवार का केन्द्र बिन्दु परिवार का मुखिया ही होता था। आजकल बच्चे केन्द्र बिन्दु हैं। माता-पिता चाहे दोनों कमाऊ हैं लेकिन केन्द्र बिन्दु बच्चा ही होता है। बच्चे को सुविधाएं देने के चक्कर में वह उसको दिये जाने वाले संस्कारों प्रति अनदेखी कर जाते हैं। कोरोना काल में शायद इसी कारण बच्चों में क्रोध और असहनशीलता भी बढ़ गई है। शारीरिक कार्य करने से बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी होता है और उनमें चुनौतियों का सामना करने की काबिलियत भी बढ़ती है। बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने से उनकी काबिलियत अधूरी ही रहेगी। 
किताबी ज्ञान के साथ-साथ हाथ का गुण और शारीरिक क्षमता बढ़ाने वाला ज्ञान ही बच्चे की काबिलियत को सही अर्थों में बढ़ाता है। बशर्ते आप स्वयं बच्चों के सम्मुख उदाहरण पेश करें, कहने मात्र से बात नहीं बनने वाली।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू