भारत के मुख्य न्यायाधीश के पत्र

भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दो अलग-अलग पत्र लिखकर मांग की है कि देश के न्यायालयों में लंबित होते मुकद्दमों की संख्या को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए। सीजेआई गोगोई ने प्रधानमंत्री से सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की क्रमश: संविधान के अनुच्छेद 128 और 224-ए के तहत सावधिक नियुक्ति करने का भी अनुरोध किया है, ताकि बरसों से लंबित पड़े मुकदमों का निपटारा किया जा सके। प्रधान न्यायाधीश ने कहा है कि शीर्ष न्यायालय में 58,669 मामले लंबित हैं और नये मामले दर्ज होने के चलते इस संख्या में वृद्धि हो रही है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की कमी के चलते जरूरी संख्या में संविधान पीठें गठित नहीं की जा रही हैं। सीजेआई ने लिखा है आप याद करें कि करीब तीन दशक पहले 1998 में सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीशों की मंजूर संख्या 18 से बढ़ा कर 26 की गई थी और फिर दो दशक बाद 2009 में इसे बढ़ा कर प्रधान न्यायाधीश सहित 31 किया गया, ताकि मामलों के निपटारे में तेजी लाई जा सके।

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि एक न्यायाधीश को विकसित होने में वक्त लगता है और तब जाकर वह प्रैक्टिस के समृद्ध अनुभव के आधार पर विचारों को प्रस्तुत कर पाता है। इन सबके लिए उसे पर्याप्त समय चाहिए होता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एसएन शुक्ला को एक आंतरिक जांच समिति द्वारा कदाचार का दोषी पाए जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया है। तीन सदस्यीय आंतरिक समिति ने जनवरी 2018 में पाया था कि न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ शिकायत में पर्याप्त गंभीर तथ्य हैं, जो उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त हैं। समिति में मद्रास हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज पीके जायसवाल शामिल थे। समिति की रिपोर्ट के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने प्रक्रिया के मुताबिक जस्टिस शुक्ला को सलाह दी थी कि या तो वे इस्तीफा दे दें या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लें। न्यायाधीश शुक्ला के ऐसा करने से मना करने पर तत्कालीन सीजेआई ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि तत्काल प्रभाव से उन्हें न्यायिक कार्य से हटा दिया जाए, जिसके बाद वह कथित तौर पर लंबी छुट्टी पर चले गए। न्यायमूर्ति शुक्ला ने 23 मार्च को न्यायमूर्ति गोगोई को पत्र लिख कर उन्हें हाईकोर्ट में न्यायिक कार्य करने की अनुमति देने का आग्रह किया। इस पत्र को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति गोगोई को अग्रसारित किया था।

न्यायमूर्ति गोगोई ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ आंतरिक जांच समिति ने गंभीर आरोप पाए हैं जो उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त हैं, उन्हें किसी भी हाईकोर्ट में न्यायिक कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इन परिस्थितियों में आप से आग्रह है कि आगे की कार्रवाई पर विचार करें। बताते चलें कि प्रधान न्यायाधीश जब किसी हाईकोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं, तब राज्यसभा के सभापति प्रधान न्यायाधीश से विचार-विमर्श कर तीन सदस्यीय एक जांच समिति नियुक्त करते हैं। राज्यसभा के सभापति द्वारा नियुक्त समिति साक्ष्यों और रिकॉर्डों की जांच करती है और इस बारे में राय देती है कि उन्हें हटाने के लिए ऊपरी सदन में बहस हो या नहीं, के लिए क्या कोई आधार प्रदान करती है। न्यायमूर्ति शुक्ला हाईकोर्ट में एक खंडपीठ की अध्यक्षता कर रहे थे, जब उन्होंने भारत के प्रधान न्यायाधीश की अगुआई वाले पीठ के आदेशों का कथित उल्लंघन करते हुए निजी कॉलेजों को 2017-18 के शैक्षणिक सत्र में छात्रों को नामांकन देने की अनुमति दी। जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति शुक्ला ने न्यायिक मूल्यों का क्षरण किया, एक न्यायाधीश के मुताबिक आचरण नहीं किया, अपने पद की गरिमा, मर्यादा और विश्वसनीयता को कमतर किया और पद की शपथ का उल्लंघन किया।

उपरोक्त पत्रों से देश की न्याय प्रक्रिया का कमजोर पक्ष सामने आया है। धरातल का सत्य यही है कि न्याय प्रक्रिया में देरी के कारण कई घर उखड़ गए हैं और उनको न्याय भी नहीं मिला। कईयों को तब न्याय मिला जब वह अपना सब कुछ खर्च कर चुके थे। पंजाब भाजपा के प्रमुख और सांसद श्वेत मलिक ने संसद में चैकों के फेल होने का मामला उठाते हुए बताया है कि चैकों के भुगतान न होने से करीब 20 लाख मामले लंबित हैं और इस समस्या से निजात पाने के लिए सरकार को कोई सख्त कानून बनाने की मांग की है। थोड़ी गहराई में जाएं तो पायेंगे कि आयकर विभाग, बिक्रीकर विभाग से लेकर नगर निगम स्तर पर लाखों मामले अधिकारियों की कमी या धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण सुलझ नहीं रहे और जन साधारण दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। केंद्र सरकार द्वारा अपने स्तर पर जो कदम उठाए जा सकते हैं, सर्वप्रथम वो उठाए जाने चाहिएं। फिर उन्हें आधार बनाकर प्रदेश स्तर पर वह कदम उठाने के आदेश दिए जाने चाहिएं। लक्ष्य मात्र व्यवस्था को बेहतर कर जन साधारण को राहत देना ही होना चाहिए। देश का मुख्य न्यायाधीश जब समस्या को हल करने की पहल कर रहा है तो इसी से समस्या कितनी गंभीर है समझा जा सकता है। सरकार को तत्काल अमल कर जन साधारण को राहत देनी चाहिए।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।