मुख्य न्यायाधीश विरुद्ध आरोप

देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली सर्वोच्च न्यायालय की ही पूर्व कर्मचारी ने इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए बनाई गई न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष पेश होकर अपनी बात कही है। आधिकारिक सूत्रों अनुसार शिकायतकर्ता पूर्व कर्मचारी और सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल समिति के समक्ष पेश हुए। समिति ने शिकायतकर्ता का पक्ष सुना। जस्टिस बोबड़े ने आंतरिक जांच के लिए इसमें जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस इंदिरा बनर्जी को शामिल किया था। हालांकि, शिकायकर्ता ने एक पत्र लिखकर समिति में जस्टिस रमना को शामिल किए जाने पर आपत्ति की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि समिति की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही जस्टिस रमना ने खुद को इससे अलग कर लिया। इसके बाद जस्टिस इंदु मल्होत्रा को समिति में शामिल किया गया। इस तरह समिति में अब दो महिला न्यायाधीश हैं। शिकायतकर्ता महिला दिल्ली में चीफ जस्टिस के आवासीय कार्यालय में काम करती थी। उसने एक हलफनामे पर प्रधान न्यायाधीश पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाते हुए 22 न्यायाधीशों को इसे भेजा। इसके आधार पर चार समाचार पोर्टलों ने खबर भी प्रकाशित की थी। महिला ने अपने हलफनामे में जस्टिस गोगोई के चीफ जस्टिस नियुक्त होने के बाद कथित उत्पीडऩ की दो घटनाओं का जिक्र किया था। महिला ने आरोप लगाया कि जब उसने यौनाचार की पहल को झिड़क दिया तो इसके बाद उसे नौकरी से हटा दिया गया। चीफ जस्टिस पर यौन उत्पीडऩ के आरोप की खबरें सामने आने पर शीर्ष अदालत ने 20 अप्रैल को न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित अत्यधिक महत्व का सार्वजनिक मामला शीर्षक से सूचीबद्ध प्रकरण के रूप में अभूतपूर्व तरीके से सुनवाई की थी।

उपरोक्त मामले को लेकर न्यायालय ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि उपरोक्त जांच में सीबीआई निदेशक, आईबी निदेशक और दिल्ली पुलिस के आयुक्त जांच कमेटी को सहयोग करेंगे। उत्सव बैंस के हलफनामे के साथ ही यह मामला जांच के घेरे में आ गया था। इस मामले पर न्यायाधीश गोगोई ने भी चिंता जताते हुए कहा था कि न्यायालय को धनबल के सहारे प्रभावित करने वाली जो कॉरपोरेट फिक्सर लॉबी सक्रिय है वह समझ ले कि वो आग से खेल रही है। इसी तरह न्यायाधीश मिश्रा ने कहा था कि जैसे ही न्यायालय कोई महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई शुरू करता है पत्र लिखे जाते हैं। ताकत और पैसे के बल पर न्यायालय को नियंत्रित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीश के विरुद्ध आरोप लगाना और उसके बाद आंतरिक जांच के लिए गठित पीठ के समक्ष पेश होकर एक महिला का अपना पक्ष रखना कोई साधारण बात नहीं है। सत्य क्या है यह तो जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन जिस तरह के आरोप व संदेह का माहौल बना है यह एक अति चिंता का विषय है। आज देश के जन साधारण का न्यायालय के प्रति जो दृढ़ विश्वास बना हुआ है उसे बनाये रखना ही समय की मांग है।

निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जब कभी भी महिला उत्पीडऩ विशेष रूप से यौन शोषन के मामले में जब महिला हल्फनामा देकर अपनी बात करती है तो उसे न्यायालय सहित समाज भी गंभीरता से ही लेता है, क्योंकि न्यायालय और समाज दोनों का ही मानना है कि महिला अपनी लाज और लज्जा को छोड़कर ही ऐसा कदम उठा रही है। इसलिए इसे गंभीरता से ही लिया जाना चाहिए।

उपरोक्त धारणा को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेकर जांच शुरू कर दी है। आशा है कि बहुत जल्द सत्य सामने आ जाएगा। अगर जांच में देरी होता है तो फिर न्यायिक प्रक्रिया पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगेगा।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।