कैप्टन का करिश्मा

2017 विधान सभा चुनावों, 2019 के लोकसभा चुनावों और अब पंजाब में हुए नगर निगमों, नगर निकायों व पंचायतों के चुनावों के परिणामों को देखते हुए स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पंजाब में अभी कै. अमरिंदर सिंह का करिश्मा कायम है। पंजाब में सात नगर निगम में से कांग्रेस ने 6 में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है और सातवें में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई है। नगर निकायों व पंचायतों के चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि कांग्रेस सब से मजबूत व बड़ी पार्टी उभर कर आगे आई है और अकाली दल बादल व भाजपा काफी पीछे हैं। आम आदमी पार्टी जिसको लेकर सभी राजनीतिक दल अपने पर दबाव महसूस कर रहे थे वह दबाव बनाने में असफल रही है। 
पंजाब में कांग्रेस की विजय को लेकर कै. अमरिंदर सिंह का कहना है कि 'ये परिणाम सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का एक स्पष्ट समर्थन हंै और प्रमुख मुद्दों पर हमारे रुख का सत्यापन है, जिसमें कृषि कानून और किसान आंदोलन शामिल है। ये चुनाव परिणाम बताते हैं कि राज्य में कांग्रेस सरकार ने पिछले 4 वर्षों में अपने वादों पर काम किया है। चुनाव परिणाम पंजाब के लोगों की मनोदशा का एक संकेतक हैं, जिन्होंने एक बार फिर से विकास, शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए वोट दिया है, जैसे कि प्रतिगमन, विघटनकारी नीतियों, भेदभाव और विभाजन के खिलाफ, जिसे सभी अन्य दलों ने न केवल प्रचारित किया है बल्कि सक्रिय रूप से पीछा कर रहे हैं अपने निहित राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए। लोग राजनीतिक दलों और नेतृत्व से थक चुके हैं, जो केवल अपने व्यक्तिगत एजैंडे को बढ़ावा देने के बारे में चिंतित हैं। वे विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, रोजगार, उद्योग आदि चाहते हैं, जिसे हमने 2017 में सत्ता में आने के बाद से बढ़ावा देने पर आक्रामक रूप से ध्यान केंद्रित किया है।Ó
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल का नगर निगम तथा नगर निकायों के चुनाव परिणामों को लेकर कहना है कि 'कांग्रेस पार्टी ने राज्य प्रायोजित दमन का सहारा लेकर नगर निगम चुनावों में जीत हासिल की है। यह जीत कांग्रेस की जीत नहीं है, बल्कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की जीत है। पूरी चुनाव प्रक्रिया में अकेले अकाली दल के 500 नामांकन पत्र रद्द कर दिए गए तथा अन्य पार्टियों के भी नामांकन पत्र रद्द कर दिए गए थे। इसके बाद बूथ कैप्चरिंग की गई। डंडातंत्र के भरोसे वोट डलवाए गए। जिस राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष पर हमला हो जाता है, वहां फ्री एंड फेयर इलैक्शन का दावा तो कहीं पीछे छूट गया नजर आता है। अकाली दल इस चुनाव में दूसरी बड़ी पार्टी है। कांग्रेस को ज्यादातर सीटों पर बहुत ही कम अंतर से जीत मिली है। इन परिणामों से यह भी स्थापित हो गया है कि पंजाब में अकाली दल सबसे बड़ा विपक्षी दल है। यहां तक कि 2022 के विधानसभा चुनावों की बात है तो कांग्रेस ने जिस तरह से लोकतंत्र की हत्या की है 2022 के विधान सभा चुनाव में वह कांग्रेस के पतन का कारण बनेगा। लोग 2022 के विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को ही विजयी बनाएंगे।Ó
पंजाब भाजपा के महासचिव सुभाष शर्मा का कहना है 'कांग्रेस को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि जनता ने उस पर विश्वास जताया है। क्योंकि आगामी विधानसभा चुनाव में जब पंजाब के असली मुद्दे सामने आएंगे तब जनता इस सरकार को असली जवाब देगी। विपरीत परिस्थितियों के चलते भी भाजपा ने इस चुनाव में जो प्रदर्शन किया है उससे वह निराश नहीं, क्योंकि इन चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अन्य किसी विरोधी दल के मुकाबले पीछे नहीं है, बल्कि यह साफ हो गया है कि अब आम आदमी पार्टी विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल होते हुए राज्य में अपना प्रभाव गंवा चुकी है। कांग्रेस ने पिछले 2-3 महीनों से राज्य में जो डर का माहौल बनाया, विरोधियों विशेषकर भाजपा नेताओं पर हमले करवाए गए, भाजपा उम्मीदवारों को डराया-धमकाया गया, पुलिस व प्रशासन के साथ-साथ राज्य चुनाव आयोग का दुरुपयोग किया गया, उससे लोकतंत्र की हार हुई है और लूटतंत्र की जीत। भाजपा हर चुनाव को एक चुनौती के रूप में लेती है। इससे पहले भाजपा सिर्फ 23 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती थी। अब सभी 117 सीटों पर चुनाव लडऩा है। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जहां इन चुनाव में कांग्रेस द्वारा बनाई गई विपरीत परिस्थितियों के बावजूद साहस का प्रदर्शन किया उससे साफ है कि पार्टी के कर्मठ कार्यकत्र्ता हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं।Ó
आम आदमी पार्टी पंजाब में मुख्य विपक्षी दल है लेकिन नगर निगम और नगर निकायों व पंचायतों के चुनावों में लगे झटके से यह मानने को तैयार है कि हार के कारणों पर मूल्यांकन करेंगे। 
राजनीतिक दलों का कार्य ही चुनाव लडऩा है। चुनावों में हार-जीत चलती रहती है लेकिन समय और परिस्थितियां हार-जीत के महत्व को कम या बढ़ा भी देते हैं। वर्तमान समय में चल रहे किसान आन्दोलन का प्रभाव सीधे-सीधे पंजाब में हुए नगर निगम व नगर निकायों के चुनावों पर पड़ा है लेकिन इसके साथ-साथ कोई इस बात को भी न•ार अंदाज नहीं कर सकता कि कै. अमरिंदर सिंह के व्यक्तित्व और उसकी राजनीतिक सूझबूझ ने कांग्रेस की जीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
किसान आन्दोलन को समर्थन देने के साथ-साथ पंजाब में उद्योग को बढ़ावा देने और नफरत तथा नकारात्मक राजनीति पर भी कै. अमरिंदर सिंह ने खुलकर अपने विचार प्रकट किये। इसके साथ ही  सरकार का विरोध करते हुए किसी ने भी अगर राष्ट्रहित की अनदेखी की या कुछ ऐसा कहा  व किया जिस से राष्ट्र के सम्मान को नुकसान होता हो या हुआ हो उसका कड़े शब्दों में कै. अमरिन्द्र सिंह ने विरोध किया । 
कै.अमरिंदर सिंह के उपरोक्त गुण का ही लाभ कांग्रेस पार्टी को मिला है। अकाली दल बादल को अगर शहरों में झटका लगा है तो भाजपा को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हानि हुई है लेकिन जितना दबाव पंजाब में भाजपा पर था  उसके बावजूद जो स्थिति पंजाब भाजपा की बनी है कि 2022 में होने वाले विधान सभा चुनावों में वह अपने विरोधियों  को कड़ा मुकाबला दे सकती है। आम-आदमी पार्टी की दोगली नीति ही उसकी हार का मुख्य कारण है। केजरीवाल की साख व छवि पंजाबियों के दिलों-दिमाग में नकारात्मक बन चुकी है उसको तोड़ पाना ही आज आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कै.अमरिंदर सिंह का पंजाब में करिश्मा अभी तक कायम है। 2022 को होने वाले विधानसभा चुनावों में इस करिश्मे को तोडऩा सभी राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती है।        

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू